धन की शक्ति-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 04,2021 06:10 AM posted by Admin

दक्षिण देश में एक नगर है, उसके पास महादेव जी का एक मठ है, उस मठ में ताम्रचूड़ नाम का एक संन्यासी रहता था। वह उस नगर में भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करता था, बची हुई भिक्षा को वह एक बूंटी पर टांग देता, सुबह होते ही उसे गरीब मज़दूरों में बांट देता, यह गरीब मज़दूर इस खाने के बदले में उस मठ की सफाई वगैरा कर दिया करते थे।

एक दिन मेरे भाइयों (यानि दूसरे चूहों) ने मुझसे कहा कि यह साधु उस मोखंटी पर टांग देता है जिससे हम लोग इस खाने से वंचित रह जाते गयोंकि आप हम सब से बड़े हैं और बुद्धिमान भी, इसलिए वहां चलकर
भी भोजन कीजिए और हमें भी खिलाइये।" भाइयों की बात सुन कर मैं उनके साथ हो लिया तथा अपनी तीव्र बुद्धि ने उस खंटे पर चढ़ गया। खाने को निकालकर मैंने अपने साथियों को बांट दिया और स्वयं भी खाया, इससे मेरे साथी बहुत खुश हुए। इस प्रकार से हम हर रात उस भोजन को खाकर आनन्द लेने लगे थे।

साधु जी महाराज अपने भोजन को रोज़ ही खाए जाने के कारण बहुत ही चिन्तित हुए, इस भोजन की रक्षा के लिए वह एक लम्बा बांस ले आए जिससे रात को सोते-सोते भी वह हिलाते रहते । इस तरह हम लोग उस बांस के डर से ऊपर भोजन तक न पहुंच सकते।

दूसरे दिन उस संन्यासी का मित्र दूसरा संन्यासी तीर्थ यात्रा करके लौटा, उन दोनों मित्रों में ज्ञान की बातें आरम्भ हुई। लेकिन ताम्रचूड़ का ध्यान तो उस बांस की ओर था। उसे इस प्रकार देखकर दूसरे संन्यासी ने कहा-“देखो ताम्रचूड़, तुम मेरी बातों को ध्यान से नहीं सुन रहे, यह तो पाप है, अब भले ही रात का समय है लेकिन मैं इसी समय तम्हारा मठ छोड़कर दूसरे मठ में जाता हूं, क्योंकि जो प्राणी अपने घर आए मेहमान को देखकर इधर-उधर या नीचे-ऊपर झांकने लगे, उसके घर में जो लोग जाते हैं वे बिना सींग के बैल हैं। जहां आदर-सत्कार, मीठी-मीठी बातें, गण-दोष की चर्चा न हो वहां नहीं जाना चाहिए। तुम एक मठ के मालिक बनकर सब कुछ भूल गये, तुमने अपने भाइयों का प्यार भी छोड़ दिया। क्या तुम नहीं जानते कि यह मठ नहीं तुमने नक पाया है। कहा भी गया है यदि नर्क में जाना हो तो वर्ष भर परहित करो या फिर तीन दिन के लिए मठाधीश बन जाओ, तुम दया के पात्र हो।"

यह सुनकर ताम्रचड घबराकर बोला-"भगवान् ऐसा मत कहो, आपसे इस संसार में मेरा और कोई मित्र नहीं है, मेरी परेशानी का कारण एक जिसके लिए मैं यह बांस हिलाता रहता हैं । वह हर रोज़ मेरा भोजन खाता है।" “उसका बिल कहां है, क्या तुम्हें पता है ?"

“मुझे ठीक से तो कुछ पता नहीं, हां, मुझे यह संदेह है कि उसका बिल किसी खजाने के आस-पास होगा, क्योंकि धन की गर्मी से प्राण का तेज बढ़ता है। इसीलिए वह चूहा बहुत ऊंचा कूदता है।"
अपने मित्र की बात सुन मेहमान संन्यासी बोला—“देखो भाई, बिना किसी सेतु के यह शांडली धोए हुए तिलों को बिना धोए तिलों में नहीं बेच सकते, इसमें अवश्य कोई कारण होगा।"
"वह कैसे महाराज ?" लो सुनो-