भाग्य बलवान है-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 04,2021 07:02 AM posted by Admin

किसी शहर में सोमिलक नाम का जुलाहा रहता था। वह बेचारा दिन-रात कपड़े बुनता लेकिन उस बेचारे के पास सदा ही धन की कमी रहती यहां तक कि घर के खर्च के लिए भी वह चिन्तित रहता था। उसके साथी जो बढ़िया कपड़े न बुनकर घटिया कपड़े बुनते थे वे सबके सब अमीर हो गए थे।

एक दिन दुःखी होकर उसने अपनी पत्नी से कहा "देखो प्रिया ! हम यहां पर बहुत दुःखी हैं। हमारे सारे साथी अमीर होते जा रहे हैं। इसलिए मैं इस शहर को छोड़कर किसी दूसरे शहर में जाकर अपना काम करूंगा जिससे मैं भी अमीर बन सकू।" “प्राणनाथ ! अपना शहर छोड़ना अच्छा नहीं होता। यह धन तो नसीब के बिना नहीं मिलता। फिर इंसान के पिछले जन्मों का भी हिसाब इसके साथ जुड़ा होता है । इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करती हूं कि यहां पर अपने काम में लगे रहो।"

“नहीं प्रिया ! यह बात ठीक नहीं। बिना हिम्मत के फल नहीं मिलता। हां, यदि हिम्मत करने पर भी धन न मिले तो इसे भाग्य के साथ जोड़ा जा सकता है।"बस इसके पश्चात् जुलाहा अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर चला गया। वहां पर दिन-रात काम करके उसने बहुत-सा धन जमा कर लिया। धन जमा होने पर उसने घर वापस आने की तैयारी की। वह अपना सामान इकट्ठा कर उस शहर से अपने शहर की ओर चल पड़ा। राह चलते-चलते उसे रात पड़ गई। उसने सोचा कि रात को इसी जंगल में विश्राम कर लिया जाये। यही सोच वह एक बरगद के वृक्ष के नीचे सो गया। सोते-सोते रात को उसने दो भयंकर प्राणियों को बात करते सुना पहले ने कहा, “क्या तुम नहीं जानते कि इस जुलाहे के भाग्य में खाने-पीने को छोड़ और कुछ नहीं है।" दूसरा बोला, “हे कर्म ! उद्योगियों को अवश्य धन देना चाहिए पर उसका फल तो तुम्हारे अधीन है।"
ये बातें सुनकर जुलाहा घबरा कर उठा और उसने सबसे पहले अपने धर्म की पोटली को देखा-“वहां तो धन का नाम भी न था। उसका सारा धन कहां गया ?"

हे भगवान ! यह आपने क्या किया ? मेरी सारी कमाई चोर ले गये। मैंने कितने दुःखों से यह धन कमाया था। अब मैं खाली हाथ जाकर अपने घर वालों को क्या मुंह दिखाऊंगा ? दुःखी होकर जुलाहा बेचारा उसी शहर की ओर फिर वापस चल पड़ा। जहां से वह धन कमाकर लाया था। थोड़े समय में ही दिन-रात परिश्रम करके उसने फिर धन जमा कर लिया। अब दोबारा वह जब अपने घर की ओर चला तो उसने यह फैसला कर लिया था कि अब यदि उसे नींद आएगी भी तो भी वह रास्ते में सोएगा नहीं। यही सोचकर जुलाहा चला जा रहा था कि एक स्थान पर फिर उसे दो भयंकर आदमी खड़े मिले जो आपस में बातें कर रहे थे। एक ने कहा, “ओ कर्ता-तूने इसे इतना धन क्यों दिया जबकि तुम जानते हो कि इसके भाग्य में केवल दो समय की रोटी ही लिखी है।" दूसरा बोला-“हे कर्म, परिश्रमी व्यक्ति को धन देना तो मेरा कर्त्तव्य है। उसका परिणाम तो तुम्हारे हाथ में ही है।" यह सुनकर जैसे ही जुलाहे ने अपनी धन वाली पोटली को हाथ लगाया तो सारा धन उसमें से गायब था। थैली खाली थी।

यह बेचारा तो हैरान, परेशान, दुःखी होकर यह सोचने लगा कि अब उसके जीने का ही क्या लाभ ! अब तो मर जाना ही अच्छा है । क्यों न मैं इस वृक्ष में फन्दा लटका कर मर जाऊं ? वह बेचारा मरने के लिए उस वृक्ष पर लंटकने लगा। उसे इस प्रकार मरते देख कर आदमी ने उससे कहा- “अरे मूर्ख, तुम क्या कर रहे हो ?" “मैं मर रहा हूं। मैं इस दुनिया में जीना नहीं चाहता। मेरा सारा धन दो बार लुट चुका है। अब मैं जीकर भी क्या करूंगा ?" वह पुरुष जोर से हंसा और बोला, “अरे ओ मूर्ख, मैं तेरा भाग्य हूं और याद रख तेरे नसीब में खाने-पीने के सिवा और कुछ नहीं है । जा अब तू अपने घर जा। मैं तेरे परिश्रम से बहत खुश हुआ है।

“मेरे भाग्य, अब मैं घर खाली हाथ कैसे जाऊं? मुझे मेरा धन दे दो ताकि मैं अपने घर वालों को कुछ तो खाने को दे सकू। “अरे भोले मानव ! तू उस धन को लेकर भी क्या करेगा जो तेरे भाग्य में ही नहीं है।" “मेरे भाग्य में धन हो या न हो, किन्तु मुझे धन की जरूरत है । मैं अपने मित्रों और घर वालों को यह बताना चाहता हूं कि मैं खाली हाथ नहीं आया।" यदि ऐसी ही बात है तो प्राणी सुन, तू यहां से बहुत दूर एक पुराने मन्दिर में चला जा, वहां पर जाकर तुम उन दो देवता पुरुषों से मिलो जिनमें से एक का नाम है गुप्तधन, दूसरा उपयुक्त धन । इनमें से जिसे भी तुम चाहोगे मैं तुम्हारे हवाले करके तुम्हारा नसीब लिख दूंगा। इतना कहकर वह देव प्राणी वहां से गायब हो गया।

जुलाहा हैरानी से इधर-उधर देखता रहा पर वहां तो कुछ भी नहीं था। देवता स्वरूप प्राणी जा चुका था। उसके जाने के पश्चात् वह जुलाहा उस मन्दिर की ओर चल पड़ा जिसके बारे में भाग्य देवता ने बताया था।
उस पुराने मन्दिर में पहुंचते ही उसे वही दोनों प्राणी नज़र आये जिन्होंने उसका धन चुराया था। वे जुलाहे को देखकर बोले "आ गए मूर्ख मित्र, तुम धन के लोभी हो, तुम धन को जमा करके रखना चाहते हो । यही तुम्हारी मूर्खता है । अरे धन कमाना खाने की चीज़ है, जमा करने की नहीं। फिर तुम अपने भाग्य पर विश्वास नहीं करते, यही तम्हारी भूल है। तभी तो तुम भटक रहे हो । कहा गया है “अग्नि होत्र रूपी फल जिसमें हो वही ज्ञान है।" "जिससे चरित्र और स्वभाव सुधरे, वही विद्या है। "जिससे पुत्र रूप फल प्राप्त हो वही स्त्री है।" "दान तथा भोग धन ही धन है।” अब तुम यह निर्णय करो कि तुम्हें कौन-सा धन चाहिए। "खाने-पीने अथवा जमा करने वाला ?कलादा उनकी बातों को समझ गया उसे ज्ञान प्राप्त हो गया था। उसे यह पता चल गया था कि यह दोनों प्राणी देवता हैं । उसने उनके आगे हाथ जोड़ते हुए कहा
"हे भगवान ! मुझे तो ऐसा धन देना जिससे मैं अपना पेट भर सकूँ। अपने बच्चों और परिवार का पेट भर सकूँ । “जाओ प्राणी, तुम्हारी यह आशा पूरी होगी।"

जुलाहा खुश होकर अपने घर को वापस चला। देवता ने उसे पेट भर कर खाने के लिए धन दे दिया था। “इसलिए कहता हूं कि मेरे मित्र चूहे, तुम्हें धन के बारे में कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए। धन केवल दान और भोग के लिए होता है। मधु मक्खियों को देखो उनका संचित धन क्या है ? उसे तो दूसरे ही लोग ले जाते हैं। इसलिए बुद्धिमान को केवल जमा करने के लिए ही धन नहीं कमाना चाहिए। जो मूर्ख लोग धन आदि में सुख समझते हैं वे गर्मी के सताए हुए होकर भी ठंडक के लिए मानो आग का प्रयोग कर रहे हैं । देखो सांप हवा पीते हैं किन्तु कमजोर नहीं होते। सूखे घास-फूस तिनके खाकर हाथी बलवान होते हैं। मुनि लोग फल-फूल खाकर अपना समय व्यतीत करते हैं । वास्तव में संतोष ही संसार का सबसे बड़ा खज़ाना है। संतोषी को जो आनन्द मिलता है वह इधर-उधर दौड़ने वाले लोगों को कभी नहीं मिलता। इसलिए मित्र तुम्हें संतोष करना चाहिए।"

अभी वे लोग यह बातें कर ही रहे थे कि एक जंगली हिरण किसी शिकारी के डर से छुपता-छुपाता उसी तालाब पर पहुंच गया। उस घबराये हुए हिरण को देख कौवा झट से उड़कर वृक्ष पर जा बैठा। चूहा अपने बिल में घुस गया। कछुआ पानी में जा छुपा। हिरण बेचारा चिंतित-सा खड़ा इधर-उधर देखता हुआ बोला, “अरे भाई लोगो, मैं इस समय मुसीबत में घिरा हूं मेरे पीछे शिकारी लगा है। इसलिए मुझे बचाने का प्रबन्ध करो नहीं तो मैं मारा जाऊंगा।” हिरण की बात सुन कछुआ बोला, “अरे मित्र ! ऐसे अवसर पर नीति शास्त्र यह कहता है सुनो “शत्रु से मुझभेड़ होने पर केवल दो ही उपाय हैं-1. लड़ना अथवा 2. भाग जाना । 

इसलिए जब तक शिकारी नहीं आता तब तक तुम घने जंगल की ओर भाग जाओ।" ऊपर बैठे हुए कौवे ने कहा, "हे मित्रो ! चिंता मत करो ! मैंने ऊपर से देखा है कि वह शिकारी थक हारकर वापस घर की ओर लौट गया है । इसलिए तुम लोग आराम से बाहर आ जाओ।"इसके पश्चात् यह चारों मित्र तालाब के किनारे वृक्ष की छाया में बैठकर आराम से बातें करते हुए समय व्यतीत करते रहे । ठीक ही कहा है- जो सुख स्त्री सतसंग से मिलता है वह अच्छे मित्रों से बातचीत से भी प्राप्त होता कुछ दिनों के पश्चात् जब ये सब मित्र इकट्ठे हुए तो हिरण नहीं आया। सब लोग हिरण को न पाकर बहुत चिन्तित हुए और आपस में कहने लगे कि आखिर बात क्या है जो हमारा मित्र नहीं आया, कहीं किसी शेर ने तो उसे नहीं मार दिया या फिर किसी शिकारी ने उसे मार दिया हो । कछुआ और चूहा कौवे से बोले, “भाई हम दोनों तेज़ नहीं चल सकते तुम ही उड़कर उसे जंगल में ढूंढो शायद कहीं मिल जाए।" - अपने मित्रों की बात सुनकर कौवा जंगल की ओर उड़ गया। अभी वह थोड़ी दूर ही गया था कि उसने जंगल में जाल में फंसे हिरण को देखा। तब दुःखी होकर कौवा उससे बोला "मित्र, यह क्या हुआ ?"

आँखों में आँसू भरते हुए हिरण ने कहा-“हे मित्र, अब तो मेरी मौत निकट आ चुकी है। अच्छा हुआ तुमसे भेंट हो गई। यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो तो क्षमा कर देना मेरे मित्रो।"हिरण भाई, तुम हमारे मित्र हो । तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो। हम अपने मित्र पर अपनी जान दे देंगे। तुम ठहरो मैं अभी अपने दोनों मित्रों को लेकर आता हूं।" कौवे ने कहा।

कौवा अपने मित्रों के पास वापस गया और उसने हिरण के जाल में फंस जाने की बात कही। तब चूहे ने कहा-"मित्र, तुम मुझे अपनी पीठ पर लाद कर जल्दी से हिरण के पास ले चलो मैं उसका जाल काट दूंगा।"
इस प्रकार कौवा चूहे को लेकर हिरण के पास पहंच गया। चूहे को अपने पास आता देख हिरण की आंखों में खुशी के आंसू भर आए। जैसे अंधेरे में आशा की किरण दिखाई दे जाए। चूहा हिरण से बोला, “अरे भाई, तुम तो नीति शास्त्र के बड़े ज्ञानी हो। तुम कैसे जाल में फंस गए ?" - "भैया ! यह बातों का समय नहीं, तुम शिकारी के आने से पहले इस जाल को काट डालो।" चूहे ने हंसकर कहा, “अरे भाई, क्या तुम मेरे आने पर भी उस शिकारी से डरते हो?"

इसी बीच धरती पर रेंगता हुआ कछुआ भी अपने मित्रों से आ मिला था। कछुए को देखकर हिरण बोला, “देखो भाई, इस कछुए ने नीति के विरुद्ध काम किया है। अब यदि शिकारी आ गया, मैं तो जाल कटने पर भाग जाऊंगा । तुम किसी झाड़ी में छुप जाओगे, कौवा उड़ जाएगा। यह पानी में रहने वाला मित्र कहां जाएगा ? इसी बीच वह शिकारी इधर ही आ गया। तब तक चूहा तो जाल काट चुका था। हिरण जंगल की ओर भाग गया । कौवा पेड़ पर जा बैठा। किन्तु कछुआ बेचारा...खड़ा रह गया।

शिकारी हिरण के जाल से निकल जाने से बहुत दुःखी हुआ। उसने सामने ही एक कछुए को देखकर शांति का सांस लिया । चलो हिरण न सही कछुआ ही सही, कुछ तो खाने को मिलेगा, यही सोचकर उसने कछुए को अपने तीर से बांध कर कंधे पर लटका लिया। अपने मित्र को इस प्रकार जाते देख कौवा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, “देखो, देखो... क्या जुल्म हो गया, हमारा मित्र हमसे जुदा हो गया।”

चहे ने कहा, “घबराने से कोई लाभ नहीं । अब तो अपने मित्र को की बात सोचो। "हां, बात तो ठीक है। हमें ठंडे दिमाग से सोचना होगा। बुद्धि के बल से ही हम इस पापी शिकारी को हटा सकते हैं। फिर अचानक ही कौवा बोला। “लो मित्रो बात बन गई । देखो, हिरण एक तालाब के किनारे जाकर लेट जाए। मैं इसके ऊपर जाकर बैठ जाऊंगा। शिकारी यह समझेगा कि हिरण मरा हुआ है । वह इसे पाने के लिए दौड़ेगा । इतने में तुम शिकारी के तीर के बन्धन काट देना, बस कछुआ तालाब में छलांग लगा देगा।"

इन सब ने कौवे के दिमाग की दाद दी । बस फिर क्या था कुछ ही क्षणों में सारा काम पूरा हुआ। शिकारी ने हिरण को सामने पड़े देखा तो बड़ा खुश हुआ उसका खोया हुआ शिकार मिल गया था भले ही वह मर चुका था, वह कछुए को फैंक हिरण को कब्जे में करने के लिए दौड़ा। बस चूहे ने दांव मारा । उसने तीर से रस्सी को काटा और कछुए को मुक्त करवाया। कछुआ तालाब में घुस गया। शिकारी जैसे ही हिरण की ओर गया तब छलांग लगाते हुए हिरण भी वहां से भाग निकला। शिकारी निराश होकर अपने भाग्य को रोने लगा और कहने लगा, “मेरा तो नसीब फूट गया है।"कौवा, कछुआ, हिरण, चूहा चारों मित्र हंसते हुए चले गए।