बाघ की खाल में गधा-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 05:40 AM posted by Admin

किसी धोबी के पास बहुत बढ़िया शक्तिशाली गधा था। कुछ समय बाद वह बेचारा बीमार हुआ तो कुछ कमजोर हो गया। धोबी उसे कमजोर देखकर बहुत दुःखी हुआ। एक दिन धोबी जंगल में जा रहा था तो उसने रास्ते में पड़ी हुई बाघ की लाश देखी। उस बाघ की लाश को देखकर धोबी ने योजना बनाई कि मैं इसकी खाल उतार कर अपने गधे को पहना दूं, बस फिर गधे को रात को अकेला छोड़ दिया करूंगा। वह बड़े आराम से हर खेत में जाकर चरने लगेगा। लोग उसे बाघ समझकर डर जाया करेंगे। उस गधे को कोई कुछ नहीं कहेगा। इस प्रकार गधा बाघ का रूप धारण कर बड़े आनन्द से लोगों की फसलें खाने लगा। कुछ ही दिनों में वह मौटा-ताजा हो गया। अब तो उसे देखकर ही लोग डरते थे। जिधर भी वह निकल जाता सभी उसे देखते ही भाग खड़े होते । धोबी को भी लाभ हो गया कि उसे अब अपने गधे पर कुछ भी तो खर्च नहीं करना पड़ता था। इस प्रकार दोनों आनन्द लेने लगे ।

एक दिन उस गधे ने चरते-चरते एक गधे को जो देखा तो अपनी भाषा में हींचू... हींचू... हींचू... करने लगा। खेतों के रखवालों ने देखा यह तो साला बाघ की खाल में गधा है। यह हमें आज तक पागल बनाकर हमारी फसलें खाता रहा। बस फिर क्या था, उन किसानों ने उस गधे को लाठियां मार-मारकर वहीं पर मार डाला। “इसीलिए मैं कहता हूं कि अपनी जरा-सी भूल के कारण भी लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं । औरत प्रेम में अन्धे होकर अपने आपको भी भूल जाती है।" बन्दर की बात सुनकर मगरमच्छ की आंखें खुल गई थीं। वह अपनी भल पर पश्चाताप करने लगा था। वह बन्दर को कहने लगा-"मित्र ! वास्तव में ही मैं तुम्हारा अपराधी हूं । औरत के प्यार में अन्धा होकर मैं सब कछ भूल गया था। अब तो मैं औरत के प्रेम की ही आग में मरूंगा।"

“अरे मगरमच्छ तू तो बिल्कुल मुर्ख है जो ऐसी औरत के लिए मरना चाहता है, जो दुष्ट है, ऐसी औरत के मरने पर तो खुशी मनानी चाहिए । याद रख जो औरत के मन में होता है वह वाणी के अन्दर भी नहीं होता।" अभी वह दोनों बातें कर रहे थे कि मगरमच्छ का एक मित्र मगरमच्छ आया। वह आते ही उस मगरमच्छ से बोला-"मित्र ! तम्हारे घर पर किसा दूसरे मगरमच्छ ने कब्जा किया है।" यह सूचना पाते ही मगरमच्छ और भी दुःखी हुआ और रोते हुए कहने लगा–“यह तो और भी बुरा हुआ, मित्र भी हाथ से गया, घर पर किसी और ने कब्जा जमा लिया।

अब मेरा क्या बनेगा ? क्या अब मुझे उस मगरमच्छ से लड़ाई करनी चाहिए या सन्धि “अरे भाई बन्दर, अब तुम ही बताओ कि मैं क्या करूं ? ठीक है मैंने तुम्हें भी धोखा दिया, लेकिन तुम यह तो जानते हो कि मेरा इस दुनिया में कोई नहीं । अब तुम ही बताओ कि में क्या करूं?” “मगरमच्छ ! मैं तुम्हें कुछ नहीं बताऊंगा । क्योंकि तू मुझे पत्नी के कहने पर जान से मारने लगा था। पत्नी हर एक को ही प्यारी होती है मगर उसके कहने पर मित्रों की जान तो नहीं ली जाती और मूर्ख तू अपनी मूर्खता से ही मरेगा । यह मैंने पहले ही कह दिया था, जो अहंकार के कारण अपने मित्रों की बात नहीं मानता वह घटोष्ट्र की भांति शीघ्र नष्ट हो जाता है।""वह कैसे नष्ट हआ था ?" “लो सुनो उसकी भी कहानी।