पापी का फैसला-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 01:53 AM posted by Admin

पहले मैं एक वृक्ष पर रहता था। उसी वृक्ष के नीचे एक गौरैया रहता था। हम दोनों में बड़ी मित्रता थी। हम लोग देवी-देवताओं की पूजा, ब्राह्मणों का आदर, वेदों का पाठ करते । जंगल में घूमते अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक दिन गौरैया अपने दूसरे साथियों के साथ धान के खेत में गया। उस दिन जब वह रात तक भी वापस न आया तो मेरे को बड़ी चिन्ता हुई। मैं डर रहा था कि मेरा मित्र किसी जाल में तो नहीं फंस गया अथवा किसी पापी ने उसे मार डाला हो। इस प्रकार कई दिन बीत गए, किन्तु मेरा मित्र वापस न आया । एक दिन शाम के समय एक खरगोश मेरे मित्र के बिल में घुसता नजर आया। मैंने सोचा अब इसखरगोश को यहां से नहीं भगाना चाहिए। 

क्योंकि गौरैया के स्थान पर यहीं पर मेरा मन लगाए रखेगा । इस प्रकार वह खरगोश वहीं पर रहने लगा।तभी क्या एक दिन गौरैया भी परदेश से जब मोटा-ताजा होकर वापस आ गया। उसने आते ही अपने घर में घुसे खरगोश से कहा कि भाई, तुम मेरा घर खाली कर दो।खरगोश ने कहा, “अरे यह तुम्हारा घर नहीं मेरा है । तुम यहां क्या करने आए हो । तुमने सुना नहीं कि स्मृति में लिखा है, कुआं, तालाब, देवालय और वक्षों को एक बार छोड़कर दोबारा इन पर अपना अधिकार नहीं जमा सकता। दस वर्ष जिसने किसी जगह का भोग किया हो, उसके भोग ही प्रमाण है गवाह या लेख नहीं । यह नियम मनुष्यों के लिए मुनियों ने बनाया है, परन्तु पशु-पक्षी का अधिकार तब तक ही रहता है जब तक वे यहां रहते हैं।”गौरैया बोला, “अरे भाई ! यदि तुम इन धार्मिक बातों पर विश्वास रखते हो तो चलो चलकर किसी विद्वान से फैसला करवा लेते हैं।”

"ठीक है, चलो !” खरगोश इतना कहकर उसके साथ चल पड़ा । मैं भी दोनों के झगड़े का अन्त देखने के लिए इनके पीछे-पीछे चलने लगा था। इन दोनों को अपनी ओर आते देखकर एक मोटा-सा काला बिल्ला नदी के तट पर जा तीन पांव पर खड़ा हो अपने आप ही बोलने लगा "भाई, यह संसार आसार है, जीवन व्यर्थ है । इन्द्रजाल के समान यह परिवार है, सो धर्म को छोड़कर और कोई रास्ता नहीं। कहा भी है—यह शरीर सदा नहीं रहता, मौत सदा रहती है। इसलिए धर्म कार्य करना चाहिए। वृक्ष से अधिक प्रिय तो उसके फल और फूल होते हैं । दूध से घी अच्छा । दूसरों को दुःख देना पाप है । मानव सेवा सबसे अधिक पुण्य है।" बिल्ले को नदी तट पर धर्म उपदेश देते देख खरगोश ने गौरैये से कहा, "देखो भाई, यह काफी धर्मी लगता है। इसके पास चल कर हम न्याय करवा लें।”

“ठीक है, यह कह दोनों उस बिल्ले के पास जाकर बोले, हे धर्म पुत्र ! हमारा एक झगड़ा है। आप धर्म को सामने रखकर हमारा फैसला कर दें। जो हममें से झूठ बोलेगा उसे खा जाना।"बिल्ला बोला, “भाइयो, यह पाप की बात मत कहो । नर्क में गिरने वाले मार्ग से मैं हट गया हूं । अहिंसा ही धर्म मार्ग है, कहा भी है, क्योंकि सज्जनों ने अहिंसा को ही धर्म माना है, उन्होंने कहा है कि जूं, खटमल आदि की भी रक्षा करें। भाई जीव हत्या सबसे बड़ा पाप है, सो मैं तुम्हें खाऊंगा नहीं, हां तुम्हारी हार-जीत का फैसला कर दूंगा। मैं बूढ़ा हूं दूर से तुम्हारी बात नहीं सुन सकता, सो मेरे पास जाकर अपनी-अपनी बात कहें जिससे मैं ठीक फैसला कर सकूँ । कहा भी गया है जो मान से, लोभ से और क्रोध से भय से जो झूठ कालता है वह नर्क में जाता है । सभा में जो साफ बात नहीं करता। वह कैसा सला करता हो उसे दूर से छोड़ दो। इसलिए बेधड़क होकर मेरे पास आओ साफ़ साफ़ कहो 

इस प्रकार उस पापी ने उन दोनों को ऐसा विश्वास दिलाया कि वे उसके पास पहुंच गए। तब उस पापी ने एक साथ ही उन दोनों को पकड़ लिया। एक को पंजों से दूसरे को मुंह मारकर खा गया । इसलिए मैं कहता हूं नीच स्वामी जी भांति यदि तुम इस उल्लू को राजा बनाओगे तो रात के अंधे की भांति, खरगोश और गौरैया की भांति मारे जाओगे। _कौवे की बात सुनकर सभी पक्षी कहने लगे कि यह बिल्कुल ठीक कहता है। अब हम फिर कभी मिलकर राजा का चुनाव करेंगे। यह कहकर सबलोग चले गए। केवल उल्लू अपनी पत्नी के साथ वहां पर बैठा रह गया और बोला कोई है ? क्या मेरा राजतिलक नहीं करोगे ?" __ कोयल बोली, “भाई उल्लू ! कौवे ने आपके राजतिलक में बाधा डाल दी है ।

अब तुम राजा नहीं बन सकते, फिर सभी पक्षी अपने-अपने स्थानों को जा चुके हैं अब तो केवल एक वही कौवा बाकी बैठा रह गया है। यदि तम चाहो तो इससे ही बात कर सकते हो।”उल्लू उस कौवे की ओर घूरकर देखा और बोला“क्यों रे दुष्ट ! मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था जो तूने मेरे राजा बनने में रोड़ा अटकाया ? याद रख आज से तेरी और हमारी पारिवारिक दुश्मनी हो गई। विद्वान यही कहते हैं कि तलवार का घाव भर सकता है लेकिन जबान से निकाले बुरे शब्दों का जख्म कभी नहीं भर सकता । यह कहकर उल्लू अपने घर की ओर चला गया। इसके साथ ही कौवे और उल्लू की दुश्मनी शुरू हो गई थी। ठीक ही कहा है कि विद्वान को चाहिए कि सभा में किसी की निन्दा न करे।

”उल्लू के जाने के पश्चात् कौवा भी उड़ गया। इस प्रकार हमारा और कौवे की जातिगत शत्रुता आरम्भ हो गई थी। कौवों का राजा बोला कि अब हमें क्या करना चाहिए ?उसने कहा कि महाराज, ऐसी हालत में भी बुरे रास्ते के अलावा एक और महान् मार्ग है, उसको अपनाकर मैं स्वयं विजय के लिए जाऊंगा और दुश्मन को धोखे से मारूंगा, कहा भी है कि बुद्धिमान और ज्ञानी बलवान शत्रु को भी उस प्रकार छल लेते हैं जैसे ठगों ने ब्राह्मण से बकरा ठग लिया था।राजा बोला, यह कैसे? उसने कहा, लो सुनो