औरत का जादू-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 05:27 AM posted by Admin

एक बार एक नगर में एक पंडित रहता था। उसे अपनी पत्नी से बहुत ही प्यार था। एक बार इन दोनों पति-पत्नी की परिवार वालों के साथ लड़ाई हो गई जिसके कारण इन्हें अपना घर छोड़कर दूसरे शहर में जाना पड़ा। रास्ते में जाते-जाते उसकी पत्नी ने कहा-'पतिदेव, मुझे पानी की प्यास सता रही है कहीं से पानी लाओ।

पत्नी का बात सुन वह पंडित पानी लाने के लिए निकल गया। जैसे ही वह पानी लेकर आया तो वह क्या देखता है उसकी पत्नी मरी पड़ी है। उसे देखते ही वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसे रोते देख ऊपर से आकाशवाणी । हे पंडित ! यदि तुम इसे अपनी आधी आयु दे दो तो यह बच सकती उस आवाज़ को सुनते ही पंडित ने सच्चे दिल से तीन बार कहा भगवान् ! मैं अपनी खशी से इसे अपनी आधी आयु देता हूं।"

एक बार नन्द नाम का एक राजा समुद्री तट की धरती पर राज्य करता था। उसका एक बुद्धिमान मन्त्री था जिसका नाम वरुचि था। राजा और मन्त्री में काफी प्रेम था। दोनों एक-दूसरे की बात पर काफी विश्वास करते थे। राजा नन्द की महारानी एक दिन उनसे किसी बात पर नाराज़ हो गई। उस राजा के लाख यत्नों पर भी वह नहीं मानी, उस रात न तो उसने खाना खाया न ही महलों में दीप जले। रानी को नाराज़ देखकर राजा का दिल भी बहुत उदास हो गया। अब वह अपनी रानी के पास जाकर बोला “हे महारानी ! देख मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूं, तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता । तुम जो कहो मैं वही करने के लिए तैयार हूं। बस एक बार तुम हंस दो। तुम्हारी हंसी के साथ ही मेरे उजड़े महलों में बहार आ जाएगी।"

महारानी ने राजा की ओर देखकर कहा-"क्या आप मेरी इच्छा पूरी“हां. हां. मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूंगा। मैं इस देश का राजा "ठीक है, आप आज मेरे घोड़े बन जाइए। मुंह में लगाम डालकर मैं तुम्हारी पीठ पर बैठ सवारी करूंगी और तुम घोड़े की भांति ही हिनहिनाते हुए इन महलों का चक्कर काटोगे।" राजा ने बिना संकोच के ऐसा ही किया। घोड़ा बनकर रानी को खुश कर दिया। उधर राजा के मन्त्री की पत्नी भी नाराज हो गई। मन्त्री ने उससे पूछा कि तुम क्या चाहती हो। उसने कहा–यदि तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो तो अपना सिर मुंडवा दो ।

मन्त्री ने पत्नी के कहने पर अपना सिर मुंडवा दिया। इस प्रकार उसने भी अपनी स्त्री को खुश कर दिया। सुबह जैसे ही मन्त्री जी राजा के पास पहुंचे तो उसका सिर मुंडा देखकर राजा ने पूछा-आपने किस पर्व में सिर मुंडवाया मन्त्री ने हंसते हुए कहा-औरतों के कहने पर पुरुष क्या कुछ नहीं करता । मैंने उसी पर्व में सिर मुंडवाया है जिसमें घोड़े को छोड़कर सभी प्राणी हिनहिनाते लगते हैं। मन्त्री की बात सुनकर राजा को ऐसा लगा जैसे उसकी कोई चोरी पकड़ी गई हो । वह चुपचाप सोचने लगा कि मैं अकेला ही नहीं औरत के लिए सभी पति कुछ-न-कुछ करते ही हैं।

"अब तू भी सुन ले पागल मगरमच्छ ! तू भी उस राजा और मन्त्री की भाति औरत के वश में है। अब तू मुझे मारने पर तुला हुआ है ताकि अपनी भारत को खुश कर सके। अपने ही वाणी के दोष से तेरी यह चाल पकड़ी बाघ के चमड़े से ढका हआ गधा ऐसी ही भल किये जाने के कारण जानसे मारा गया। “वह कैसे मारा गया ?" जरा मैं भी तो सुनूं । “हां हां तुम ज़रूर सुनो-"