विरोधी की चाल-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 03,2021 07:43 AM posted by Admin

एक बार किसी जंगल में एक शेर रहता था। वहीं पर बाघ, कौवा और गीदड़ उसके साथी थे । एक बार यह सब के सब जंगल में जा रहे थे तो शेर ने एक ऊंट की ओर देखकर कहा_ “अरे ! यह कितना सुन्दर जानवर है। इससे जाकर पूछो कि यह जंगली है अथवा मैदानी ?" कौवा झट से बोला, “हे महाराज ! यह ऊंट मैदानी है । इसका मांस बड़ा मज़ेदार होता है । इसे मार कर खा लीजिए।"“मैं अतिथि को नहीं मारता।” शेर ने कहा। इसके लिए तो कहा गया "भय न मानता हुआ यदि कोई शत्रु भी अपने पास आ जाये, उसे जो मारे उस पर ब्राह्मण की हत्या का पाप लगता है। इसलिए उसे सम्मान से मेरे पास ले आओ ताकि मैं उसके यहां आने का कारण पूछ सकुँ ।


शेर के कहने पर वे लोग ऊंट को बड़े प्यार से समझा-बुझाकर शेर के पास ले आये। उसके आते ही शेर ने पूछा“क्यों भाई ! तुम इस जंगल में कैसे आ गये ?”"मित्र ! मैं अपने साथियों से बिछड़ कर रास्ता भूल गया था।” ऊंट ने बड़े धैर्य से उत्तर दिया। शेर उसकी बात से बहुत खुश हुआ। उसने ऊंट से कहा, “देखो भाई, अब तुम नगर में मत जाओ, हम लोगों के साथ आज से रहो । यहीं पर हरी-हरी घास खाकर जीवन का भरपूर आनन्द लो, हम तुम्हारे मित्र हैं।"शेर और उसके साथियों की बातों से ऊंट का दिल बहुत खुश हुआ। उसने दिल ही दिल में यह निर्णय कर लिया कि अब उस मालिक के पास नहीं जाएगा, जो दिन-रात बोझा उसको पीठ पर लाद कर स्वयं आनन्द लेता है। अब तो वह इस जंगल में ही रहेगा।

कुछ ही दिनों में आज़ाद वातावरण में रहने और मनपसंद खाने से, ऊंट तो खूब मोटा-ताज़ा हो गया। कुछ दिनों बाद उस शेर का एक जंगली हाथी से युद्ध हुआ। उस युद्ध में शेर को काफी चोटें आयी थीं। उसके सारे शरीर में दर्द होने लगा। यहां तक कि वह एक कदम भी चलने से मजबूर था, तब वह भूख से व्याकुल जंगल में लेटा अत्यन्त दुःख पाने लगा।तब शेर ने कहा, “भाई कहीं से कोई शिकार ढूंढो जिससे मैं अपना पेट तो भर सकू।” शेर की बात सनकर कौवा, गीदड़, बाघ इधर-उधर घूमने लगे, पर शेर के बिना वे किसका शिकार कर सकते थे ! घूम-घाम कर वापस आ गए। फिर एक स्थान पर बैठकर सोचने लगे कि आखिर शेर के लिए खाना कहां से लाएं !


गीदड़ ने कौवे से कहा-"भाई, मेरे विचार में तो ऐसे संकट में हमें इस ऊंट को ही अपने राजा का शिकार बना देना चाहिए। आखिर यह यहां पर मुफ्त को खा-खाकर ही तो पल रहा है।"बात तो ठीक है भाई, पर तुझे यह पता होना चाहिए कि हमारे इसे अपना मेहमान बनाया है और मित्र भी, वह कैसे इसे खाएंगे। गीदड़ की बात सुनकर बोला। __गीदड ने हंसते हुए कौवे के कान में कहा, “यार तुम इस बात मत करो। मैं मालिक के सामने इस ढंग की बात करूंगा कि वह स्वयं कहेंगे कि यह ऊंट मेरा शिकार बने । तुम लोग यहीं पर ठहरो, मैं अभी मालि से बात करके आ रहा हूं।” व यह कहकर गीदड़ अन्दर मालिक के पास गया और जाते ही हाथ जोडकर बोला, “महाराज हमने सारा जंगल छान मारा मगर हमें कहीं कोई शिकार मिला । अब हम में हिम्मत नहीं और आप बहुत भूखे हैं इसलिए हमने सोचा है कि क्यों न इस ऊंट को काट कर आपका शिकार बना दिया जाए।” __ गीदड़ की बात पर शेर को बहुत क्रोध आया। उसने गीदड़ को डांटते हुए कहा, “यह कैसे हो सकता है ? ऊंट हमारा मेहमान है । यदि तुमने दोबारा यह बात कही तो मुझसे बुरा कोई न होगा। कहा गया है कि गोदान, पृथ्वीदान और अन्नदान से भी बढ़कर अभयदान है।”


तब गीदड़ ने शेर की बात सुनकर कहा, “महाराज ! यहां पर आपकी जान का प्रश्न है । राजा से कीमती जान प्रजा की नहीं होती। हां, यदि आप उसे जबरदस्ती शिकार बनाएं तब ही तो पाप है। यदि वह स्वयं को आपके हवाले कर दे तो यह पाप नहीं।"“जो तुम लोगों को अच्छा लगे वही करो, मैं इस समय कुछ नहीं कह सकता।” शेर ने उत्तर दिया। गीदड़ बाहर अपने साथियों के पास आ गया। ऊंट भी वहां आ गया था। गीदड़ कहने लगा "देखो मित्रो ! हमारा राजा मर रहा है। इस समय हमें उनके प्राणों का रक्षा करनी है । क्योंकि यही कहा गया है कि
जिस सेवक के देखते-देखते स्वामी दःख भोगे, वह सीधा नर्क में जाते है |

तभी आंखों में आंसू भरे सब के सब शेर के पास जाकर बैठ गये। "क्यों भाई, कुछ खाने को मिला ?" शेर ने पूछा। कौवा बोला, “मालिक ! हम तो थक गए, हार गये.... पर कहीं कुछ नहीं मिला। इसलिए आज आप मुझे खाकर ही अपना पेट भर लें, इससे मुझे स्वर्ग मिलेगा। क्योंकि यह कहा गया है कि जो स्वामी के लिए खुशी से जान देता है, उसे मुक्ति प्राप्त होती है।”  कौवे की बात सुनते ही गीदड़ बोला, “नहीं भाई कौवे ! तुम तो बहुत छोटे हो । तुम्हें खाने से मालिक का पेट नहीं भरेगा, इसलिए मालिक मुझे ही खाकर अपना पेट भर लें, इससे मुझे भी मुक्ति मिलेगी।”गीदड़ के पश्चात् बाघ बोला, “नहीं भाई, तुम लोगों को मेरे होते हुए यह काम नहीं करना चाहिए। मैं अपने राजा के लिए अपना सारा शरीर देने को तैयार हूं, इससे मालिक की भूख भी पूरी तरह मिट जाएगी।"  अब की बार ऊंट ने भी अपने आपको पीछे न हटाया और उसे भी एहसास हुआ कि मुझे अपने भूखे मरते मालिक को बचाना चाहिए। उस सीधे-सादे जानवर को क्या पता था कि यह सब चालाक गीदड़ की चाल है । ऊंट भोलेपन में ही बोला “भाइयो, यदि तुम लोग मालिक के लिए अपनी जान दे सकते हो तो क्या मैं आपसे पीछे रह सकता हूं ! इसलिए मेरे मालिक, तुम मुझे खाकर अपना पेट भर लो।”
ऊंट के इतना कहते ही गीदड़ और बाघ उस पर टूट पड़े और देखते ही देखते उसे चार-फाड़ कर उसके टुकड़े-टुकड़े करके उसको स्वयं भी खाने लगे और साथ ही शेर के आगे भी डाल दिया। __“सो मेरे भाई, मुझे पता चल गया है कि जिस राजा का परिवार दुःखी है, उसकी सेवा नहीं करनी चाहिए। जिस राजा के मन्त्री ईमानदार न हों उससे प्रजा कभी खुश नहीं रहती।
जैसे गिधों के घिरे हंस से व्यवहार होता है। राजा गिध के समान और मन्त्री लोग हंस के समान होते हैं, ऐसे राजा की सेवा की जा सकती है अन्यथा नहीं। अवश्य ही किसी दुर्जन ने मुझसे इसे क्रुद्ध कर दिया है, तभी ऐसा है। कहा भी है-कोमल जल की निरन्तर रगड़ से पत्थर भी पिघल जाते फिर मनुष्यों के कोमल हृदय भेद-नीति कुशलों द्वारा कान भरते रहने से दृढ़ रह सकते हैं।”
बैल ने दमनक की ओर देखकर पूछा, “मित्र, मैं आपकी सच्ची बातों पर विश्वास करता हूं, किन्तु अब यह तो बताओ कि मैं क्या करूं?" ____"तम किसी और स्थान पर चले जाओ, ऐसे पापी राजा की सेवा करना बेकार है । यदि कोई गुरु भी पथ-भ्रष्ट हो जाए तो उसे छोड़ देना चाहिए।


"मगर मेरे भाई, शेर मेरा शत्रु तो नहीं है । यदि वह मुझसे नाराज़ है तो मैं जाकर उसे मना लूंगा।” “नहीं, वह घमंडी शेर मानने वाला नहीं है।” “नहीं मानेगा तो मैं उससे युद्ध करने के लिए तैयार हूं।"
दमनक समझ गया कि बैल हार मानने वाला नहीं। यदि इसने लडना - आरम्भ किया तो यह शेर को अपने सींगों से मार भी सकता है। कहीं ऐसा न हो मेरा मालिक मारा जाए। उसने सोचा कि किसी तरह से इसे यहां से भागने के लिए मजबूर करूं। - इसलिए उसने अन्तिम प्रयास करते हुए कहा“देखो भाई ! मालिक और नौकर में युद्ध कभी नहीं होना चाहिए।" “मेरे भाई ! लड़ने में दोनों पक्षों को नुकसान होगा। फिर शत्रु को अपने से कभी कमजोर न समझो। यह ज़रूरी नहीं कि जीत आप ही की हो।” “मगर मैं यहां से भागना नहीं चाहता मित्र।" “भागोगे नहीं तो फिर वही हाल होगा, जो सागर के किनारे वाले टिट्टिभ का हुआ था। लो सुनो मैं तुम्हें उस टिट्टिभ की कहानी सुनाता हूं।"