बुद्धिमान ही महान-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 03,2021 08:22 AM posted by Admin

एक जंगल में एक भयंकर शेर रहता था। चतुरक और त्रयमुख नामक श्रृंगाल, एक भेड़िया, एक गीदड़ उसके सेवक थे । एक दिन एक ऊंटनी उस जंगल में अपने काफिले से बिछड़कर भटकती हई आ निकली, उसके बच्चा पैदा होने वाला था। उस शेर ने ऊंटनी का पेट फाड़कर उसके बच्चे को जीवित ही निकाल लिया और ऊंटनी को खाकर खूब आनन्द लेने लगा। बच्चे को उसने अपने घर में रख लिया था।इस प्रकार यह चारों मित्र बनकर उस जंगल में रहने लगे थे। ऊंट का ङ्केबच्या शेर के साथ ही पालकर जवान हुआ था । इसलिए उससे उसका प्रेमा भी बहुत था। शेर ने उसका नाम शंकुकर्ण रखा था। एक बार शेर का किसी मस्त हाथी के साथ युद्ध हुआ। हाथी ने उसे इतना धायल कर दिया था कि वह चल भी नहीं सकता था। तब भूख से दुःखी होकर उसने तड़पते हुए कहा कि मेरे खाने के लिए कोई शिकार लेकर आओ। जिससे मैं यहीं बैठे-बैठे मार कर उससे अपना और तुम्हारा पेट भर सकू।

तीनों ही शेर के लिए शिकार ढूंढने निकले । वे सारा दिन जंगल में घूमते रहे किन्तु उन्हें कोई भी शिकार न मिला। उधर शेर भूखा था। उसके लिए भोजन बहुत जरूरी था। निराश होकर चतुरक ने सोचा, क्यों न इस शंकुकर्ण को ही मार दिया जाए, इससे मालिक की भूख मिट जाएगी परन्तु हो सकता है ऐसा करने से मालिक नाराज़ भी हो जाए। पर बद्धि से काम लेकर मालिक ' की नाराज़गी से भी बचा जा सकता है।
यह विचार कर चत्रक ने शंककर्ण से कहा, “भाई देखो, भूख के मारे हमारा मालिक भूखा मर रहा है । शिकार का कहीं से भी प्रबन्ध नहीं हो सका, इसलिए मालिक के लिए ही तुमसे कुछ कहना चाहूंगा।”

“कहो भाई, जल्दी कहो।”
"देखो मित्र, बड़ों ने कहा है कि भूखे मरते मालिक को बचाने के लिए अपना शरीर भी उसको अर्पण कर दो, इससे तुम्हारा शरीर दुगना हो जाएगा।" “अरे भाई, यदि ऐसी बात है तो मैं हाजिर हं । मालिक से चलकर कहो कि वह मेरा शिकार करके अपना पेट भर ले, आखिर उसने ही तो मुझे पाला ऊंट के बच्चे की बात सुन चतुरक बहुत खुश हुआ और वह तीनों इकटे होकर शेर के पास पहुंचे और कहा, “देखो मालिक ! कोई शिकार तो हमें मिला नहीं इसलिए यह ऊंट का बच्चा खुशी से आपकी भूख मिटाने के लिए तैयार हो गया है।"

भूखा शेर बोला, “ठीक है यदि इसकी यही इच्छा है तो इसे मार डालो।" बस फिर क्या था । देखते ही देखते उस ऊंट के बच्चे को फाड़ डाला गया। करने चतरक से कहा, "देखो भाई, मैं जरा नदी में मुंह-हाथ साफ करके आता हूं। तब तक तुम इसका ध्यान रखना।" शेर के जाने के पश्चात् सामने पड़े शिकार को देखकर दोनों के दिल में पाप पैदा हुआ क्योंकि भूख तो इन्हें पहले ही लग रही थी। शेर जाचका था। चतुरक ने भेड़िये से कहा-

"भाई, पहले इसे तुम खा लो, मैं मालिक का ध्यान रखता हूं।"
भेड़िया तो पहले से ही भूखा था। गीदड़ का इशारा पाते ही वह शिकार को खाने ही लगा था कि गीदड़ झट से बोल उठा “अरे.... अरे... शेर आ गया है।" भेड़िये बेचारे के मुंह से मांस का टुकड़ा निकल कर गिर पड़ा। वह डर के मारे दूर हट कर खड़ा हो गया। इस बीच शेर भी आ गया था। उसने जैसे ही अपने शिकार पर दांत गड़े हुए देखे तो क्रोध के मारे बोला "मेरा शिकार किसने जूठा किया है ? अब पहले मैं उसी को खाऊंगा।"

शेर को गुस्से से देख दोनों डर गये थे। गीदड़ ने भेड़िये से कहा, “अरे बोल यार, क्या अब मुझे भी मरवाएगा ?" भेड़िया समझ गया कि अब तो मेरी मौत आ चुकी है । अब शेर उसे नहीं छोड़ेगा। ठीक उसी समय एक ऊंटों का काफला जंगल से गुजर रहा था। उसकाफले के सरदार ने ऊंट के गले में बहुत बड़ा घंटाबंधा हुआ था जिसकी आवाज़ सारे जंगल में गूंज रही थी। शेर ने घबरा कर कहा, “अरे यह कैसी आवाज़ है ? कौन आ रहा है इस जंगल में जाओ जरा देखकर आओ?" 

शेर की बात सुनकर चतुरक उस जंगल की ओर चला जहां से घंटा बजने की आवाज़ आ रही थी। थोड़ी ही देर में चतुरक उन ऊंटों को देख वापस आकर बोला “मालिक ! यह तो गजब हो गया। मुझे तो ऐसा जान पड़ा है कि स्वयं धर्मराज इस जंगल में हमसे युद्ध करने आ रहे हैं। शायद धर्मराज को इस बात पर क्रोध आ गया है कि आपने इस ऊंट के बच्चे को बेगुनाह मारा है। तभी तो इस ऊंट के मां-बाप और दादा भी धर्मराज के साथ आ रहे हैं।" शेर तो पहले से ही घायल था। उसने दूर से आते ऊंटों को देखा । समझ गया कि धर्मराज आ गए हैं। अब उसे जीवित नहीं छोड़ेंगे। डर के मारे शेर उस शिकार को वहीं पर छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

चतुरक की चाल सफल रही थी। शेर भाग गया। अब उनका रास्ता साफ था। दोनों ने मिलकर उस शिकार को खूब पेट भरकर खाया। दूसरी ओर जैसे ही दमनक बैल के पास से गया था तब से ही वह बेचारा सोचने लगा था कि यह मैंने क्या भूल की जो घासाहारी होते हए भी मांसाहारी शेर से मित्रता कर ली, अब मेरा क्या बनेगा ? मैं कहां जाऊं ? क्या मुझे उस दमनक के पास जाकर ही कोई रास्ता पूछना पड़ेगा ? किसी ने ठीक ही कहा है कि आग से जले अंग का इलाज आग से ही होता है । अब यदि मैं यहां से कहीं और भी जाऊंगा तो कोई दसरे मांसाहारी जानवर मुझे मारकर खा जाएंगे। इसलिए कहीं और जाकर मरने से अच्छा है कि इसी मित्र शेर के हाथों ही मरा जाए। किसी ने कहा है कि बड़ों के हाथों मरने से भी प्रशंसा होती है। 

यह सोचकर बैल बेचारा धीरे-धीरे उस शेर के पास जाने लगा। वह शेर के पास जाकर बिना प्रणाम किए ही एक ओर बैठ गया। शेर को तो पहले ही दमनक सब कुछ बता चुका था बैल के बारे में। पूरी नफरत और घृणा उसने शेर के मन में भर दी थी। शेर की नज़रों में अब वह उसका शत्रु था और शत्रु को सामने देखकर शेर उस पर टूट पड़ा था। "बैल के मन में भी वही घृणा थी जो शेर के मन में थी।" नाम
बस फिर क्या था, दोनों में जमकर युद्ध होने लगा। शेर ने अपने पंजे बैल के शरीर में गाढ़ दिये।

बैल ने अपना लम्बा सींग शेर के पेट में घौंप दिया। दोनों के शरीर से खून निकल रहा था।दमनक और करकट वहां पहुंच गए थे। करकट ने दो मित्रों को इस प्रकार लड़ते देखकर कहा, “अरे यार दमनक ! तूने इन दोनों को लडाकर अच्छा नहीं किया। अच्छा मंत्री तो वही होता है जो प्यार से अपना कार्य करे। यदि स्वामी ही मार डाले गए तो तू मंत्री किसका बनेगा ? सामादि को जो चार नीतियां हैं उनमें दंड नीति का प्रयोग तो सबसे आखिर में करना चाहिए। यदि मीठा देने से शत्रु मर जाए तो जहर देने की क्या ज़रूरत है ? तुम चाहो तो अब भी इन दोनों में संधि करवा सकते हो।"“नहीं...मैं यहीं नहीं करूंगा। मेरी भलाई इन दोनों की लड़ाई में है,” दमनक बोला।

"मैं समझता हूं भाई । इसमें तो तुम्हारा कोई दोष नहीं। यह दोष तो केवल उस मालिक का है जिसने तुम पर विश्वास किया। मगर याद रखना मालिक के साथ धोखा करने वाले लोग कभी-न-कभी ऐसी मुसीबत में फसते हैं कि वहां से कभी निकल नहीं पाते । किन्तु मूर्ख को उपदेश देने से क्या लाभ ?"सूखी लकड़ी की आग बुझती नहीं।" “पत्थर का छुरा काम नहीं करता।” और “सूचीमुख की भांति अपात्र चेले को उपदेश नहीं दिया जाता।” “यह कैसे भाई ?" जरा मुझे भी तो बताओ। “ज़रूर, लो सुनो-।"