चालाकी का परिणाम-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 03,2021 08:34 AM posted by Admin

किसी शहर में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो व्यक्ति रहते थे। एक बार पापबुद्धि वाले व्यक्ति ने सोचा कि मैं तो पागल हूं और गरीब भी हूं, इसलिए मुझे धर्मबुद्धि वाले को अपने साथ लेकर किसी दूसरे देश में जाना चाहिए। वहां पर इसी के सहारे मैं भी अमीर बन जाऊंगा। बस फिर क्या, धन कमाने के पश्चात् मैं इसे भी धोखा दे दूंगा। यही सोचकर वह धर्मबुद्धि के पास गया । जाते ही उसने कहा, “अरे भाई, यहां बैठे-बैठे क्या कर रहे हो, चलो हम लोग यहां से किसी दूसरे देश में चलकर घूम-फिरें, कारोबार करें, धन कमाएं । एक ही स्थान पर बैठे रहने से आदमी कभी बड़ा नहीं बन सकता।”

धर्मबुद्धि ने उसकी बातें सुनी तो वास्तव में ही उसे महसूस हुआ कि यहां पर बैठे-बैठे जीवन बेकार हो रहा है। यदि इन्सान को धन कमाना है, कुछ सीखना है तो उसे परदेस में जाना होगा । यही सोचकर उसने अपने माता-पिता से परदेस जाने की आज्ञा ली। इस प्रकार दोनों मित्र परदेस चले गए। दोनों मित्र परदेस में जाकर दिन-रात काम करते रहे जिससे उन्होंने काफी धन कमा लिया। उनके पास काफी धन आ गया, इस धन कमाने में धर्मबुद्धि का विशेष योगदान था।

अब उन्होंने सोचा चलो अब घर वापस जाया जाए। यही सोचकर दोनों वापस चल पड़े। जैसे ही वे लोग अपने शहर के बाहर पहुंचे तो पापबुद्धि ने कहा, “अरे भाई ! यह सारा धन घर ले जाना ठीक नहीं है। क्योंकि धन को देखते ही रिश्तेदार, मित्र आदि उधार मांगने लगते हैं । इसलिए हम थोड़ा-सा धन अपने साथ ले चलते हैं बाकी का धन इस जंगल में गढ़ा खोदकर उसमें दबा देते हैं । जब हमें ज़रूरत पड़ेगी आकर निकाल लेंगे। बड़ों ने कहा है कि बुद्धिमान को चाहिए कि थोड़ा-सा धन भी किसी दूसरे को न दिखाएं। इससे उसके मन में पाप आ जाता है । जैसे मांस जल में मछलियों द्वारा, पृथ्वी पर कुत्तों द्वारा, आकाश में पक्षियों द्वारा खाया जाता है, वैसे धन वाला व्यक्ति भी इसी प्रकार किसी-न-किसी प्रकार से खाया ही जाता है। धर्मबुद्धि के मन को पापबुद्धि की बात लग गयी, उसने कहा, "हां यार, बात तो तुम ठीक ही कहते हो, चलो इस धन को यहीं पर दबा दें।” इस प्रकार इन दोनों मित्रों ने मिलकर जंगल में एक गढ़ा खोदा और उसमें धन दबाकर स्वयं अपने शहर आ गये । कुछ ही दिनों पश्चात् पापबुद्धि ने सोचा कि क्यों न यह सारा धन मैं ही मार लूं धर्मबुद्धि से चोरी...बस फिर क्या था पापबुद्धि इस शुभ काम में देरी क्यों करता ? उसने एक रात उस जंगल में जा उस गढ़े से सारा धन निकालकर गढ़े को वेसे का वैसा ही बन्द कर दिया।

तब दूसरे दिन वह धर्मबुद्धि के पास गया और जाकर बोला• "मेरे मित्र, आज हमें यह धन निकालकर बांट लेना चाहिए। क्योंकि मेरे घर वालों को धन की आवश्यकता है।" “भला मुझे क्या एतराज है भाई, चलो चलकर यह शुभ काम कर लेते हैं।" धर्मबुद्धि हंसकर बोला। इसके पश्चात् दोनों ही उस जंगल में गये और उस गढ़े को खोदा, वहां क्या था-? केवल खाली...धन तो पहले से ही निकाला जा चुका था। पापबुद्धि तो बड़ा होशियार था ही, उसने झट से कहा, "देखो भाई धर्मबुद्धि ! यह धन तुम ही निकालकर ले गये हो। तुम्हारे बिना इस धन का किसी को पता नहीं था।"

धर्मबुद्धि बेचारा निर्दोष था वह क्रोध से भरा हुआ बोला, “नहीं, यह झूठ है । मैं चोर नहीं, मैंने तो जीवन में कभी झूठ नहीं बोला, कभी चोरी नहीं की। इस प्रकार दोनों में झगड़ा बढ़ गया, बात न्याय के लिए पंचायत के पास जाने तक पहुंच गई। फैसले के लिए गवाह की जरूरत पड़ी तो उस वृक्ष को गवाही के लिए चुना गया जिसके नीचे धन दबाया गया था। जज ने यही निर्णय दिया कि सुबह होते ही हम सब उस वृक्ष के पास चलेंगे, वही यह बताएगा कि दोनों में से चोर कौन है। पापबुद्धि के मन में तो चोर था ही उसने घर आकर अपने पिता से सारी बात बताई, दोनों बाप-बेटों ने मिलकर फैसला किया कि पिता उस वृक्ष के पास एक गढ़े में छुपकर बैठ जाएगा जब उससे पूछा जाएगा कि चोर कौन है, तब वह झट से बोल देगा धर्मबुद्धि ।

बस सुबह उठते ही पंचायत के लोगों के साथ, धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दोनों ही चले, पापबुद्धि के पिता तो सबसे पहले वहां पहंच चुके थे । जज ने वृक्ष की ओर देखकर पूछा “हे वृक्ष देवता, तुम ही बताओ कि इन दोनों में से चोर कौन है-पापबुद्धि अथवा धर्मबुद्धि ?" वृक्ष ने तो क्या बोलना था, पापबुद्धि के पिता ने वृक्ष की जड़ वाले गढ़े में बैठे-बैठे झट कह दिया- “धर्मबुद्धि चोर है।”

परन्तु धर्मबुद्धि भले ही चोर साबित हो चुका था किन्तु किसी को इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था, स्वयं धर्मबुद्धि हैरान था कि आखिर यह कहानी क्या है ? फिर उसकी तीव्र बुद्धि ने काम किया। । उसने वृक्ष के चारों ओर सूखी लकड़ियां इकट्ठी करके उनमें आग लगा दी। जैसे ही आग लगी, पापबुद्धि का पिता आग में झुलसता हुआ उस गढ़े में से बाहर निकला, वह आग में जल रहा था, दर्द के मारे चीखें मार रहा था। - पंचायत के लोग उसे इस हालत में देखकर हैरान रह गये, उनकी समझ में कुछ भी तो नहीं आ रहा था।

-अन्त में पापबद्धि के पिता ने तड़पते हए अपने बेटे की चोरी की सारी बात बता दी और स्वयं उसी समय मर गया। जज ने पापबुद्धि को दण्ड के रूप में उस वृक्ष पर ही लटका दिया और ताकि बुद्धिमान को चाहिए कि उपाय सोचे, पर साथ ही परिणाम को भी च, क्योंकि मूर्ख वक के देखते-देखते नेवले ने सारे वक मार डाले। "वह कैसे ?" धर्मबुद्धि ने पूछा। लो सुनो