धोखेबाज-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 04:48 AM posted by Admin

एक सागर के किनारे से थोड़ी दूरी पर एक बड़ा वृक्ष था, जिस पर एक बन्दर रहता था। उस सागर में रहने वाला एक बड़ा मगरमच्छ एक दिन उस वृक्ष के नीचे बैठा ठंडी-ठंडी हवा का आनन्द ले रहा था, बन्दर ने अपने घर आए मेहमान को देखा तो मित्रता कर ली । बन्दर अपने मित्र के लिए इस वृक्ष पर से ताज़ा और पकी हुई जामुनें लेकर आया, जिसे खाकर वह मगरमच्छ बड़ा खुश हुआ। ऐसे ही इन दोनों में मित्रता बढ़ती रही । अब तो मगरमच्छ रोज़ ही उस बन्दर के पास आता और मीठे-मीठे जामुन खाता, फिर कुछ जामुन अपनी पत्नी के लिए भी ले जाता।

मगरमच्छ की पत्नी ने ऐसे मीठे जामुन कभी नहीं खाए थे, वह आश्चर्य से पूछने लगी "हे प्राणनाथ ! ऐसे मीठे जामुन तुम कहां से लाते हो ?" “प्रिया ! मेरा एक मित्र बन्दर है, वह ही मुझे रोज़ यह जामुन लाकर देता “वाह ! जो बन्दर इतने मीठे जामुन लाता है उसका अपना कलेजा कितना मीठा होगा ? मुझे तो उसका कलेजा खाने को ला दो जिसे खाकर मैं सुन्दर एवं अमर हो जाऊं।” “प्रिया ! ऐसी बात मत कहो, वह तो मेरा भाई बन गया है । फिर हमें फल लाकर देता है । भला कोई ऐसे मित्र को भी मारता है मगरमच्छ की बात सुनकर उसकी पत्नी को क्रोध आ गया। वह बोली “मैं सब समझ गई। जिसके पास तुम जाते हो वह बन्दर नहीं कोई बन्दरिया है, तुम उससे प्रेम करते हो।” “नहीं....नहीं....प्रिया ऐसा मत कहो । मैं झूठ नहीं बोलता, तुम मुझ पर विश्वास करो।” “नहीं, मुझे तुम्हारी बात पर बिल्कुल विश्वास नहीं । यदि यह सत्य है तो तुम जाकर उसका कलेजा लाओ, नहीं तो याद रखो मैं भूखी रहकर अपनी जान दे दूंगी।

मगरमच्छ बहुत दुःखी हो गया। वह सोचने लगा कि करूं तो क्या करूं? अपने मित्र को कैसे मारूं....यह मेरी पत्नी तो पागल हो गई है लेकिन फिर भी बेचारा मगरमच्छ दुःखी होकर बन्दर के पास पहुंचा । बन्दर ने उसे उदास देखकर कहा "अरे यार ! क्या बात है ? आज तुम इतने उदास क्यों हो ? मीठी-मीठी बातें भी नहीं सुना रहे “मेरे भाई ! तुम्हारी भाभी ने मुझसे कहा कि तुम बड़े पापी हो जो रोज़-रोज़ मित्र के पास जाकर खाते हो ? यह भी नहीं करते कि एक दिन उसे अपने घर पर लाकर खाना खिलाओ।

कहा भी है-ब्रह्म हत्या, शराब पीना, चोरी व्रत भंग और दुष्ट व्यवहार का प्रायश्चित हो सकता है, पर कृतघ्नता का कोई प्रायश्चित भी नहीं है, अतः तुम मेरे प्यारे देवर को घर लेकर ही आना नहीं तो मैं मर जाऊंगी, इसीलिए भाई, आज मैं तुम्हारे पास आया हूं।" “भैया, भाभी ने ठीक ही तो कहा है। मगरमच्छ एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि मैं तुम्हारे उस पानी के अन्दर वाले घर में कैसे आऊंगा, क्यों न तम भाभी को मेरे पास यहीं पर ही ले आओ। "भाई बन्दर, सागर के अन्दर जो मेरा घर है, वह तो बड़ा ही सुन्दर है। तुम जाने की चिन्ता मत करो, मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बैठाकर ले जाऊंगा। बस फिर क्या था, बन्दर मगरमच्छ की पीठ पर बैठ गया।

मगरमच्छ उसे लेकर तेज़ी से गहरे पानी में ले जाकर तेज़ी से चलने लगा, उसे इस तेज़ी से गहरे पानी में कूदते देखकर बन्दर घबरा गया, उसे ऐसा लग रहा था जैसे खतरा उसके सिर पर मंडरा रहा है । यह भयंकर सागर उधर मगरमच्छ ने देखा कि अब बन्दर उसके वश में है, यह गहरे पानी से निकलकर अब कहीं भी नहीं जा सकता ।

अब क्यों न इससे सारी बात कह डालूं। तभी उसने कहा “भाई बन्दर, सत्य बात तो यह है कि मैं तुझे धोखे में फंसाकर मारने के लिए लाया हूं, अब तुम अपने भगवान को याद कर लो। तुम्हारा अन्तिम समय आ गया है। “भैया ! मैंने तम्हारा और भाभी का क्या बुरा क्या है, जो तू मुझे मारने के लिए अपने घर लाया है “बन्दर भैया ! मेरी पत्नी तुम्हारे मीठे हृदय का रस पीना चाहती है, जिसके लिए मैंने ऐसा किया।” बन्दर समझ गया कि अब तो वह इसके जाल में फंस गया है, अब मौत सस आधक दर नहीं।

यदि उसने जल्दी ही कोई उपाय न किया तो.. फिर अचानक ही बन्दर की तेज बद्धि ने काम किया उसने चुटकी बजाते हुए कहा वाह भाई मगरमच्छ ! तमने क्या बात कह दी? यह बात तो तुम्हें मझे वहीं पर बतानी चाहिए थी, अब तो सारा मामला बिगड़ गया, सब कुछ बेकार हो गया।" "क्यों भाई ! बेकार क्यों हो गया ?" “इसलिए कि जो मेरा मीठा दिल तुम्हारी पत्नी को चाहिए उसे तो मैं संभाल कर उस जामुन के पेड़ की जड़ के नीचे रखा करता हूं।" “यदि यह बात है तो चलो मैं तुम्हें जामुन के पेड़ तक वापस ले चलता हूं। तुम वहां से मुझे दिल निकाल कर दे दो ताकि मेरी पत्नी खुश हो जाए नहीं तो वह मर जाएगी।" “हो... हां... क्यों नहीं। भाई ! आखिर मैं तुम्हारा मित्र हूं, मैं तुम्हारे काम नहीं आऊंगा तो किसके काम आऊंगा, चलो जल्दी जामुन के पेड़ तक ..बस मगरमच्छ मोटी बुद्धि का था, वह बन्दर की चाल को न समझा, बस चल पड़ा वापस।

जामुन के पेड़ पर पहुंच बन्दर ऊपर चढ़ गया। नीचे खड़े मगरमच्छ ने उससे कहा कि लाओ भाई अब वह दिल निकाल कर दे दो। बन्दर ऊपर से बोला, “ओ पापी ! धोखेबाज, दुष्ट, मूर्ख, भला तू सोच कि कभी किसी के दो दिल भी होते हैं ? अब तेरी भलाई इसी में है कि तू यहां से चला जा और फिर कभी भूलकर इधर न आना, याद रख जो एक बार दुष्टता के पश्चात् फिर मित्रता करना चाहता है, वह गर्भ धारण करने वाली खच्चरी के समान मृत्यु को प्राप्त होता है।" बन्दर की बात सुन मगरमच्छ अपनी भूल पर पछताने लगा।

वह सोचने लगा कि अब क्या होगा, मेरी ही मूर्खता के कारण मित्र भी हाथ से गया और पत्नी भी खुश न हो सकी। यदि मैं बन्दर को रास्ते में अपने मन की बात न बताता तो अवश्य ही मैं अपनी पत्नी को तो खुश कर ही देता लेकिन, मगरमच्छ को एक चाल सूझी उसने बन्दर से कहा अरे भाई, तुम तो मेरे मज़ाक को ही सच मान गए, मैं तो वैसे ही कह रहा था, चलो आओ मेरे साथ अब हम घर चलते हैं। ओ दुष्ट ! अब तू यहां से चला जा। कहा गया है कि भूखा क्या पाप नहीं करता, मेरे भाई, अब तुम प्रियदर्शन से कह दे कि गंगादत्त कुएं पर नहीं आएगा।"इसका क्या मतलब है ?" मगरमच्छ ने पूछा। "लो सुनो-मैं तुम्हें इसका मतलब बताता हूं।"