पापी मित्र-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 04:55 AM posted by Admin

एक कुएं में गंगादत्त नाम का मेंढक राजा रहता था। एक बार वह अपने दामादों से बड़ा परेशान था यहां तक कि उसे एक दिन इनके कारण उसे अपने घर से बेघर होना पड़ा । घर छोड़ने के पश्चात् उसने सोचा कि अब मैं इनसे बदला कैसे लूँ। इतने में उसने बित में घुसते हुए सांप को देखा, उसे देखकर उसने सोचा कि क्यों न इस सांप को कुएं में ले शत्र से भिड़वा दें। जैसे कांटे को कांटे से निकाला जाता है । यही सोचकर उसने बिल के पास जाकर कहा, “प्रियदर्शन आइए... आइए।

सांप ने मेंढक को देखकर कहा, यह तो मेरी जाति का ही नहीं और किसी से मैं मिलता नहीं, क्योंकि कहा गया है जिसके कुल का कोई पता न हो उससे मित्रता न करो। यही सोच सांप ने कहा “भाई आप कौन हो ?” “भाई ! मैं गंगादत्त नाम का मेंढक हूं जो आपसे मित्रता करने के लिए यहां आया हूं।" “भाई ! यह बात मानने योग्य नहीं है। भला आग और पानी का भी कभी मेल हो सकता है ?" “आप ठीक कहते हो नाग देवता ! इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी और आपकी पुरानी दुश्मनी चली आ रही है। मगर मैं भी मजबूर होकर आपके पास मदद के लिए आया हूं।"


“क्या मजबूरी है आपकी ?" "भाई, मुझे मेरे ही दामादों ने मिलकर इतना तंग किया कि मुझे सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा।" “तुम रहते कहां हो ?" “मैं पत्थरों के कुएं में रहता हूं।” "लेकिन मैं तो वहां तक नहीं जा सकता, क्योंकि हमारे पांव नहीं होते। यदि किसी तरह मैं पहुंच भी गया तो वहां पर ऐसा कोई स्थान नहीं जहां पर बैठकर मैं आपके दामादों को खा सकूँ।” आप वहां जाने की चिन्ता न करें, मैं किसी न किसी भांति आपको वहां पर पहंचा दंगा।

वहां पर खोखड़ा है जहां पर बैठ कर उन्हें खा सकोगे। सांप ने सोचा कि मैं बूढ़ा तो हो ही चुका हूं, मेरे को अब शिकार भी कमजाकर उन दामादों को समाप्त कर डालं । इसी के लिए कहा है अपने काम के सिद्धि के लिए बलवान शत्रु को उससे भी बलवान ही मिलता है, क्यों न चलकर उन मेंढकों को ही खाकर अपना पेट भर लूं। जादी सोचकर उसने कहा कि चलो भाई मैं तुम्हारी मदद के लिए चलता हूँ । "चलो नाग देवता, मैं तुम्हें बड़े आराम से ले चलता हूं पर इस बात का भयान रखना कि मेरे साथियों की रक्षा करना जिन लोगों को मैं बोलूं उन्हीं को खाना।" "हां भाई, अब हम दोनों मित्र बन गए हैं। मैं तो अब केवल आपके कहने पर ही सारा काम करूंगा।"

फिर दोनों मित्र रहट की बाल्टी में बैठ कुएं तक पहुंच गए, कुएं में एक खोखड़ा था वहीं पर मेंढक ने सांप को बैठाकर अपने दुश्मनों की ओर इशारा कर दिया था। सांप उन मेंढकों को एक-एक करके खाने लगा था। धीरे-धीरे सारे शत्रुओं को सांप ने खा लिया, जब और कोई शत्रु बाकी न रहा तो सांप ने मेंढक से कहा “अरे भाई, तुम्हारे शत्रु तो सबके सब मैंने खा लिए, अब यह बताओ कि मेरी भूख का क्या इलाज है "ठीक है नाग महाराज ! अब आप बड़े आराम से यहां से जा सकते हो।

सांप ने क्रोध से कहा, “अब मैं कहां जाऊं? मेरे तो बिल पर भी किसी और ने अधिकार जमा लिया होगा? अब तो तुम अपने परिवार के लोगों में से ही मेरे खाने का प्रबन्ध करो, नहीं तो मैं सबको ही खा जाऊंगा।"मेंढक बेचारा तो फंस गया और अपनी भूल पर पछताने लगा, वह सोच रहा था कि काश मैं इस सांप को यहां न लाता, ठीक कहा है जो अपने से बलवान शत्रु से मित्रता करता है, वह स्वयं ही जहर खाता है । इससे बचने का ' तो एक ही रास्ता है कि इसे एक-एक मेंढक रोज़ दिया करूं।

इस प्रकार वह खूनी सांप हर रोज़ एक मेंढक खाने लगा, एक दिन सांप का मंढकों को खाने के पश्चात् गंगादत के पुत्र को भी खा डाला, इस गगादत्त बहुत दुःखी हो गया और रोने लगा, तब उसकी पत्नी ने कहा अब क्यों रो रहे हो मर्ख ! तमने तो अपनी जाति को ही समाप्त करवा डाला, दुःख के समय जाति के लोग ही काम आते हैं। इसलिए यहां से भाग निकलो-' लेकिन गंगादत्त वहां से भागा नहीं और उसका मित्र धीरे-धीरे सारे परिवार को भी खा गया। अन्त में वह गंगादत्त से कहने लगा“देखो !तुम ही मुझे यहां पर लाए हो, अब तुम ही मेरे भोजन का प्रबन्ध करो।" तभी मेंढक राजा को एक चाल सझी और वह सांप से बोला “नागराज ! मैं जानता हूं कि तुम भूखे हो, इसलिए मैं अभी जाकर दूसरे कुएं से मेंढकों को फंसाकर यहां पर लाता हूं बस आप उन्हें खाते रहना।” "हो... हां...जाओ... भाई... जाओ... मेरे लिए भोजन का प्रबन्ध करो तम ही तो अब मेरे सच्चे मित्र हो।” बस यहां से अपनी जान बचा गंगादत्त भाग निकला, सांप उसकी प्रतीक्षा करता रहा, जब कई दिन तक वह न आया तो उसने अपने साथ रहने वाली एक गोह से कहा कि बहन जाओ तुम ही पास वाले कुएं से गंगादत्त को बुला लाओ।

गोह जैसे ही गंगादत्त के पास गई तो वह बोला "जाओ, उस प्रियदर्शन से कह दो कि अब गंगादत्त तुम्हारे जाल में नहीं फंसेगा, तुम तो पापी हो ! दुष्ट हो—किसी पापी का विश्वास नहीं करना चाहिए। इसलिए पापी मगरमच्छ, अब मैं भी गंगादत्त की भांति तुम्हारे घर नहीं जाऊंगा।" मगरमच्छ बोला, “यदि तुम मेरे घर नहीं चलोगे तो मैं यहीं पर भूखा मर जाऊंगा।" “अरे मैं क्या मूर्ख लम्बकरण हूं जो मुसीबत को देखकर भी अपने को मरवाऊं।“वह कैसे ?" मगरमच्छ बोला। लो सुनो उसकी कहानी