केवल एक बार-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 05:06 AM posted by Admin

एक जंगल में एक शेर रहता था, उसका एक सेवक गीदड़ सदा उसके साथ रहता था। एक बार हाथी के साथ युद्ध करते समय शेर के शरीर पर कितनी ही चोटें आईं जिससे वह एक कदम चलने के काबिल न रहा। वह बेचारा उसी जंगल में पड़ा रहा और भूखा मरने लगा। वह गीदड़ बेचारा भी भूखा मरने लगा, क्योंकि शेर ज़ख्मी था जिसके कारण वह शिकार नहीं कर सकता था। तभी उस गीदड़ ने शेर से कहा, मालक अब मैं क्या करूं मैं तो अब भूखा मरने लगा हूँ ? "अरे मित्र, घबराओ मत, जाओ जाकर कोई ऐसा जानवर देखो जिसे मैं जख्मी हालत में भी मार सकू।" सुनकर गीदड शिकार की तलाश करते-करते एक गांव में चला गया, एक गधा बड़े आराम से छोटी-छोटी घास चर रहा था। "मामा जी, मेरा प्रणाम स्वीकार करो।” गीदड़ ने उसके पास जाकर कहा। “आओ मित्र ! तुम कहां से आ गए “अरे मामा ! मैंने जैसे ही तुम्हें इतना कमज़ोर होते देखा तो मेरा दिल डूबने लगा। क्या धोबी तुम्हें खाने को नहीं देता “नहीं भाई !“मामा, जहां पेट भर खाने को न मिले वहां रहने से क्या लाभ ? तुम मेरे साथ जंगल में चलो, वहां पर तुम्हें खाने को खूब मिलेगा।"


"भाई, मुझे जंगल से डर लगता है, क्योंकि हम लोग गांव में रहने वाले सीधे-सादे जानवर हैं।“मामा ! तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो, मैं जो तुम्हारे साथ हूं। मेरे होते हुए तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। मेरे पास पहले भी तीन गधियां रहती हैं जिन्हें धोबी ने खाने को कुछ नहीं दिया था। वास्तव में उन गधियों ने ही मुझे कोई पति लाने को कहा है। आपके जाने से मेरी मामियों का घर भी बस जाएगा।" गधे ने कहा, “यदि ऐसी बात है तो चलो मैं तुम्हारे साथ चलता हूं।"गधा उस गीदड़ के साथ उस घायल शेर के पास पहुंच गया, जैसे ही गधे ने शेर को उठकर अपनी ओर आते देखा तो वह यहां से भाग निकला। जैसे ही गधा यहां से भागा तो गीदड़ ने शेर से कहा-“आपने तो मुंह आए शिकार को भी खो दिया, अब क्या होगा “सेवक, वास्तव में मैं उस समय तैयार नहीं था, तभी वह मेरे हाथ से निकल गया। “ठीक है मैं उसे दुबारा फंसाकर लाता हूं लेकिन यह ध्यान रखना अब की बार वह न निकल जाए।

यह कहकर गीदड़ एक बार वहां से फिर निकल पड़ा, उसने रास्ते में गध को घास चरते देखा और बोला, “मामा ! तुम वहां से भाग क्यों आए "अरे वाह भांजे ! तूने तो आज मुझे मरवा डाला था। वह तो कोई खूनी शेर लगता था, जो जख्मी पड़ा था। “वाह मामा ! वाह ! बस आपने भी कमाल कर दिया, आपने तो उस गधी को ही शेर समझ लिया, जो आपसे गले मिलने के लिए आ रही थी। वह बेचारी तो आपके प्रेम में बैठी जल रही है और कहती है कि मैं तो उसी गधे से ही शादी करूंगी।

गीदड़ की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर गधा फिर वहां से चल पड़ा। ठीक ही कहा है कि मनुष्य कभी-कभी वह काम भी कर बैठता है जिससे उसे खतरा हो। 'गधे के वहां पहुंचते ही शेर ने झट से उसे मार डाला और उसके टुकड़े-टुकड़े करके गीदड़ के आगे डाल दिए, गीदड़ ने उसके कान और हृदय खा लिए।जैसे ही शेर वापस आया तो उसने गधे के कान और हृदय न देखकर गीदड़ से कहा कि पापी यह तूने क्या किया जो मेरे आने से पहले ही मेरा शिकार खा गया।

"मालिक आप भल रहे हैं। इस गधे के पास कान और दिल थे ही नहीं, यदि इसके पास ये चीजें होती तो वह वापस ही क्यों आता ? शेर ने गीदड़ की बात पर विश्वास कर लिया। “इसलिए हे मूर्ख, तूने मुझसे छल किया और युधिष्ठिर के समान सत्य बोलने से नष्ट हो गया, सच कहा है जो मूर्ख स्वार्थ का ख्याल न करके सच बोल देता है, वह युधिष्ठिर की तरह अपना काम खराब कर लेता है।”आप भूल होती तो बलियाबन्दर ने कहा, “वह कैसे ?” “लो सुनो उसकी कहानी