हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल

Apr 04,2021 12:00 PM posted by Admin

15 अगस्त, 1948 को पंजाब की 30 रियासतों को मिलाकर 'हिमाचल प्रदेश नामक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। अक्टूबर 1966 तक हिमाचल प्रदेश में केवल छः पहाड़ी जिले थे–महासू, मंडी, चंबा, सिरमौर, बिलासपुर और किन्नौर। नवम्बर, 1966 में पंजाब का कुछ पहाड़ी क्षेत्र शिमला, कांगड़ा, कुल्ल, लाहौल व स्पिति और अंबाला जिले की नालागढ़ तहसील और होशियारपुर व गुरदासपर जिले के कुछ भाग को हिमाचल प्रदेश में मिला दिया गया। 25 जनवरी, 1971 को इसे भारत संघ के राज्य का दर्जा दिया गया। 1972-73 में राज्य के जिलों का पुनर्गठन किया गया और 12 जिले बना दिए गए।

हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल - Tourist places in Himachal Pradesh in Hindi

डलहौजी : डायना कुंड, सतधारा, पंजपुला, झंदरी घाट, काला टोप एवं खजिहार। 
चंबा : भूरीसिंह संग्राहालय, लक्ष्मीनारायण मंदिर, सलूनी, सरोल, भरमौर, चौगान, मणिमहेश, पांगी घाटी, छतराड़ी एवं अखंड चंडी महल और रंगमहल। 
कुल्लू : रघुनाथ मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर, रायसन, कसौल, भुंतर, कैम्पिंग साइट, बिजली महादेव मंदिर, देवटिब्बा लारजी, नग्गर, बजौरा, मणिकर्ण, बंजार, केशधार, बथाड़ एवं कटराई। 
मनाली : अर्जुन गुफा, वशिष्ठ मंदिर, हिडिम्बा देवी का मंदिर, जगत सुख,नेहरू कुंड, रोहतांग पास, सोलंग घाटी, राहला फाल, व्यास कुंड। 
सोलन : बड़ोग, करोल गुफा, सनावर, बौद्ध मठ, चैल, डगशाई, कसोली (सोलन से 15 कि.मी. दूर) पर्वतीय सैरगाह, मंकी प्वॉइंट, हनुमानजी का मंदिर। 
पालमपुर : न्यूगल पार्क, विंध्यवासिनी मंदिर, घुघुर, लांघा, गोपालपुर एवं आर्ट गैलरी। 
धर्मशाला : सेंटजॉन चर्च, डलझील, मैक्लोडगंज, कुनाल पत्थरी, धर्मकोट, करेरी, मछरियाल व तत्तापानी, चामुंडा देवी मंदिर, भगसूनाथ एवं त्रियूंड।

डलहौजी- Dalhousie Tourist Place

डलहौजी हिमाचल प्रदेश का एक खूबसूरत शहर है। समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई 2036 मीटर है। इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का श्रेय अंग्रेजों को जाता है। अंग्रेज यहां की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर मुग्ध हो उठे थे। लॉर्ड डलहौजी को भी यह स्थान बेहद प्रिय था, तभी इस स्थान का नामकरण डलहौजी के रूप में हुआ। । नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजादी के आंदोलन के दौरान 5 महीने डलहौजी में गुजारे थे। गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी सन् 1883 में यहां एक माह गुजारा था और यहां के रमणीय वातावरण में रमकर कई कविताओं की रचना की थी। शहीद भगत सिंह के चाचाजी अजीत सिंह के साथ भी इस स्थल की यादें जुड़ी हुई हैं। प्रसिद्ध पंजाबी साहित्यकार नानक सिंह ने भी डलहौजी में साहित्य-सृजन के लिए अपना काफी समय यहां बिताया था। ब्रिटिश गवर्नर लॉर्ड माओ, सर चार्ल्स एचिसन, वायसराय व लेडी कर्जन भी डलहौजी के आकर्षण से अछूते नहीं रहे थे।

डलहौजी हिमाचल प्रदेश की चंबा घाटी का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह रखते ही सैलानी यहां के प्राकृतिक वातावरण में रम-सा जाता है और उसे एक
आनंद की अनुभूति होती है। यहां आने वाले सैलानी को कभी गगनचुंबी पर्वत आर करते हैं, तो कभी घाटियों के सीने पर बने कलात्मक घर अपनी ओर आने के लि करते हैं।
कभी झरनों का संगीत मेदमस्त कर देता है तो कभी शीतल हवा के झोंके ताजी अहसास कराते हैं। 

यहां से पंजाब के कुछ मैदानी इलाकों के साथ-साथ कश्मीर क्षेत्र की विशालकाय हिमानी चोटियों को भी देखा जा सकता है। पठानकोट-चंबा मार्ग पर बनी खेत में किलोमीटर सर्पाकार सड़क घने जंगलों से गुजरती हुई डलहौजी शहर पहंचती है। पंजपुला, डायना कुंड, कालाटोप, सतधारा, झंदरीघाट और खजिहार यहां के प्रमाण आकर्षण स्थल हैं।
यहां की पर्वतमालाओं के बीच कलकल बहती हुई नदियां यहां के नैसर्गिक सौंदर्य में चार-चांद लगा देती हैं।

डायना कुंड - Diana kund Tourist Place

यह शहर की सबसे ऊंचाई पर स्थित एक बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल है। यहां से। रावी, व्यास और चिनाव नदियों को बहते हुए देखना बड़ा मनमोहक लगता है। यहां पहुंचकर ऐसा लगता है, जैसे आस-पास के पहाड़ बौने पड़ गए हों। वास्तव में यहां प्रकृति की नैसर्गिक छटा देखते ही बनती है। 

सतधारा - Satdhara Tourist Place

सतधारा डलहौजी पंजपुला मार्ग पर स्थित एक जलप्रपात है। इसका पानी अत्यंत स्वच्छ व रोग-निवारक है। यह झरना कभी छोटी-छोटी 7 धाराओं में गिरता था, इसी वजह से इसे सतधारा के नाम से जाना जाता है।

पंजपुला - Panjpula Tourist Place

डलहौजी के अजीत सिंह रोड पर स्थित पंजपुला एक रमणीक स्थल है। पांच छोटे पुलों के नीचे बहती जलधारा के कारण इसका नाम पंजपुला पड़ा है।
यहां एक बहत ही खूबसूरत प्राकृतिक जलकुंड है, जो दर्शनीय है। इसके अलावा यहां क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह की समाधि भी देखने योग्य

झंदरी घाट - Jhandi Ghat Tourist Place

परातात्विक स्थलों में रुचि रखने वाले पर्यटक इस घाट पर अवश्य जाते हैं। यहां पुराने महलों के खंडहर और अन्य पुरानी इमारतें देखी जा सकती हैं। पिकनिक के लिए यह अच्छा स्थान है।

कालाटोप - Kalatop Tourist Place

यह मुख्य डाकघर से 8.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां टैक्सी व जीप द्वारा पहुंचा जा सकता है। समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई लगभग 2440 मीटर है। बांस, चीड़ व देवदार के सघन वृक्षों के मध्य में स्थित यह पर्यटन स्थल बेहद आकर्षक सैरगाह है। यहां पर पर्वतीय पंछियों की चहचहाट सहसा ही मन मोह लेती है। 

खजिहार - Khajjiar Tourist Place

डलहौजी से 22 किलोमीटर समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 1890 मीटर है। दूरी पर स्थित खजिहार मिनी स्विट्जरलैंड व मिनी गुलमर्ग के नाम से जाना जाता है। यहां प्रकृति अपने पूरे शबाब पर दिखाई देती है। यहां एक तश्तरीनुमा झील है, जो 1.5 किलोमीटर लंबी है। सर्दियों में खजिहार जब बर्फ का दुशाला ओढ़ता है, तो यहां का सौंदर्य गजब ढहाने लगता है। यहां झील किनारे पहाड़ी शैली में बना एक मंदिर भी है, जिसमें नाग देवता की प्रतिमा स्थापित है। खजिहार में ठहरने के लिए डाक बंगले व रेस्ट हाउस भी हैं, जहां कोई भी पर्यटक ठहर सकता है।

डलहौजी कैसे जाएं?

रेल मार्ग : यहां आने के लिए पठानकोट तक देश के किसी भी हिस्से से रेल द्वारा पहुंचा जा सकता है। पठानकोट से डलहौजी 78 किलोमीटर दूर है। यहां के लिए अमृतसर निक चंडीगढ़, जम्मू आदि शहरों से सीधी रेल सेवाएं उपलब्ध हैं।

सड़क मार्ग : डलहौजी के लिए पठानकोट से होकर रास्ता जाता है। इस रूट पर नियमित सेवाएं उपलब्ध हैं।

डलहौजी कब जाएं?

डलहौजी में गर्मियों में मौसम बड़ा सुहावना होता है। सर्दियों में यहां हिमपात का दृश्य देखते ही बनता है। । बरसात के मौसम को छोड़कर यहां कभी भी जाया जा सकता है। सर्दियों में गर्म कपड़े लेकर जाना जरूरी है।

चंबा - Chamba Tourist Place

रावी नदी के किनारे पर एक समतल पहाड़ी पर बसा चंबा बेहद ही खूबसूरत पर्यटक स्थल है। डलहौजी से इसकी दूरी 56 किलोमीटर और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 996 मीटर है।रावी नदी के किनारे बसा चंबा एक बेहद खूबसूरत पर्यटक स्थल है चंबा को यह सौभाग्य प्राप्त रहा है कि यहां एक से बढ़कर एक कलाप्रिय, धार्मिक व कृपालु राजाओं ने शासन किया था, तभी यहां की संस्कृति न केवल फली-फूली, अपितु चंबा की सीमाओं को पार करके संपूर्ण भारतवर्ष में फैली।

चारों ओर से घनी बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर स्थित चंबा में शिव-पार्वती के 6 मंदिर हैं। इन मंदिरों की बेजोड़ नक्काशी और कला के नमूने पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। चंपा के वृक्षों से घिरा चंबा 10वीं सदी के राजा साहिल की बेटी चंपावती के नाम पर बसा है। पहले इसका नाम 'चंपावती' ही था। यहां वर्ष-भर रौनक लगी रहती है। जगह-जगह मेले आयोजित किए जाते हैं। सबसे प्रसिद्ध यहां का 'भिजार' त्योहार मेला है। यह मेला हर साल सावन के तीसरे रविवार को आयोजित किया जाता है। इसके अलावा अप्रैल माह में आयोजित होने 'सही मेला' भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। चंबा प्रकति की अदाओं का साक्षी है और इसकी हर अदा पर्यटकों को अभिभूत कर देती है। घाटियों में जब धूप के रंग बिखरते हैं, तो इसका सौंदर्य देखते ही बनता है। वा हो या भित्तिचित्र कला, मूर्तिकला हो या काष्ठकला, जितना प्रोत्साहन इन्हें चंबा में। है, उतना शायद ही देश के किसी अन्य हिस्से में मिला हो। 

भूरीसिंह संग्रहालय - Bhuri Singh Museum Tourist Place

यह संग्रहालय भारत के 5 प्रमुख संग्रहालयों में एक है। यहां चंबा घाटी की ही देखने को मिलती है। इस संग्रहालय का निर्माण चंबा नरेश भूरीसिंह ने डच डॉक्टर को की प्रेरणा से करवाया था। इस संग्रहालय में 5 हजार से अधिक दुर्लभ कलाकतियां मंगल हैं। इन कलाकृतियों में भित्तिचित्र, मूर्तियां, पांडुलिपियां और धातुओं से निर्मित वस्ती के अलावा विश्व-प्रसिद्ध चंबा रूमाल भी हैं। चंबा रूमालों की मुख्य विशेषता यह इन पर धर्म ग्रंथों के प्रसंगों का चित्रण बड़ी खूबसूरती से किया गया है। 

लक्ष्मीनारायण मंदिर - Laxmi Narayan Temple Tourist Place

यह प्राचीन मंदिर शिव और भगवान विष्णु की कलात्मक प्रतिमाओं और बेजोड़ नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है ।

सलूनी - Salooni Tourist Place

चंबा से 56 किलोमीटर दूर, समुद्रतल से 1829 मीटर ऊंचा यह पर्यटन स्थल अपने मनोरम दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है।

भरमौर - Bharmour Tourist Place

चंबा से 65 किलोमीटर दूर यह पर्यटन स्थल प्रसिद्ध, मणिमहेश यात्रा का आरंभ है। यहां के चौरासिया मंदिर समूह विशेष रूप से दर्शनीय हैं।

सहो - Sahoo Tourist Place

साल नदी के तट पर स्थित यह स्थल चंद्रशेखर मंदिर के लिए विख्यात है। चंबा यहां से 20 किलोमीटर दूर है। 

सरोल - Sarol Tourist Place

चंबा से 11 किलोमीटर की दूरी पर एक घाटी में बसा सरोल एक सुंदर पर्यटन एव पिकनिक स्थल है। यह रावी नदी के दाएं किनारे पर स्थित है। यहां पर्यटक, कृषि, फाम और अन्य वन संबंधी जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं।

चौगान - Chaugan Tourist Place

चौगान अपने मेलों के लिए पर्यटकों की नजर में विशेष स्थान रखता है। यह एक आम व्यापारिक स्थल है। यहां होने वाली विशेष सांस्कृतिक गतिविधियां पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। 

मणिमहेश - Manimahesh Lake Tourist Place

भरमौर से 34 किलोमीटर दूर 4,170 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह जगह अपनी 5656 मीटर ऊंची मणिमहेश चोटी के लिए विख्यात है। इसके अलावा यहां प्रसिद्ध मणिमहेश झील भी दर्शनीय है, जहां प्रतिवर्ष अगस्त-सितम्बर माह के दौरान मणिमहेश यात्रा आयोजित की जाती है। 

पांगी घाटी - Pangi Tourist Place

12438 मीटर की ऊंचाई पर स्थित, चंबा से 137 किलोमीटर दूर यह लुभावनी घाटी अपने प्राकृतिक सौंदर्य, भोले-भाले लोगों व उनके विभिन्न लोकनृत्यों के लिए प्रसिद्ध है, पर्वतारोहियों और ट्रैकिंग करने वालों के लिए यह एक रोमांचकारी जगह है। 

छतराड़ी - Chhatradi Tourist Place

भरमौर से 40 किलोमीटर दूर छतराड़ी शक्तिदेवी मंदिर के लिए विख्यात है, जो पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए महत्त्वपूर्ण जगह है। अखंडचंडी महल और रंगमहल
चंबा की कलात्मक धरोहरों में यहां के अखंडचंडी महल और रंगमहल को भी शामिल किया जा सकता है। रंगमहल में इस समय हिमाचल हस्तकला निगम का कार्यालय तो है ही, साथ ही रूमाल की कसीदाकारी और काष्ठ शिल्प के प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित हैं।

चंबा कैसे जाएं?

रेल मार्ग : चंबा का निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट है, जो 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। देश के प्रमुख महानगरों से पठानकोट के लिए सीधी रेल सेवाएं उपलब्ध हैं।

सड़क मार्ग : चंबा जाने के लिए सड़क मार्ग ही सबसे बढ़िया है। यहां के लिए चंडीगढ़, दिल्ली, अमृतसर, शिमला, जम्मू, पठानकोट आदि शहरों से साधारण व डीलक्स बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

चंबा कब जाएं?

मार्च से जून व सितंबर से नवंबर तक का मौसम चंबा की वादियों में घूमने के लिए उत्तम है। बरसात के मौसम में चंबा में कई बार भूस्खलन की वजह से रास्ता जाम हो जाता है, इसलिए बरसात के दिनों में आपको चंबा जाने का प्रोग्राम रद्द करना चाहिए। मार्च से जून तक आपको गर्म कपड़े ले जाने की जरूरत नहीं, क्योंकि इन दिनों यहां का मौसम खुशगवार होता है। सितंबर से नवंबर तक की अवधि में यदि आप चंबा जाएं, तो अपने साथ गर्म कपड़े अवश्य रख लें, क्योंकि रात को यहां ठंडक हो जाती है। 

कुल्लू - Kullu Tourist Place

कुल्लू हिमाचल प्रदेश के मनोरम और खूबसूरत पर्यटन स्थलों में एक है। समुद्र तल इसकी ऊंचाई 1219 मीटर है। सास नदी के किनारे बसे इस रमणीय स्थल की स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु प्रतिवर्ष हजारों पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहां का अनूठा दशहरा देखने लायक है। इस दशहरे की खासियत यह है कि जब बाकी देश में इस पर्व का समापन होता है, तब यहां इसका आरंभ होता है। कुल्लू नगर को 3 भागों में बांटा जा सकता है, ढालपुर मैदान, जहां प्रसिद्ध दशहरा पर्व मनाया जाता है, ढालपुर बाजार व अखाड़ा बाजार।

बसंत ऋतु में रंग-बिरंगे फूल, देवदारों से घिरे रास्ते, खूबानी और बेर से लदे वक्ष कुल्लू के सौंदर्य में चार-चांद लगा देते हैं। पैदल यात्रा के शौकीन लोगों के लिए कल्ल काफी उपयुक्त जगह है। बहुत-से पैदल यात्री कुल्लू से ही अपनी पर्यटन यात्रा आरंभ करते हैं।

रघुनाथ मंदिर - Raghunath Mandir Tourist Place

कुल्लू से लगभग 1 किलोमीटर दूर यह मंदिर कुल्लू निवासियों का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। अगर आप धार्मिक जगहों पर जाना पसंद करते है तो यह जगह आपके लिए काफ़ी बेहतर रहेगी । 

वैष्णो देवी मंदिर - Vaishno Devi Tourist Place

यह मंदिर कुल्लू से 4 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटी-सी गुफा में बना है। इस मंदिर में माता वैष्णो देवी की आराधना एवं दर्शन करने के लिए हर दिन श्रद्धालु पहुंचते है। 

रायसन - Raisen Tourist Place

यह एक मनोहारी पिकनिक स्थल है। कुल्लू शहर से इसकी दूरी लगभग 13 किलोमीटर है। समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई लगभग 1,443 मीटर है। व्यास नदी के किनारों पर बसे रायसन के चारों ओर सेब, बेर व खूबानी के खूबसूरत बगीचे हैं। यहां के रंग-बिरंगे फूल भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

कसौल - Kasol Tourist Place

पार्वती नदी के किनारे और कुल्लू से 42 किलोमीटर दूर यह पिकनिक मनाने का बेहतर स्थल है। यहां नदी का पानी इतना साफ होता है कि उसकी सतह भी दिखाई देती है। यहां ट्राउट मछली के शिकार की सुविधा भी उपलब्ध है।

भुंतर - Bhuntar Tourist Place

यह एक कस्बा है, जहां एयरपोर्ट है। ड्रिप्टवुड आर्ट गैलरी के कारण भी भुंतर प्रसिद्ध है।यह कुल्लू से मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां की काष्ठ कलाकृतियां बहुत मशहूर हैं।कुल्लू से 6 मील दूर गांव समसी सर्दियों में काम आने वाली गरम शाल के लिए प्रसिद्ध है। 

कैम्पिंग साइट - Camping site Tourist Place

यह मनोरम पिकनिक स्थल कुल्लू से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई लगभग 1,433 मीटर है। यहां फलों के बागान दूर-दूर तक फैले हुए हैं। यहां ज्यादातर शिविर और रैलियां आयोजित की जाती हैं। 

बिजली महादेव मंदिर - Bijli Mahadev Temple Tourist Place

कुल्लू का यह सबसे आकर्षक मंदिर है। यह व्यास नदी के किनारे पर कुल्लू से लगभग 14 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए 11 किलोमीटर की कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है। इस मंदिर से कुल्लू घाटी का नजारा बेहद आकर्षक दिखाई देता है। इस मंदिर पर जैसे ही सूर्य की किरणें पड़ती हैं, यह चांदी की तरह चमकने लगता है। इस मंदिर की छत पर 20 किलोमीटर ऊंची छड़ है, जो आकाशीय बिजली को आकर्षित करती है। 

देव टिब्बा - Deo Tibba Tourist Place

प्राकृतिक सौंदर्य से ओत-प्रोत यह स्थल समुद्र-तल से 2,953 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है।

लारजी - Larji Tourist Place

कुल्लू से 34 किलोमीटर दूरी पर स्थित लारजी भौंकने वाले कस्तूरी मृग, चीतों व जंगली सअरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां सैंज व तीरथन नदियों का संगम भी लायक है।

नग्गर - Naggar Tourist Place

किसी समय कुल्लू रियासत की राजधानी रहा नग्गर अपने एक पुराने किले के प्रसिद्ध है। यहां कई मंदिर भी हैं, जो देखने योग्य हैं। इस जगह पर कार व जीपों का आसानी से पहुंचा जा सकता है। 

बजौरा - Bajaura Tourist Place

कुल्लू से 15 किलोमीटर दूर इस स्थान पर बशेश्वर महादेव मंदिर है। पिरामिट आकार का यह कलात्मक मंदिर पत्थरों पर उकेरी गईं कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध के इस मंदिर का निर्माण 8वीं सदी के मध्य में हुआ था। 

मणिकर्ण - Manikaran Tourist Place

पार्वती घाटी की बर्फ से ढकी चोटियों की तलहटी में बसा यह स्थान अपने गर्म पानी के चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इन चश्मों के पानी में कई औषधीय गण हैं। कुल्लू से इसकी दूरी लगभग 44 किलोमीटर है।

बंजार - Banjar Tourist Place

बंजार एक बेहद खूबसूरत दर्शनीय स्थल है। कुल्लू से इसकी दूरी लगभग 58 किलोमीटर है। यह स्थल ट्राउट नामक मछलियों के शिकार के लिए प्रसिद्ध है, पर इसके लिए मत्स्य विभाग की अनुमति लेना अनिवार्य है। 

केशधार - Keshdhar Tourist Place

कुल्लू से मात्र 15 किलोमीटर दूर यह स्थल अपने हरे-भरे व लंबे-चौड़े चारागाहों के लिए प्रसिद्ध है। यहां ठहरने के लिए वन विभाग का विश्राम-गृह भी है। 

बथाड़ - Bathad Tourist Place

यह स्थल कुल्लू से 67 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पर्यटक यहां के प्राकृतिक नजारों एवं वन्य जीवन का भरपूर आनंद उठाने के लिए यहां आते हैं। 

कटराई - Katrai Tourist Place

व्यास नदी के किनारों पर बसा यह बेहद मनमोहक पिकनिक स्थल है। कुल्लू से इसकी दूरी 18 किलोमीटर है तथा समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई 1,463 मीटर है।

कुल्लू कैसे जाएं?

रेल मार्ग : निकटतम रेलवे स्टेशन कालका है। वैसे शिमला तक कालका से नैरोगेज की ट्रेन द्वारा श्री जाया जा सकता है। शिमला से आगे का सफर बस या टैक्सी द्वारा तय करना पड़ता है।

सड़क मार्ग : कुल्लू शिमला से सीधे सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। यहां के लिए शिमला से स्थानीय बसों व टैक्सियों की सेवाएं उपलब्ध हैं।

कुल्लू कब जाएं? 

अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर तक का समय कुल्लू जाने के लिए उपयुक्त रहता है। वैसे कुल्लू जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर में होने वाले कुल्लू के प्रसिद्ध दशहरे के त्योहार के अवसर पर है। इस समय कुल्लू नगर एक बड़े मेले का रूप धारण कर लेता है।
इस दौरान एक सप्ताह तक कुल्लू के विभिन्न गांवों से आए युवक-युवतियां आकर्षक लोकनृत्य पेश करते हैं।

मनाली - Manali Tourist Place

मनाली, कुल्लू से लगभग 40 किलोमीटर दूर उत्तर की ओर एक लभावनी समुद्र-तल से लगभग 1915 मीटर ऊंचाई पर बसा यह पर्यटन स्थल ट्रेकर्स के लिए स्वर्ग है। बर्फ से ढकी आसमान छूती चोटियां, देवदार के ऊंचे वृक्ष तथा कल-कल बहती व्यास नदी यहां के प्रमुख आकर्षणों में से हैं।
मनाली के बाजार से आप तिब्बती गलीचे, कलात्मक वस्तुएं, गर्म शालें व काष्ठ-कला की बेहतरीन चीजें खरीद सकते हैं।

अर्जुन गुफा - Arjun Goofa Tourist Place

यह गुफा मनाली से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। एक किंवदंती के अनुसार महाभारत के वीर पात्र अर्जुन ने यहां तपस्या करके पशुपत अस्त्र प्राप्त किया था।

वशिष्ठ मंदिर - Vashishtha Temple Tourist Place

लगभग 1800 साल पुराने वशिष्ठ की प्रतिमा वाले इस मंदिर का निर्माण राजा तक्षपाल द्वारा कराया गया था। कहा जाता है कि यहां कभी वशिष्ठ ने तपस्या की थी। यहां गर्म पानी के स्रोत भी हैं, जहां नहाने की विशेष व्यवस्था है।

हिडिंबा देवी का मंदिर - Hadimba Devi Temple Tourist Place

यों तो मनाली में कई आकर्षण हैं, लेकिन पगोडा शैली में बना भीम की पत्नी हिडिंबा देवी का यह मंदिर ऐतिहासिक वास्तुकला की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण आकर्षण है। इस मंदिर का निर्माण सन् 1553 ई. में कुल्लू के शासक महाराजा बहादुर ने करवाया था। यह मंदिर मनाली से लगभग 3 किलोमीटर दूर है तथा समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई 1,982 मीटर है।इस मंदिर से सटे पार्क में टहलकर प्रकृति के अद्भुत नजारों का आनंद उठाया जा सकता है।

जगत सुख - Jagatsukh Tourist Place

मनाली से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थल अपने प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां के गौरीशंकर मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी के दौरान किया गया था, जो हिमाचल प्रदेश के पुराने मंदिरों में से एक है। 

नेहरू कुंड - Nehru Kund Tourist Place

नेहरू कुंड मनाली से लगभग 5 किलोमीटर दूर है तथा एक रमणीय पिकनिक स्थल भी है। यहां की ठंडी हवाओं और ठंडे पानी का आकर्षण पर्यटकों को दूर से ही अपनी ओर आकर्षित करता है। 

कोठी - Kothi Tourist Place

कोठी मनाली से 12 किलोमीटर दूर रोहतांग मार्ग पर स्थित है। यह स्थान एक आकर्षक व मनोहारी पिकनिक स्थल है। यहां पी.डब्ल्यू.डी. का एक विश्राम-गृह भी है, जहां ठहरकर घाटी का सौंदर्य निहारा जा सकता है।

रोहतांग पास - Rohtang La Tourist Place

मनाली से लगभग 51 किलोमीटर की दूरी पर केलौंग-मनाली राजमार्ग पर स्थित यह स्थान बर्फीले पहाड़ों का अवलोकन करने के लिए उपयुक्त जगह है। समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई लगभग 3,980 मीटर है। यह दर्रा ही लाहुल स्पिति घाटी को कुल्लू घाटी से अलग करता है। यह दर्रा व्यास नदी का उद्गम स्थल भी है। गर्मी के मौसम में मनाली से केलौंग के लिए नियमित बसें भी चलती हैं।

सोलंग घाटी - Solang Nala Tourist Place

कोठी मार्ग पर रोहतांग के समीप स्थित यह घाटी बर्फ से ढके पहाड़ों तथा अद्भुत ग्लेशियरों के लिए प्रसिद्ध है। इस घाटी में स्कीइंग के लिए अच्छी ढलानें हैं। यह घाटी मनाली से लगभग 13 किलोमीटर दूर है। बर्फ से ढके पहाड़ों के लिए प्रसिद्ध इस घाटी में 

राहला फाल - Rahala Waterfalls Tourist Place

स्कीईंग करने का अपना ही मजा है वह झरना कोठी से 6 किलोमीटर दूर है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 2500 है। यह झरना सैलानियों को बरबस ही आकर्षित करता है।

व्यास कुंड - Beas Kund Tourist Place

यह हिमाचल प्रदेश की प्रमुख नदी व्यास का उद्गम स्थल है। कहा जाता है कि यहां महर्षि व्यास ने तपस्या की थी, जिसके बाद यहां का नाम व्यास पड़ा।

मनाली कैसे जाएं?

मनाली कुल्लू से मात्र 40 किलोमीटर दूर है। यह दूरी स्थानीय बसों और टैक्सी द्वारा तय की जा सकती है।

सोलन - Solan Tourist Place

कालका-शिमला राजमार्ग पर समुद्र तल से 1350 मीटर की ऊंचाई पर बसा सोलन मशरूम की सब्जियों के लिए जाना जाता है। यहां प्रवेश करते ही पर्यटकों को ऐसा महसूस होता है, जैसे वे शिमला शहर में आ गए हैं। कालका-शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित यह पर्यटन स्थल हर मौसम में सैलानियों को लुभाता है। यहां का शुलिनी मेला और 'ठोडा नृत्य' पूरे हिमाचल प्रदेश में प्रसिद्ध है।

बड़ोग - Barog Tourist Place

जो पर्यटक कालका से खिलौना गाड़ी में शिमला की ओर जाते हैं, उन्हें बड़ोग का प्राकतिक सौंदर्य अभिभूत कर देता है। सोलन से केवल 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थल सबसे लंबी रेल सुरंग के लिए भी जाना जाता है। चीड़ के सघन वनों से महकता बड़ोग पर्यटन स्थल साल-भर सैलानियों को लुभाता है। यदि आप इस स्थान पर जाएं तो अपने साथ कैमरा ले जाना न भूलें। यहां के प्राकृतिक नजारों को कैमरे में कैद करने का अपना ही मजा है। 

करोल गुफा - Coffer's Cave Tourist Place

यह गुफा हिमालय की सबसे प्राचीन व सबसे लंबी गुफा मानी जाती है। सोलन से इसकी दूरी 5 किलोमीटर है। समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई 7000 फुट है। इस गुफा को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं व किंवदंतियां प्रचलित हैं। 

सनावर - Snavar Tourist Place

सोलन से 21 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थान अपने 150 साल पुराने पब्लिक स्कूल, चर्च तथा सौर ऊर्जा से संचालित स्विमिंग पूल के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां सन् 1914-18 के युद्धों में शहीद हुए लोगों की स्मृति में एक स्मारक भी बना हुआ है। 

बौद्ध मठ - Bodha Math Tourist Place

सोलन से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मठ तिब्बत के सबसे प्राचीन धर्म 'बान' का अध्ययन केंद्र है। चीन के बाद 'बान' धर्म का विश्व में यह दूसरा मठ है। यहां विशेष अवसरों पर लोक-नृतकों द्वारा जो मुखौटा नृत्य पेश किया जाता है, वह देखते ही बनता है।

चैल - Chail Tourist Place

यह सोलन जिले की सबसे खूबसूरत जगह है। यह जगह सेब के बगीचों के लिए प्रसिद्ध है तथा सोलन से इसकी दूरी लगभग 45 किलोमीटर है। दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट मैदान चैल में ही है। यहां साल-भर सैलानियों के आने का तांता लगा रहता है 

डगशाई - Dagshai Tourist Place

सोलन से केवल 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पर्यटन स्थल अपनी पालन सुषमा व आकर्षक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। यहां घूमने का अपना ही मजा है। जिस काल में इस स्थान को 'दागेशाही' कहा जाता था। यहां की ऐतिहासिक जेल में जब कैटिन को रिहा किया जाता था, तब उनके माथे पर एक दाग लगा दिया जाता था। इस दायर वजह से ही इस स्थान को 'दागेशाही' कहा जाता था, जो कि धीरे-धीरे डगशाई हो गया।

कसौली - Kasauli Tourist Place

कसौली एकमात्र ऐसा पर्वतीय स्थल है, जो मैदानी इलाकों के बिल्कुल करीब पड़ता है। यहां सैलानियों को अन्य पर्वतीय स्थलों के थका देने वाले सफर जैसी असुविधा नहीं उठानी पड़ती। कालका से इसकी दूरी केवल 35 किलोमीटर है। यूं तो कसौली शिमला की तरह पहाड़ पर बसा हुआ है, फिर भी कई मायनों में यह शिमला से बिल्कुल अलग है। इसे पर्वतीय सैरगाह के रूप में विकसित करने का श्रेय अंग्रेजों को जाता है। बीमारी के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिए बहुत-से लोग यहां आते हैं और यहां की प्रदूषण रहित स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु में स्वास्थ्य लाभ उठाते हैं। 

मंकी प्वाइंट - Monkey Point Tourist Place

मंकी प्वाइंट कसौली का सबसे ऊंचा स्थल है। यहां हनुमानजी का एक बेहद खूबसूरत मंदिर है। यहां हर समय हरीतिमा बिछी रहती है। सर्दियों के मौसम में जब यहां आसमान से बर्फ गिरती है, तो यहां का सौंदर्य देखते ही बनता है।

सोलन कैसे जाएं? 

रेल मार्ग : सोलन रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। कालका से शिमला के लिए एक छोटी ट्रेन चलती है, जो सोलन भी रुकती है।

सड़क मार्ग : यह शहर कालका-शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है, इसलिए देश के प्रमुख शहरी से यहां के लिए बस सुविधाएं उपलब्ध हैं।

पालमपुर - Palampur Tourist Place

समद्र-तल से 1,400 मीटर ऊंचाई पर बसा पालमपुर अपने सुहावने मौसम, नीली पहाडियों, हरी-भरी घाटियों, सीली सड़कों और मीलों फैले चाय बागानों की संदरता से सैलानियों को आकर्षित करता है।किसी समय में यह स्थल अंग्रेजों की प्रमुख सैरगाह हुआ करता था। सन् 1905 में आए भीषण भूकंप से यहां जान-माल की काफी क्षति हुई थी, इसलिए अंग्रेजों का इस स्थान से मोहभंग हो गया था। इस घटना के बाद से वे अपने बागों को स्थानीय लोगों को सस्ते दामों में बेचकर अपने मुल्क रवाना हो गए थे।आज 2 हजार हेक्टेयर जमीन में फैले चाय के बाग पालमपुर की शान हैं। इन्हीं विशाल बागों के कारण पालमपुर ‘टी सिटी' के नाम से मशहूर है।

न्यूगल पार्क - Neogal Park Tourist Place

यह पार्क न्यूगल नदी के 150 मीटर ऊपर एक पहाड़ी टीले पर स्थित है। यहां छोटी-सी हिमानी नहर के साथ घास का लॉन भी है।अपनी प्राकृतिक सुंदरता की वजह से यह स्थल पर्यटकों को दूर से ही आकर्षित करता है ।

विंध्यवासिनी मंदिर - Vindhyavasini Mata Tourist Place

यह भव्य मंदिर न्यूगल पार्क से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस एउंचने के लिए बस एवं टैक्सी की सुविधा है। यहां का वातावरण बेहद शांत है. तभी मुंबई के कई फिल्म निर्माता यहां के शांत वातावरण में फिल्मांकन करता करते हैं। 

घुघुर - Ghughur Tourist Place

यह स्थल पालमपुर से 1 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां संतोषी माता. काली और रामकृष्ण के मंदिर दर्शनीय हैं।

लांघा - Lehenga Tourist Place

लांघा एक रमणीक स्थल है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 7000 फुट है। यहां जखणी माता का एक मंदिर है, जो देखने लायक है। मंदिर के साथ एक गोलाकार मैदान है, जहां दूर-दूर से आए पर्यटक पिकनिक मनाना पसंद करते हैं। यहां से प्रकृति के दृश्य बडे मनोरम लगते हैं। मंदिर के नीचे बहती नीले पानी की नदी में चमकते पत्थर बड़े आकर्षक लगते हैं।

गोपालपुर - Gopalpur Tourist Place

यहां एक चिड़ियाघर है, जहां आप शेर, भालू, हिरण, खरगोश, याक, बारहसिंगा, जंगली बिल्ली आदि वन्य जीवों को बेहद करीब से देख सकते हैं। 

आर्ट गैलरी - Art Gallery Tourist Place

इस आर्ट गैलरी को देखने विश्व-भर से लोग आते हैं। यहां शोभा सिंह के बनाए चित्रों में सोहनी-महिवाल, कांगड़ा दुल्हन तथा गुरुनानक देव के चित्रों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की है।

पालमपुर कैसे जाएं? 

वायु मार्ग : पालमपुर का समीपी हवाई अड्डा गग्गल है। इसकी दूरी लगभग 40 किलोमीटर है। गग्गल से पालमपुर पहुंचने के लिए स्थानीय बस व टैक्सी की सेवाएं उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग: पालमपुर का समीपी रेलवे स्टेशन मारंडा है। पालमपुर से यह मात्र 5 किलोमीटर की दरी पर स्थित है। मारंडा रेलमार्ग द्वारा पठानकोट से जुड़ा हुआ है। देश के प्रमुख शहरों से पठानकोट के लिए सीधी रेल सेवाएं उपलब्ध हैं। पठानकोट से हर रोज 6 रेलगाडियां मारंडा आती हैं। मारंडा से बस, टैक्सी द्वारा पालमपुर पहुंचा जा सकता है। 

सड़क मार्ग : पालमपुर दिल्ली, अम्बाला, लुधियाना, चंडीगढ़, अमृतसर, पठानकोट आदि शहरों से सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।

पालमपुर कब जाएं?

मार्च से जून तक व सितंबर से नवंबर तक का मौसम पालमपुर की वादियों में घूमने के लिए उपयुक्त है।

धर्मशाला - Dharamshala Tourist Place

धर्मशाला हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी का प्रमुख पर्यटन स्थल है। इस जहां धौलाधार पर्वत शृंखला है, वहीं दूसरी ओर उपजाऊ घाटी व शिवालिका है।
इसे अंग्रेजों ने बसाया था, क्योंकि यह उनका प्रिय पर्यटन स्थल था। तिब्बत गुरु दलाई लामा यहीं निवास करते हैं।

इस शहर को दो भागों में बांटा गया है-
1. निचली धर्मशाला
2. ऊपरी धर्मशाला, जिसे मैक्लोडगंज के नाम से भी जाता है।

सेंट जॉन चर्च - ST John Church Tourist Place

धर्मशाला से मैक्लोडगंज मार्ग के बीच स्थित इस चर्च का निर्माण 'लॉर्ड एल्गिन' का याद में करवाया गया था। यह चर्च पत्थरों से बना है तथा पर्यटकों को दूर से ही आकषित करता है।

डल झील - Dal Lake Tourist Place

यह झील एक सुंदर पिकनिक स्थल है तथा धर्मशाला से इसकी दूरी 11 किलोमीटर फर' के पेड़ों से घिरी यह झील सैलानियों को एक अविस्मरणीय आनंद प्रदान करती है।

मैक्लोडगंज  - McLeod Gan Tourist Place

इस स्थान पर तिब्बतियों की अनेक बस्तियां हैं, जिसकी वजह से इसे 'छोटा ल्हासा' के नाम से भी जाना जाता है। यहां छोटी-छोटी कई दुकानें हैं, जहां तिब्बती हस्तकला की वस्तुएं बेची जाती हैं। इस बाजार में कई रेस्तरां भी हैं, जहां परम्परागत तिब्बती व्यंजन खाने को मिलते हैं।मैक्लोडगंज में एक बहुत बड़ा प्रार्थना चक्र भी है। यहां स्थित बौद्ध मठ में महात्मा बुद्ध की प्रतिमा भी देखने लायक है। यहां तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा का निवास स्थान भी है। ट्रैकिंग में रुचि रखने वालों के लिए यह एक उपयुक्त ट्रैकिंग स्थल है।

कुनाल पत्थरी - Kunal Pathri Tourist Place

कोतवाली बाजार से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर पत्थरों से निर्मित है। इसके पत्थरों पर की गई नक्काशी देखकर पर्यटक दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। यह मंदिर शिल्पकला का बेहतरीन नमूना है। 

धर्मकोट - Dharamkot Tourist Place

समुद्र-तल से 2,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह पर्यटन स्थल धर्मशाला से मात्र 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां वर्ष-भर पर्यटकों का तांता लगा रहता है। यहां से कांगड़ा घाटी सहित धौलाधार पर्वतमाला साफ दिखाई देती है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य बेमिसाल है।

करेरी - Kareri Tourist Place

यह एक आकर्षक मनमोहक पिकनिक स्थल है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 40 मीटर है। धर्मशाला से इसकी दूरी 22 किलोमीटर है। यहां की करेरी शील झील तथा चारागाहें पर्यटकों को दूर से ही लुभाती है। 

मछरियाल व तत्वानी - Machhariyaal Tourist Place

शर्मशाला से 25 किलोमीटर दूर यह स्थल अपने झरने व गर्म पानी के चश्मे के लिए फ़ेमस है । 

चामुंडा देवी मंदिर - Chamunda Devi Temple Tourist Place

यह स्थान हिंदुओं का धार्मिक स्थल है। यहां चामुंडा देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। धर्मशाला से इसकी दूरी 15 किलोमीटर है। इस जगह से आप धर्मशाला के प्राकृतिक नजारों का जी भरके अवलोकन कर सकते है।

भगसूनाथ - Bhagsunag Tourist Place

यह एक मनोहारी जलप्रपात है, जो डल झील के समीप स्थित है। धर्मशाला से इसकी दूरी ॥ किलोमीटर है। यहां भगसूनाथ का प्रसिद्ध मंदिर भी है। यह स्थान एक बेहद आकर्षक पिकनिक स्थल है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 2,973 मीटर है। यहा से आप धौलाधार पर्वतमाला का भरपूर नजारा कर सकते है। यह स्थल धर्मशाला से 10 किलोमीटर दूर है।

धर्मशाला कैसे जाएं?

वायु मार्ग : निकटतम सम्बाई अड्डा गाम्मल है, जो धर्मशाला से केवल 13 किलोमीटर दूर है।

रेल मार्ग : निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट है, जो धर्मशाला से 80 किलोमीटर की दूरी पर है। देश के प्रमुख शहरों से पठानकोट के लिए सीधी रेल सेवाएं उपलब्ध है।

सड़क मार्ग : धर्मशाला भारत के प्रमुख सड़क मार्गों से जुड़ा हुआ है। दिल्ली, चंडीगढ़, देहरादन, उमला व पठानकोट से यहां के लिए सीधी बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

कब जाएं?

अप्रैल से जून व सितंबर से अक्टूबर माह के बीच का समय धर्मशाला भ्रमण के लिए अति उत्तम है, चेरापूंजी के बाद भारत में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र धर्मशाला ही है, इसलिए गर्मियों में अपने साथ हल्के ऊनी वस्त्रों के साथ-साथ एक छाता जरूर ले जाएं।