अपना-अपना सुख-पंचतंत्र की कहानियां

Apr 05,2021 07:46 AM posted by Admin

एक पक्षी के दो मुंह थे। उसे एक बार एक बहुत बढ़िया फल मिला जिसे खाकर वह अमर हो सकता है । जैसे ही उसने उस फल को एक मुंह में डाला तो दूसरे मुंह ने कहा कि भाई आधा मेरे मुंह में भी डालो। हम दोनों मिलकर के लिए इसे खाएंगे।पहले मुंह ने कहा कि हम दोनों का पेट तो एक है फिर दो जगह खाने का क्या लाभ है ? क्यों न हम इसे अपनी पत्नी को आधा खिला दें। पहले मुंह ने जाकर उस फल का आधा भाग अपनी पत्नी को दिया जिसे खाकर वह उस मुंह से बहुत प्यार करने लगी। इसे देख दूसरा मुंह अन्दर-ही-अन्दर जलने लगा और उससे बदला चुकाने की बात सोचने लगा। एक दिन दूसरे मुंह को एक जहरीला फल मिल गया। उसने पहले मुंह से कहा-देख आज मैं तुम्हारे से बदला चुकाने के लिए इसे खाकर मरता हूँ |

ऐसा मत करो, इससे तो हम दोनों ही मारे जाएंगे। "मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं तुमने भी तो अपना सुख देखा था। यह कहकर दूसरे मुंह ने वह जहरीला फल खा लिया जिससे वे दोनों मर गये। तभी तो मैं कहता हूं समय को देखकर ही चलें। चक्रधर ने कहा कि यह ठीक है भाई, यह सब समय की बातें हैं। मैं लालच में आकर इस पहाड़ की चोटी पर चढ़ आया और तुम तीनों भाईयों को भी भूल गया। मुझे इस पाप का फल भी मिल रहा है। अब तुम जाओ मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। यह सुनकर वह उसे उसी हालत में छोड़कर अपने घर को लौट आए। ब्राह्मणी ने इस प्रकार उस लोभी लड़के को कथा सुनाकर कहा कि लोभ में आकर तुमने मेरी बात नहीं मानी, इसीलिए यह हालत हो गई। इसीलिए मैं कहती हूं कि अधिक लालच नहीं करना चाहिए। यह सुनकर देव शर्मा ने कहा, "जिसके घर खाने को न हो उसका भिक्षा के लिए जाना लोभ नहीं कहा जा सकता । तूने अपने पुत्रवत पाले हुए अपने पुत्र के रक्षक को नकुल की विशेषता को जाने बिना बहुत बुरा काम किया मन्त्रियों ने कहा कि आप अपने घर जाएं । कहा भी हैस्वादिष्ट भोजन अकेले न करें। सोये हुए लोगों में अकेले न जागें।। अकेले रास्ता न चलें, अकेले विचार न करें । यात्रा में यदि दूसरा साथी बुजदिल भी है तो भी सहायक होता है। देखो दूसरे साथी करटक ने अपने साथी की जान बचाई। “वह कैसे वह बोला-"मार्ग में एक से दो भले।" “लो सुनो उसकी कहानी।"