कूटनीति से शत्रु को मारो-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 04:41 AM posted by Admin

एक बार वर्ण पर्वत में एक बूढ़ा काला सांप रहता था। वह बेचारा यह सोचता रहता कि मैं क्या करूं जिससे मेरा पेट भरता रहे एक दिन वह ऐसे तालाब पर चला गया जहां पर बहुत से मेंढक रहते थे। वहां पर जाकर वह बड़े धैर्य से एक कोने में बैठ गया। उसे इस प्रकार बैठे देखकर एक मेंढक ने पूछा1- “मामा जी, क्या बात है आजकल आप बड़े आराम से बैठे रहते हैं ? और कहीं जाते भी नहीं ?" - "भाई ! मैंने कहां जाना है । मैंने शाम को एक मेंढक को देखा जो अपना भोजन ढूंढ रहा था। मैं उसे पकड़ने चला ।

वह भी मुझसे डर के मारे भागकर एक ब्राह्मणों के झुंड में घुस गया, बस मुझे पता नहीं कि फिर वह कहां गया। मगर मैंने क्रोध में आकर एक ब्राह्मण के लड़के को काट दिया जिससे वह मर गया। उसके मरने पर उस ब्राह्मण के बाप ने मुझे शाप दिया क्योंकि तूने मेरे बेगुनाह बेटे को काटा है, जा तू अब मेंढकों की सवारी बनेगा, इसीलिए मैं यहां पर चुपचाप बैठा हूं ताकि आप लोग मेरी सवारी करें और ब्राह्मण का शाप भी पूरा हो जाए।

उस मेंढक ने यह बात अपने राजा को सुनाई । मेंढक राजा ने अपने सारे मेंढकों को इकट्ठा करके कहा, “चलो आज हम सब उस सांप की सवारी करेंगे जो हमारा पुराना शत्रु है।" - इस प्रकार सब के सब मेंढक तालाब से बाहर आकर उस सांप की पीठ पर बैठ गए, जिनको पीठ पर जगह न मिली वह वैसे ही उसके पीछे भागने लगे। इस प्रकार सांप उन्हें अपनी पीठ पर लाद तेज़ी से चलने लगा। पूरा दिन मेंढक सांप की सवारी का आनन्द लेते रहे । दूसरे दिन सांप धीरे-धीरे चलने लगा। उसे धीरे जलते देख मेंढक राजा बोला“अरे भाई, आज तुम इतना धीरे क्यों चल रहे हो ?

महाराज ! मैं क्या करूं मुझे भूख लग रही है।" "यदि तम्हें भूख लग रही है तो मेरे छोटे मेंढकों को खाकर अपना पेट भर लो।”इस तरह से सांप को भोजन मिलने लगा, वह रोज़ ही थोड़े मेंढक खा लेता और फिर चलता रहता। एक दिन रास्ते में उसे एक और काला सांप मिला, उसने जैसे ही मेंढकों को सांप की पीठ पर चढ़े देखा तो हैरानी से पूछने लगा “अरे भाई ! यह क्या, जो लोग हमारे भोजन के काम आते हैं उन्हें आप अपनी पीठ पर बेठाए आ रहे हो ?" वह बोला, “भाई ! देखो मैं बूढ़ा सांप हूं अधिक भाग-दौड़ मुझसे नहीं होती, मैं तो अपनी बुद्धि से ही अपना पेट भर रहा हूं, देखो बहुत से मेंढक मैंने खा लिए हैं, जो रह गए हैं वह भी मेंढकों का राजा फिर भी उसकी चाल को न समझ सका, उसने सांप को तेज चलने के लिए कहा, फिर अब रह ही क्या गया था वही राजा ।

काले सांप ने उसे भी अपना भोजन बना लिया। “हे राजा ! मैंने भी इसी प्रकार अपनी बुद्धि से इन उल्लुओं का सर्वनाश किया है । जो शक्ति बुद्धि में है वह इंसान में नहीं होती।" कौवा राजा अपने इस साथी की बात सुनकर बहुत ही खुश हुआ। उसने कहा वास्तव में असली शक्ति बुद्धि में है और नीति शास्त्र इसकी जड़ है। नीति शास्त्र से ही लोग शत्रुओं के गढ़ में घुस कर भी उनका नाश कर देते “आप ठीक कहते हैं महाराज ! युद्ध में नीति शास्त्र का ही विशेष स्थान, है। इससे हम बड़े से बड़े शत्रु को भी हरा सकते हैं। अब तो आपको भी भविष्य में ऐसी किसी चाल से बचना होगा जो हमने चली है। हमें यह सब याद करना चाहिएकौरवों की हार रावण का मारा जाना।

पांडव वनवास। यह सब नीति शास्त्र की ही देन है । इन्द्र के मित्र महाराज दशरथ कहां गए ? समुद्र तट को बांधने वाले राजा कहां हैं ? महाराज वेणु और सूर्य पुत्र मन कहां हैं ? निश्चय ही समय ने इन्हें बलवान बनाया और फिर मृत्यु की गोद में सुला दिया। ऐसे ही बड़े बड़े अनेक अवतार यहां से चले गए, इस संसार में कुछ अपना नहीं, इस लक्ष्मी को पाकर हमें मानवता को कभी नहीं भूलना चाहिए।