बिना कारण त्याग नहीं-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 04,2021 06:25 AM posted by Admin

जब मैंने किसी तूफान तथा वर्षा काल में, व्रतग्रहण के लिए किसी ब्राह्मण से प्रार्थना की तो वहीं रुक गया और विश्राम करने लगा। जब मैं सोकर उठा तो उस ब्राह्मण को अपनी पत्नी से बातें करते सुना। वह अपनी पत्नी से बोला—“हे पत्नी, अति फल देने वाली दक्षिणाएं संक्राति होंगी, सो मैं दान प्राप्त करने के लिए दूसरे गांव जाऊंगा, तुम एक ब्राह्मण को भगवान् सूर्य के नाम का भोजन करवा देना।"


पति की बात सुन पत्नी कठोर वचनों से उनकी निन्दा करते हुए बोली-“तुम्हारी जैसे सुस्त प्राणी के यहां किसी को भोजन कहां से प्राप्त होगा ? तुम्हारे साथ मुझे कभी सुख नहीं मिला । न कभी अच्छे भोजन मिले, न वस्त्र, न जेवर।"पत्नी की बात सुन ब्राह्मण धीरे से बोला-“प्रिय, ऐसा कहना ठीक नहीं है, यदि तुम्हारे पास एक ही रोटी है तो उसमें से आधी भूखे को दे देना चाहिए, क्योंकि चाहने पर धन और ऐश कैसे मिलता है ? क्योंकि हमने सना है कि सखी और अमीर लोग बहुत दान से जो फल पाते हैं, गरीब लोग वही फल एक कौडी का बीसवां भाग दान करके प्राप्त कर लेते हैं । दानी छोटा भी सेवा करने वाला होता है। कंजूस अमीर भी। मीठा जल देने वाले कुएं से सब खश रहते हैं, खारे जल वाले समुद्र से कोई नहीं। यह समझकर गरीब को भी समय-समय पर थोड़ा बहुत दान करना चाहिए। कहा भी है

सच्चे प्राणी को श्रद्धापूर्वक, देश, कालानुसार जैसे भी हो दान देने पर चाहे फल की प्राप्ति होती है । अधिक लोभ नहीं करना चाहिए । अधिक लोभ करने वाले के मस्तिष्क पर शिखा हो जाती है। "पत्नी बोली वह कैसे-?" लो सुनो