सरग दिदा पाणी दे-दादी माँ की कहानी

Apr 07,2021 07:47 AM posted by Admin

गढ़वाल के एक हरे-भरे गाँव में एक बढिया अपनी जवान बेटी और बहन बहुत ही हंसी-खुशी के दिन बिता रही थी। वह बहू और बेटी के बीच कोई भेद-भाव नहीं करती थी। दोनों को समान भोजन देती और समान काम करवाती थी। दोनों ननद-भाभी बड़े प्यार से रहती थी। न कभी आपस में लड़ाई-झगड़ा करती और न ही इष्या-द्वेष। दोनों में अंतर था तो बस यही कि बहू अपना काम पूरी ईमानदारी और बार टोक भी चुकी थी और बार-बार उसे अपनी भाभी से सीख लेने के लिए कहती थी लेकिन उसके कान पर जूं तक न रेंगती। वह माँ की बात को अनसुनी करदेती। एक बार की बात है-गर्मियों के मौसम में लगातार कोल्हू में जुते-जुते बैल थक गए। बुढ़िया को समझ में आ गया कि बैल प्यासे हैं,लेकिन घर में बैलों को पिलाने के लिए पर्याप्त पानी न था। बैलों की प्यास बुझाने का एक मात्र साधन तालाब था। पानी पिलाने के लिए उन्हें तालाब तक ले जाना था। तालाब गाँव से लगभग एक डेढ़ किलो मीटर की दूरी पर था और ज्येष्ठ के महीने की भरी दोपहर में बैलों को तालाब तक ले जाकर पानी पिला लाना अपने आप में बड़ा दूभर कार्य था। तपती दोपहर में बैलों को लेकर बहू को भेजे या बेटी को, इस बात को लेकर बुढ़िया मुश्किल में पड़ गई।

दोनों में से किसी एक को भेजना उसे उचित नहीं लग रहा ता। अंत में सोच विचार कर उसने एक उपाय सोचा। उसने बहू और बेटी को प्रलोभन देते हुए कहा कि वे एक-एक बैल को पानी पिलाकर ले आएं और दोनों में | से जो भी पहले पानी पिलाकर घर लौटेगी उसे गरमा-गरम हलुआ काने को मिलेगा। हलुए का नाम सुनते ही दोनों के मुँह में पानी भर आया। बहु और बेटी दोनों राजी हो गई और दोनों ही अपने-अपने बैल को लेकर तालाब पर चल पड़ी। बहु बिना कुछ सोचे अपने बैल को हाँके जा रही थी जबकि बेटी इसदुर्लभ कार्य से बचने का कोई उपाय सोचने लगी। अंत में मन ही मन कुछ सोचकर वह भाभी से बोली-"हम दोनों अलग-अलग रास्तों से जाते हैं। देखते है तालाब तक कौन पहले पहुँचता है ? सीधी-सादी भाभी चुपचाप मान गई। बेटी को तो बार-बार घर में बने गर्म-गर्म हतुए की याद आ रही थी। गर्मी इतनी ज्यादा था कि उसका तालाब तक जाने का मन हा नहीं हो रहा था।"अचानक उसे अपनी बेवकूफी परहंसी आ गई और गुस्सा भी आया।

वह सोचन लगी, 'जानवर भी क्या पानी पिलाया है कि नई विचार दिमाग में आने भी क्या कभी बोल सकता है ?' किसे पता चलेगा कि मैंने बैल को लाया है कि नहीं। माँ से जाकर कह दूंगी कि पिला लाई बैल को पानी। यह माग में आते ही बिना कुछ सोचे-समझे उसने बैल को घर की दिशा में मोड सारा प्यासा बैल बिना पानी पिए ही घर की ओर चलने लगा। बेटी को देखते ही माँ ने प्रसन्न होकर पूछा-"बेटी! पिला लाई बैल को पानी।"हाँ माँ! कहते हुए वह सीधे हलुए की ओर लपकी ओर चटकारे ले-लेकर हलुवा खाने लगी।" खंटे पर बंधा प्यासा बैल उसे मजे से हलुआ खाते देख रहा था लेकिन वह बेजुबान कुछ न बोल सका। प्यास के मारे थोड़ी देर में ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गए। मरते समय उसने लड़की को श्राप दे दिया-"जै, तूने मुझे पानी के लिए तरसाया वैसे ही सृष्टि पर्यन्त तू भी चातक पक्षी बन बूंद-बूंद पानी के लिए तरसती रहेगी।"कहते हैं कि लड़की बैल के श्राप से उसी समय चातक पक्षी बन गई पानी के लिए तरसने लगी। ताल-तलैये पानी से भरे थे लेनिक उसे उनमें जल के श्तान पर रक्त-रक्ती ही नजर आ रहा था। तब से वह आसमान की ओर टकटकी बांधे आज भी चिल्लाती रहती है 'सरग दिदा पाणी दे, पाणी दे।' अर्थात् आसमान भाई पानी-पानी दे।