श्रवण सुख-दादी माँ की कहानी

Apr 08,2021 02:46 AM posted by Admin

एक गवैया था। जो सुर-ताल-लय के साथ बहुत अच्छा गाता था। वह नये-नये गीतरचता और लोगों को सुनाता। रसिक उसके गीत सुनते और श्रद्धा और हैसियत के अनुसार कुछ न कुछ देते। इसी तरह गवैये की गुजर-बसर हो जाती गवैया एक के बाद एक गाँव और शहर में घूमता फिरता।एक-दिन वह घूमते-घूमते एक शहर के एक व्यापारी की दुकान के पास पहुँचा। दुकान बड़ी सजीली और सुन्दर थी। सेठ भी रोबीला था। उसने सोचा कुछ गाकर सुनाऊँ, सेठ की कृपा हो जाये। ऐसा सोचकर वह दुकान के सामने बैठकर गाने लगा।

एक के बाद एक गीत गाना शुरू किया तो समां सा बंध गया। वह एकके बाद एकगीत गाता गया लेकिन सेठ की वाह-वाह बंद ही न हुई। आखिरकार उसने गाना बंद किया।सेठ ने खुश होते हुए मुनीम को हुक्म दिया-"वाह क्या गायक है ये। मुनीम जी इन्हें दो हजार सोने की मुहरें दे दीजिए। सेठ की बात सुनते ही गवैया बहुत प्रसन्न हो गया। गवैये ने तो दो मुहरें भी कभी देखी न थी। अब तो उसे दो हजार मिलने वाली थई । वह मगन हो गया। सोचने लगा"सेठ की ही तारीफ पर गीत रचना चाहिए। गवैया सपने देखने बैठ गया। इसी तरह दोपहर बीती, शाम बीती, देखते ही देखते अंधेरा घिरने लगा। पर मुनीम अपनी गद्दी छोड़ उठा ही नहीं।"आखिर परेशान होकर गवैये ने सेठ से कहा- हुजूर, वो मुहरें मिली ही नहीं मुझे।"सेठ कंजूस था। वह गवैये से बोला-"भाई, गा-बजाकर मेरे कानों को तुमने सुक दिया। बदले में मुहरों कीबात कहकर मैंने तुम्हारे कानों को सुख दिया। बस यही लेना-देना है। इसे छोड़ तुमने मुझे क्या दिया, जो मैं तुम्हें कुछ दूँ ?"