रूपक सेठ की धुन -पंचतंत्र की कहानियां

Apr 06,2021 01:07 AM posted by Admin

एक छोटा-सा नगर था, जिसमें एक व्यापारी रुपक रहता था। रुपक के पिता उसके लिए काफी धन और अच्छा व्यापार छोड़ कर गये थे, किन्तु फिर भी उसके दिल में और अमीर बनने की लालसा बनी हुई थी। यही सोच हर समय उसके दिमाग में योजनाएं घूमती रहती थी। अधिक धनवान कैसे बनूं? धनवान बनने के लिए कौन-कौन से रास्ते हैं। वह रातों का चारपाई पर लेटा-लेटा यही सोचा करता था कि अधिक अमीर कैसे बनूं। काफी सोच-विचार के बाद उसे विदेशों में व्यापार करने का विचार आया। दूसरे ही दिन उसने साथियों को इकट्ठा करके योजना को विस्तार से बताया और इन सबने यह फैसला कर लिया कि इस छोटे कस्बे में हम किसानों से सस्ता अनाज और लकड़ियां आदि खरीदकर बड़े शहर में ले जाकर मंहगे भाव में बेचेंगे। इस प्रकार हम अमीर बन जायेंगे।


क्योंकि रुपक पहले से ही गांव में धनी माना जाता था। उसकी बात सुनते ही सभी खुश हो गए और रुपक के साथ जाने को तैयार भी। बस फिर क्या था, देखते-देखते सारी तैयारियां पूरी हो गई। एक मजबूत सी बैलगाड़ी खरीदी गई, जिसमें गाँव वालों से सस्ते दामों पर माल खरीदकर भर लिया गया। उस गाड़ी को खींचने के लिए बढ़िया बैल खरीदे गए।इस प्रकार से रुपक सेठ अपने साथियों के साथ उस माल से भरी बैल गाड़ी को लेकर शहर की ओर चल पड़ा।बैलगाड़ी पर बोझा कुछ अधिक लाद दिया गया था, जिसका फल यह निकला कि घने जंगल में जाकर एक बैल मर्छित होकर गिर पड़ा। उसकी एक टांग भी टूट गई। इस प्रकार रूपक और उसके साथी काफी चिंतित हो गए। वे करते भी क्या? चिंता के मारे उसका बुरा हाल हो रहा था। एक ओर तो घने जंगल में जंगली जानवरों का डर, दूसरी ओर चोरों का, अतः रूपक ने बैल को उसके हाल पर वहीं छोड़ दिया और किसी प्रकार अपने साथियों की मदद से आगे बढ़ा

दूसरी ओर जख्मी बैल जंगल की हरी-भरी घास और ताजी हवा खा-खाकर दिन-प्रतिदिन ठीक होता गया। उसकी टांग भी धीरे-धीरे ठीक हो गई। अब वह जंगल में खाता-पिता मौज मारता, रात को किसी वृक्ष के नीचे जाकर सो जाता। इस प्रकार वह कुछ ही दिनों में मोटा-ताजा हो गया। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे वह बैल ही वास्तव में इस जंगल का राजा हो। कुछ ही दिनों में पिगलक नाम सिंह पानी पीने नदी के पास आया। तभी बैल ने जोर से हंकार भरी जिससे पास सारा जंगल गूंज उठा। पिगलक सिंह ने इतनी भयंकर आवाज पहले कभी नहीं सुनी थी। वह घबरा गया और बिना पानी पिए ही वहां से भाग खड़ा हुआ। उसे देख दूसरे जंगली जानवर भी भाग खड़े हुए। उसी जंगल में उस सिंह के मंत्री के दो पुत्र कारटक व दमनक रहते थे। वे अपने राजा का पूरा आदर करते थे। जैसे ही उन्होंने सिंह को नदी से प्यासा लौटते देखा तो दमनक बोला-“भाई करटक, हमारा स्वामी तो नदी किनारे से प्यासा लौटा आया। अब तो बेचारा बड़ा शर्मिन्दा हुआ बैठा है। जंगल का राजा होकर वह पानी भी नहीं पी सका।" करटक बोला-“भाई दमनक, हमें भला इन बातों से क्या लेना है। बड़े लोग कह गए हैं जो भी दूसरों के काम में बिना मतलब अपनी टांग अड़ाता है वह बेमौत मरता है। जैसे एक कील उखाड़ने वाले, बंदर की कहानी तुमने सुन रखी होगी।'
“नहीं भैया, मैंने तो उसकी कहानी नहीं सुनी।" तो पहले यह कहानी सुन लो-इतना कह कर दमनक,करटक को कहानी सुनाने लगाः