धोखा केवल एक बार - पंचतंत्र की कहानियां

Apr 03,2021 07:34 AM posted by Admin

एक बार किसी जंगल में चंडख नामक एक शृंगाल (गीदड़) रहता था। एक बार वह भूख के कारण एक नगर में घुस गया। बस फिर क्या था नगर के कुत्ते उसे देखते ही भौंकने लगे। कुत्ते उसके पीछे-पीछे थे वह आगे-आगे भाग रहा था । भागते-भागते वह एक धोबी के घर में घुस गया। धोबी के घर में एक नीले रंग का भरा हुआ टब रखा हुआ था। क्योंकि शृंगाल कुत्ते के हमले के डर से अन्धाधुन्ध भागा जा रहा था इसलिए वह उस नीले रंग के पानी से भरे टब में जा गिरा।

वह उस रंग वाले पानी में से जैसे ही निकला तो उसका रंग बदला हुआ वह एक नीले रंग का विचित्र जानवर लग रहा था। कुत्तों ने देखा कि तो शृंगाल नहीं है तो वे उसे छोड़कर चले गए। कुत्तों के जाने के पश्चात् वह गीदड फिर वापस जंगल की ओर भाग गया। नीला रंग कभी भी अपना रंग नहीं छोड़ता। कहा जाता है कि बज्र लेप का, मूर्ख का, औरतों का, केकड़े का, मछलियों का, शराब पीने वाले का और नीले रंग की एक ही पकड़ है । जिसे एक बार पकड़ लिया उसे फिर कभी नहीं छोड़ते।

अब जैसे ही गीदड़ जंगल में घुसा तो शेर, चीते, भेड़िये आदि ने उसे देखकर कहा “अरे ! यह विचित्र जानवर इस जंगल में कहां से आ गया ? वे सब के सब उसे देखकर डर गये । डर के मारे वे इधर-उधर भागने लगे। कि इस भयंकर जानवर से बचो..बचो..बचो...। सारे जंगल में भगदड़ मच गई थी।" इसी अवसर के लिए तो कहा गया है| कि यदि अपना कल्याण चाहो तो मनुष्य जिसके हाव-भाव का, कुल और प्राक्रम आदि का पता न हो उस पर विश्वास न करें। तब भागते हुए जानवरों को देखकर गीदड़ ने भी अपना दांव मारने की सोची और वह बोला

“ओ भाईयो ! तुम क्यों भाग रहे हो ? मैं तुम्हारा शत्रु नहीं हूं। मुझे तो स्वयं भगवान ने तुम्हारे पास भेजा है। भगवान जी ने मुझसे कहा था कि बेटा, तुम उस जंगल में जाओ क्योंकि वहां के जानवरों का कोई राजा नहीं, इसलिए तुम वहां के राजा हो। तभी तो मेरा रंग तुम सबसे अलग है। यह रंग मुझे भगवान ने दिया है, मैं तीनों लोकों का राजा कमुद्रम हूं।"

गीदड़ के इतना कहने पर सभी जानवर रुक गए और गीदड़ के आगे झुकते हुए कहने लगे_ "महाराज ! आपका जो हुक्म हो हमें दीजिए। हम सब आपके दास हैं प्रजा हैं।” गीदड़ ऐसे अवसर पर पीछे रहने वाला नहीं था उसे तो पहली बार यह राजगद्दी मिली थी। उसने उसी समय अपना दरबार लगाया और शेर को अपना मंत्री, बाघ को सेनापति का पद, हाथियों को पानी लाने का काम, चीते को द्वारपाल बनाया। गीदड़ों से तो बात तक न की। उन्हें धक्के देकर बाहर निकालते हुए कहा-“तुम लोग यहां से चले जाओ। हमारे दरबार में बुज़दिलों का कोई काम नहीं।"

अब गीदड़ जी महाराज राजा बनकर उस जंगल में राज्य करने लगे। शेर जैसे बहादुर भी उनको सुबह उठकर नमस्कार करते । दिल ही दिल में गीदड़ जी बहुत खुश थे। बड़े आनन्द से शेर के मारे हए शिकार को खाते और मोटे होते जा रहे थे। एक बार पास के जंगल के गीदड़ों ने इस जंगल पर हमला बोल दिया। चारों ओर से हवा.... हवा हो.... हवा हो की आवाजें आने लगीं। चारों ओर हा....हा... कार मच गई। छोटे-बड़े जानवर डर के मारे भागने लगे।

"महाराज ! हम पर हमला हो गया।” ॥  "हम पर हमला हो गया।" "चलिए आप लड़ने के लिए नहीं तो बाहर से आया शत्रु हम सबको खा जाएगा।" सब जानवरों ने जैसे ही गीदड़ महाराज से कहा तो बस फिर क्या था। गीदड़ जी महाराज तो कांपने लगे....डर के मारे उनका बुरा हाल हो गया। उन्होंने कहा चलो यहां से भाग चलो।

गीदड़ की इस बात को सुनकर शेर, चीता, भेड़िये सब समझ गए कि यह तो नकली राजा है । यह तो गीदड़ है। हम तो आज तक धोखे में रहे। बस फिर क्या था, ढोल का पोल खुल गया । सब लोगों ने मिलकर उस धोखेबाज गीदड़ की खूब पिटाई की एवं मार दिया। तब दमनक के मुंह से यह कहानी सुकर शेर बोला, “इस बात का क्या प्रमाण है कि वह मुझसे नफरत करता है ?"

"मदाराज ! आज उसने मेरे सामने कहा है कि मैं कल सुबह तक पिंगलक को मार दूंगा, यही सबूत है । अब सुबह को आप देखना कि वह लाल मंह किये होंठ फड़फड़ाता हुआ, इधर-उधर सब ओर देखता हुआ, यदि क्रूर नज़रों से आपकी और देखेगा तो आप समझ जाइएगा की वह आपकी हत्या करने के लिए तैयार है।

इतना कहकर दमनक वहां से उठा और सीधा संजीवक बैल के पास चला गया। बैल ने अपने मित्र को अचानक ही आते देखा तो बहुत खुश हुआ और उसका स्वागत करने के लिए बाहर आया। दोनों मित्र गले मिले बैल ने बड़े प्यार से उसे अपने पास बैठा कर पूछा_ "कहो मित्र ! खुश तो हो ? उतने दिनों से कहां थे ? सच पूछो तो मैं तुम्हारे बगैर उदास हो गया था।"

 दमनक बोला, “अरे भाई, नौकरों का हाल क्या पूछना ? जो लोग राजा के नौकर होते हैं, उनकी सम्पत्ति दूसरों के अधीन, मन सदा अशांत, अपने जीवन का भी विश्वास नहीं रहता। सेवा द्वारा भी जो धन एकत्र करने की इच्छा से सेवकों ने जो किया उसे देखो कि शरीर की जो स्वतन्त्रता है उसको भी मूों ने खो दिया। पहले तो पैदा होना ही अत्यन्त दुःखकर है, फिर गरीबी, उस पर नौकरी करके जीवन चलाना । हाय ! दुःखों का यह कैसा सिलसिला है ? महाभारत में निम्न पांच जीवित भी मरे कहे गये हैं : (1) दरिद्री, (2) रोगी, (3) मूर्ख, (4) प्रवासी, (5) नौकरी करने वाला।

भाई, नौकर, काम अधिक होने के कारण शांति से न कभी भोजन करता है, न अच्छे प्रकार से सोता है, न जागता है और न निःसंकोच बात करता है। क्या नौकर की भी कोई ज़िन्दगी है ? जिन्होंने सेवा (नौकरी) की कुत्ते की वृत्ति कहा है, उन्होंने बकवास की है। क्योंकि कुत्ता तो आज़ाद विचारधारा रखता है, जबकि नौकर मालिक की आज्ञा से सारे काम करता है । धरती पर सोना, ब्रह्मचर्य का पालन करना । थोड़ा भोजन करना। नौकर तो संन्यासी के समान होता है। अन्तर केवल इतना ही है कि नौकर पापी पेट के लिए, संन्यासी धर्म के लिए यह सब कुछ करता है । यदि धर्म से पृथक न होता, तो दंड-धूप आदि जो कष्ट सेवक, धन के लिए सहता है वह थोड़ा ही होता । उस मज़ेदार सुन्दर लड्डू का क्या, जो सेवा करने से मिलता है।"

"आखिर आप कहना क्या चाहते हैं मित्र ?" बैल ने उससे पूछा। “देखो मित्र ! मंत्रियों को मन्त्र भेद करना उचित नहीं। क्योंकि मन्त्री होकर जो राजा के विचार को दूसरों से कह देता है, वह राजा के काम तो बिगाड़ ही देता है, स्वयं भी दुःख पाता है । जिस मंत्री ने राजा का विकार प्रकट कर दिया, मानो उसने सबको बिना शस्त्र के मार दिया। यह नारद ने कहा है तो भी मैंने तुम्हारे सामने यह बात कही है। क्योंकि तुम मेरे ही कहने पर इस राजा के पास विश्वास करके आए थे। बड़ों का कहना है|

जिसके विश्वास से कोई मारा उसको उसकी हत्या ही मारती है (यह मनु का वचन है)। यह शेर पापी है। इसका मन खोटा है । इसने आज मुझे अकेले में ले जाकर कहा है कि मैं कल सुबह ही इस बैल को मार कर अपने साथी जानवरों की भूख मिटाऊंगा। तब मैंने उससे कहा, मालिक तो मित्रद्रोह के द्वारा मारा जाए वह ठीक नहीं । कहा गया है ब्रह्म हत्या करके प्रायश्चित द्वारा शुद्ध हो जाता है पर मित्र द्रोही, कभी भी, कैसे भी, शुद्ध नहीं होता।

तब मेरी बात पर उसने गुस्से से कहा, ओ दुष्ट ! बैल घास चरने वाला है और हम मांसाहारी हैं। इसलिए हमारा उसका स्वाभाविक वैर है। उसे मारने के लिए तो मैंने यह रास्ता निकाला था। उसे मारना पाप है। इसीलिए कहा है जो अन्य उपायों से न मारा जाये तो उस दुश्मन को अपनी कन्या देकर भी मार देना चाहिए। इस प्रकार मारने में कोई दोष नहीं है।

इस प्रकार मैं उसका निश्चय जानकर ही तुम्हारे पास आया हूं। अब मेरे पर विश्वासघात का दोष नहीं रहा । मैंने तो गुप्त बात भी तुम्हें बता दी । अब तुम जो कुछ भी उचित समझो करो, मेरा काम पूरा हो गया।
बैल बेचारा सोच में पड़ गया और बोला, यह ठीक है कि"स्त्रियां बड़ी कठिनाई से पहचानी जाती हैं। राजा लोग अधिकतर प्यार से वंचित होते हैं।

धन कंजूस के पास जाता है। बादल सदा पहाड़ों और किलों पर बरसते हैं। जंगल अच्छा, भिक्षा अच्छी, मज़दूरी भी अच्छी रोगी रहना भी अच्छा, पर नौकरी करके धन इकट्ठा करना नहीं अच्छा।  इसलिए मैंने ठीक नहीं किया जो इस शेर के साथ दोस्ती कर ली । कहा की गया है कि जिन दो का मन बराबर हो, वंश बराबर हो, उन्हीं के आपस में मित्रता और विवाह ठीक है। मृग मृगी के साथ, कौवा कौवी के साथ, घोड़ा घोड़ी के साथ और बुद्धिमान बुद्धिमान के साथ रहते हैं । अब मैं जाकर उसे मनाने का प्रयत्न भी करूं तो यह सब बेकार होगा। कहा गया है कि जो किसी उद्देश्य को लेकर क्रोध करता है, वह उससे प्राप्त होने पर भी शांत होता है। जो बिना किसी बात के ही क्रोध करे उस मनुष्य को तो मनाना बहुत ही कठिन हो जाता है। इसी प्रकार राजाओं की सेवा समुद्र की सेवा के समान शंक जन्म ही होती है। _इस लोग में सेवक लोग मालिक को दूसरे सेवकों पर खुशी सहन नहीं करते । जैसे सौतने दूसरी पत्नी पर अच्छे कार्यों के कारण पति की खुशी नहीं सहती।

अतः अधिक गुणवान पात्रों के द्वारा साधारण गुणी-जनों के गुण उपेक्षित हो जाते हैं । जैसे सर्प के निकलने पर रात्रि के दीप का प्रकाश नहीं रहता।" दमनक मन ही मन में बहुत खुश था। उसका तीर ठीक निशाने पर बैठा था। उसने बैल को प्यार से कहा "देखो भाई ! चिन्ता मत करो, हिम्मत से काम लो । डर वाली कोई बात नहा । समय आने पर जो आदमी अपने आपको बदल लेता है। शत्रु चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो, तरीके से उसे मारा जा सकता है।