सुनो सबकी करो अपनी मर्जी-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 07:19 AM posted by Admin

एक बार एक जुलाहा अपने करघे को बनाने के लिए लकड़ियां लेने जंगल में गया तो उसने एक मोटा-सा वृक्ष देखकर उसने अपनी कुल्हाड़ी चलानी आरम्भ कर दी, तभी उस वृक्ष पर से एक प्रेत की आवाज़ आई"अरे मूर्ख, इसे मत काट, इस पर मेरा घर है।”"तेरा घर है तो मैं क्या करूं ? आखिर मुझे भी तो जाकर अपना करघा बनवाना है ।” जुलाहा बोला।“वाह..वाह. मैं तेरी बात से बहुत खुश हुआ। चल इसी खुशी में तू कोई वरदान मांग ले," प्रेत ने कहा।“यदि ऐसी बात है तो मैं घर जाकर अपने भाइयों एवं मित्रों से पूछ कर आता हूं।

यह कहकर जुलाहा अपने गांव वापस आ गया, उसे आते ही सबसे पहले एक नाई मिला। उसने उससे पूछा भाई मैं उस प्रेत से क्या माँगे-तो नाई ने कहा, भैया यदि कुछ मांगना ही है तो उससे राजपाट माँग जिससे तू राजा बन जाए और मैं तेग पीस प्रकार हम दोनों मित्र आनन्द लेंगे। बात दश हुआ, किन्तु उसने सोचा ज़रा अपनी हनाई ने कहा, “भाई औरतों की बुद्धि स्त्री सलाहकार होती हो, दंड रहित ष्ट हो जाता है।" बात न मानी वह सीधा घर जाकर अपनी वरदान देने को कहा है, मेरा मित्र नाई कहता है अब तुम बताओ कि मैं क्या माँगू ?" है पता न छोटी जाति वाले से सलाह या ज्ञान ! यदि हमें मिल भी उस प्रेत से कहो कि मुझे दो । ओर मुँह करके दुगुना कपड़ा दुगुनी हो जाएगी।” शहुआ । नाई की बात को भूलकर पर और दे दे।”

“ठीक है-जाओ तुम्हारी इच्छा पूरी होगी, बस इस आवाज़ के साथ जुलाहे के दो सिर और चार बांहें हो गईं।" जुलाहा खुशी-खुशी घर लौट रहा था, तो रास्ते में लोंगो ने जैसे ही उसके दो सिर और चार बाजू देखे तो उसे राक्षस समझ ईंटों-पत्थरों से मारना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार वह जलाहा बेमौत मारा गया, तभी तो मैं कहता हूं कि सुनो सबकी परन्तु मर्जी अपनी करनी चाहिए। उस कहानी को सुन चक्रधर ने कहा, "भाई यह तो ठीक है, किसी ने ठीक ही कहा है-जो मनुष्य पूरी न होने वाली असम्भव चिन्ता करता है, वह सोम शर्मा के पिता की भांति हानि उठाता है।"“वह कैसे  "लो मैं तुम्हें उसकी कहानी सुनाता हूँ