वंश से ही वीरता-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 05:12 AM posted by Admin

एक बार किसी देश में युधिष्ठिर नाम का एक कुम्हार रहता था, एक बार वह भागते-भागते बड़े ज़ोर से जो गिरा तो उसके माथे पर बड़ा गहरा घाव हो गया, जैसे ही यह घाव ठीक हुआ तो उसके माथे पर पक्का निशान छोड़ गया। कुछ समय के पश्चात् उस देश में भयंकर अकाल पड़ गया। जिसके कारण उस कुम्हार को अपने कई साथियों के साथ किसी दूसरे देश में जाना पड़ा। वहां पर जाकर कुम्हार राजा की सेना में भर्ती हो गया। एक दिन राजा ने जैसे ही उसके माथे पर गहरा घाव देखा तो सोचा यह तो कोई बहादुर आदमी है, जिसके माथे पर किसी युद्ध में यह घाव लगा होगा।

यही सोचते हुए राजा ने अपनी सेना में विशेष स्थान देकर उस वीर का सम्मान किया। एक बार राजा ने सोचा कि अपने वीरों की शक्ति परीक्षा लेने के लिए नकली युद्ध का प्रबन्ध किया जाए। बस फिर क्या था, इस नकली युद्ध की तैयारियां आरम्भ हो गईं। राजा ने उस कुम्हार वीर को सबसे अलग ले जाकर पूछा “वीर ! तुम्हारा नाम क्या है ? यह तुम्हारे माथे पर जो घाव है यह किस युद्ध में आया था सीधा-सादा कुम्हार बेचारा क्या जानता था, उसने झट से सत्य बोल दिया “हे महाराज ! मैं तो जाति का कुम्हार हूं, यह चोट तो बचपन में बर्तनों से पांव फिसल कर गिर जाने से आई थी, जिसका निशान मेरे माथे पर पक्का हो गया।

कुम्हार की बात सुन राजा को बहुत क्रोध आया उसने कुम्हार को धक्का देते हुए कहाम “धोखेबाज, जा निकल जा, मेरी फौज में से, मैं तुम्हारे जैसे धोखेबाज की शक्ल नहीं देखना चाहता। "महाराज ! आप यह तो देखें कि मैं कितना बलवान हूं, मुझे नौकरी से न निकालें।" मैं मानता हूं कि तुम में सारे गुण हैं, किन्तु जिस कुल में तुमने जन्म लिया है उस कुल में हाथी नहीं मारे जाते।" “क्यों महाराज ! ऐसी भी क्या बात है ?" “हां ऐसी ही बात है।” लो मैं तुम्हें सुनाता हूं