शत्रु को कभी कमजोर न जानो-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 03,2021 07:49 AM posted by Admin

एक सागर के किनारे एक टिट्टिभ का जोड़ा रहता था । इन दोनों पति-पत्नी का जीवन बड़े आनन्द से व्यतीत हो रहा था। एक बार जब टिट्टिभ की पत्नी को बच्चा पैदा होने वाला था तो उसने अपने पति से कहा कि हमें कोई ऐसा सुरक्षित स्थान ढूंढना चाहिए जहां पर हम लोग अपने अण्डे दे सकें।

उसके पति ने कहा, “भाग्यवान ! यह सागर तट बड़ा ही सुन्दर है । हम क्यों न यहीं पर रहें ! तुम यहीं पर अण्डे दे दो, यहीं पर हमारे बच्चे होंगे।” _ “नहीं पतिदेव, आप यह भूल कर रहे हैं। आपको पता नहीं कि पूर्णिमा की रात को समुद्र बढ़ता है, उस समय यह हाथियों को भी अपने साथ बहा कर ले जाता हैं |

टिट्टिभ ने हंसकर कहा, “यह तुमने ठीक कहा, पर समुद्र की क्या मज़ाल है, जो हमारे अण्डों को बहा ले जाए । क्या तुमने नहीं सुना कि आकाशचारियों को रोकने वाले धूम्र रहित आग में कौन घुस सकता है ? (कोई नहीं) संसार में ऐसा कौन पागल है जो यह कहे कि यदि तुम में शक्ति है तो मेरे प्राण ले लो। इसलिए निडर होकर यहीं अण्डे दे । तुमने सुना नहीं है कि जो हार के डर से अपने स्थान को छोड़ देता है, उस मनुष्य से माता यदि पुत्रवती है तो बंध्या किससे कहा जाए ?

समुद्र जो इनकी बातें सुन रहा था। उसने सोचा कि यह पक्षी तो बड़ा अभिमानी है, इसीलिए यह रात को सोते समय पांव ऊपर को करके सोता है कि कहीं रात को आकाश टूट कर नीचे आ गिरे तो मैं उसे अपने पांव पर ही रोक लूं। संसार में मन-माना गर्व किसे नहीं होता, इसलिए मैं देखता हूं कि इसकी बात में कितनी ताकत है। इतना सोचकर समुद्र शांत बैठा रहा और उस समय की प्रतीक्षा करता रहा, जब यह टिट्टिभ अण्डे दे। आखिर वह समय आ गया। टिट्टिभ ने अण्डे दिये। समुद्र जो इसी समय की प्रतीक्षा में था, टिट्टिभ के जाते ही ज्वार-भाटा ले आया और देखते ही देखते अण्डे उस पानी में बह गए।
जब टिट्टिभ और उसका पति रात को वापस लौटे तो वह नाम तक नहीं था। टिट्टभी रोते हुए बोली, जो किसी की अच्छी मानता उसका यही दःखदायी अन्त होता है । वह काठ से गिरे कला नष्ट होता है।
"वह कैसे ?" टिट्टिभ ने पूछा। लो वह कहानी सुनो