सेर को सवा सेर-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 03,2021 08:45 AM posted by Admin

एक नगर में जीर्णधन नाम का एक बनिया रहता था। एक बार उसे कारोबार में घाटा पड़ गया तो वह दुःखी होकर परदेस जाने की बात सोचने लगा। बाहर जाने के लिए भी धन की ज़रूरत थी। उसने अपनी इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए अपने पूर्वजों का तराजू किसी के पास गिरवी रखकर उससे कुछ रुपये उधार ले लिए।
कुछ समय के पश्चात् जैसे ही वह परदेस से धन कमाकर वापस आया तो उसने सबसे पहले अपनी तराजू वापिस लेनी चाही, लेकिन जैसे ही वह उस आदमी के पास पहुंचा और अपनी तराजू वापिस लेने के लिए कहा तो वह बोला

"भाई, उस तराजू को तो चूहे खा गये हैं।"तब जीर्णधन ने बड़े धैर्य से कहा, “कोई बात नहीं मित्र ! ऐसा हो ही जाता है । अब मैं जरा नदी पर नहाने जा रहा हूं, तुम अपने लड़के के हाथ नहाने का सामान नदी पर भेज देना । उस साहूकार ने झट से अपने बेटे को बुलाकर उसे नहाने का सामान नदी पर ले जाने के लिए कहा। साहूकार का बेटा सामान ले नदी पर चला गया, उस व्यक्ति ने नदी में नहाकर उस साहूकार के लड़के को गुफा में बन्द कर दिया और द्वार को बहुत बड़े पत्थर से बन्द कर दिया।

जैसे ही वह वापस साहूकार के पास आया तो उसने पूछा, भाई मेरा लड़का कहां है ? "अरे भाई ! उसे तो नदी तट से बाज उठाकर ले गया।" तब साहूकार चीखकर बोला, “झूठे कहीं के, क्या बाज भी बालक को ले जा सकता है ? तू मेरा पुत्र मुझे ला दे नहीं तो मैं जाकर राजा से कहूंगा।"

जीर्णधन झट से बोला, “यदि लड़के को बाज उठाकर नहीं ले जा सकता तो लोहे की तराजू को चूहा कैसे खा सकता है ? इसलिए मैं प्रार्थना करता हं कि मेरा तराजू मुझे दे और अपना लड़का ले ले।
इस प्रकार से दोनों झगड़ा करते हुए राजा के पास पहुंचे । साहूकार ने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कहा “अनर्थ हो गया, अनर्थ हो गया, इस चोर ने मेरा पुत्र चुरा लिया, तब राजा ने इन दोनों को बुलाया और जीर्णधन से बोला “अरे, भाई तुम इसका बेटा वापिस दे दो।”

"महाराज ! यह मेरे वश की बात नहीं, उसे तो मेरे देखते-देखते नटी तट से बाज उठाकर ले गया।"राजा ने कहा, “यह झूठ है । भला कभी बाज भी बालक को उठा सकता है ?" वन जीर्णधन बोला, “महाराज मेरी तो सुनिए, यदि एक लोहे की भारी तराज को चूहे खा सकते हैं तो एक बालक को भी बाज ले जा सकता है।" राजा ने आश्चर्य से पूछा- “यह कैसे ?" तब जीर्णधन ने राजा को आरम्भ से लेकर अन्त तक सारी कहानी सना दी।

तब राजा ने उन दोनों से कहा, “भाई, तुम्हारा झगड़ा तो कुछ नहीं, अब तुम उसका तराजू वापस दे दो, वह तुम्हारा पुत्र वापिस दे देगा । न तराजू को चहे खाते हैं और न ही लड़के को बाज उठाते हैं।"
“सो मेरे भाई ! बैल के प्रति शेर की कृपा दृष्टि को न सहन करते हुए यह सब किया है। तूने हित को भी अहित में बदल दिया है। कहा भी है-. "विद्वान शत्रु भी अच्छा, किन्तु मूर्ख मित्र अच्छा नहीं । जैसे बन्दर ने राजा को मार दिया, पर चोर शत्रु ने पण्डितों की रक्षा की।" दमनक ने पूछा-वह कैसे ? वह बोला