साधु की चार सीख-दादी माँ की कहानी

Apr 06,2021 04:45 AM posted by Admin

विजयपुर नामक नगर में चक्रदत नामक राजा राज करता था। उसका बेटा - मदनदत्त बड़ा रूपवान व बुद्धिमान था। एक दिन किसी अपराध पर राजा चक्रदत्त ने उसे देश से निकाला दे दिया। मदन दत्त ने अपने महल में आकर अपने रास्ते के खर्चे के रूप में चार लाल और कुछ थोड़ा द्रव्य लेकर नगर से जंगल की राह ली।

चलते-चलते वह अपने राज्य की सीमा से काफी दूर निकल आया। उसने तक एक स्थान पर एक आश्रम देखा, वहाँ मदनदत्त साधु को दण्डवत् प्रणाम ठ गया। साधु ने पूछा, "बच्चा, तू कौन है और यहाँ कैसे आया है ?"

तब मदनदत्त ने कहा-"महाराज! मैं राजा चक्रदत्त का बेटा हूँ। मेरा नाम मदनदत्त है। मुझे पिता ने देश से निकाल दिया है। सो मैं परदेस को जाता हूँ। यहाँ आपका आश्रम देखकर मेरे मन में आया कि महाराज के दर्शन भी करता चलूँ।'तब साधु बोला-"राजकुमार! परदेश जाते हो तो मैं तुम्हें चार बाते बताता हूँ तुम हमेशा इन बातों पर अम्ल करना। ये बातें परदेश में बड़ी काम आयेंगी।"एक बात यह है कि परदेश में एक से दो भले। दूसरी बात यह है कि परदेश में किसी दूसरे के हाथ का दिया भोजन न करना। यदि खाओ तो उसमें से पहले थोड़ासा किसी जानवर को खिलाकर फिर खाना। तीसरी बात यह है कि परदेश में किसी दूसरे की बिछाई हुई खाट पर ना सोना और चौथी बात यह है कि परदेश में कहीं शत्रुओं के फंदे में फंस जाओ तो जहाँ तक बने नम्र होकर उन्हें ज्ञान की बात सुनाकर अपना मतलब निकालना।साधु से यह सारी सीख लेकर मदन दत्त ने उन्हें प्रणाम किया और आगे की राह ली।

चलते-चलते कुछ दिनों बाद एक भयानक जंगल में जा पहुँचा। वहाँ उसने एकचील को किसी कछुए के बच्चे को लेकर उड़ते हुए देखा। भगवान की कृपा से वह बच्चा चील के पंजों से निकलकर गिर पड़ा और तड़पने लगा।तब मदनदत्त उस तड़पते हुए बच्चे को देखकर अपने मन में कहने लगा कि इस बच्चे को पालना चाहिए। इसके पालने से दो बातें होंगी एक यह कि इसकी जान बच जाएगी और दूसरी बात यह है कि हम एक से दो हो जाएंगे। मन में यह विचार कर उस बच्चे को लेकर आगे चला। चलते-चलते बहुत दिन गुजर गये। एक दिन वह एक जंगल में पहुँचा। उस वक्त दोपहर का समय हो गया था। वहाँ एक पीपल के पेड़ के नीचे मीठा कुँआ और उत्तम स्थान देखकर मदन दत्त ने सोचा कि अब इसी स्थान पर दोपहर बितानी चाहिए। यह सोचकर मदन दत्त ने स्नान ध्यान करके जो उसके पास कुछ खाने को था खाया और कछुए के बच्चे को भी खिलाया। फिर मदन दत्त उस बच्चे से बोला-"ऐ बच्चे! तुम यहीं बैठे रहना। मैं कुछ देर सो लूँ।

" तब कछुए के बच्चे ने कहा-"आप सो जाइये मैं बैठता हूँ।" तब मदन दत्त सा गया।उसी पेड के ऊपर एक साँप और एक कौआ रहते थे। उनका हमेशा यह नियम था कि जब कोई मुसाफिर उस पेड़ के नीचे आकर ठहरता तो साँप उसे काटा कौआ उसकी आँखे निकाल लेता जब मदन दत्त उस पेड के नीचे सोया तबस के नीचे उतर आया वह मदन दत्त को काट कर फिर पेड पर चढ़ गया। तब क बच्चा मदन दत्त को मरा देखकर बहत घबरा गया। मन में सोचने लगा कि करूँ? मैं अपने घर कैसे पहुंचूंगा ? न में सोचने लगा कि अब मैं क्या इसी सोच में बच्चा मदन दत्त के पास पहुंचा और बैठा-बैठा रो रहा था कि तभी कौओ भी पेड़ के नीचे उतर मदन दत्त के माथे पर आ बैठा और जैसे ही उसने मदन दत्त की आंखे निकाल लेनी वैसे ही कछुए के बच्चे ने झपट कर उस कौए को उसने मुख से पकड़ लिया। तब कौए ने साँप को पुकारा जल्दी आओ भाई नहीं तो आज मेरी जान चली जायेगी। कौए की आवाज सुनकर साँप दौड़ा आया उसने देखा कछुए ने कौए को पकड़ रखा है। तब साँप ने आते ही कई फन बड़े जोर से उस कछुए को मारे, परन्तु कछुए ने अपना मुंह भीतर को कर लिया। लाचार होकर जब साँप का वश नहीं चला तब कछए से कहने लगा कि तू मेरे मित्र को छोड़ दे।

कछुए ने कहा-मैं इसे नहीं छोडूंगा क्योंकि तूने मेरे मित्र को खाया है। मैं अब तेरे मित्र को खाऊँगा। कछुए की यह बात सुनकर साँप बोला ए कछुए। इसे किसी भी तरह छोड़ तब कछुआ बोला-जो तू मेरे मित्र का जहर चूस ले तो मैं तेरे मित्र को छोड़ दूँगा। यह सुनकर साँप ने काटी जगह पर मुँह लगाकर मदन दत्त के शरीर से सब ज़हर चूस लिया तब कछुए ने भी कौए को छोड़ दिया और मदन दत्त उठ बैठा फिर कछुए से कहने लगा कि आज तो हम बहुत सोए।तब कुछए ने साँप के काटने का सारा हाल सुना दिया, जिसे सुनकर मदनदत्त कहने लगा कि आज उस साधु की बात काम आई। मैं अकेला होता तो कैसे जीवित बचता। यह कहकर आगे चला। कई दिनों बाद मदनदत्त समुद्र के किनारे पहुँचा। तब कछुए ने कहा कि मित्र मेरे तो रहने का स्थान आ गया है अगर आपकी मर्जी हो तो अपने माता-पिता के पास हो आऊँ। जब से मैं उनसे बिछड़ा हूँ तब से वे मेरे बिना दु:खी होंगे।

यह सुनकर मदन दत्त ने उस कछुए को विदा किया और आप आगे चल दिया। रात को जंगल में जाकर सो गया। उस जंगल में एक ठग रहता था। जिसके चार बेटे और दो बेटियाँ थी। उसकी बड़ी बेटी-ज्योतिष शास्त्र पढ़ी थी। उस समय वह अपने भाईयों से कहने लगी-भाईयो! मुझको ऐसा मालूम होता है कि जंगल में कोई मुसाफिर आया है। जिसके पास चार लाल हैं अगर वे तुम उससे वह हासिल कर लो तो जन्म भर के लिए बहुत है। मगर उसको मारना मत जीवित ही पकड़ कर लाना। इस बात को सुनकर बाप और चारों बेटे जंगलों की तरफ खोजने चले। बहुत खोजने पर उन्होंने देखा एक आदमी पेड़ के नीचे सो रहा है और यही वह आदमी हैं जिसके पास लाल हैं । ठगों ने उस सोते हुए आदमी को लाकर अपनी बेटी के हवाले कर दिया और तसे कहने लगे पकड़कर लाने का काम तो हमारा था और इससे लाल निकलवाना तेरा काम है।

यह सुनकर ठग की बड़ी बेटी ने कहा, अब तुम्हारा कुच काम नहीं कर मैं निकलवा लूँगी उस वक्त ठग की छोटी बेटी ने मदन दत्त को देखा मोहित हो गई परन्तु बाप व भाईयों के डर से कुछ न बोली।रात्रि का समय था। छोटी ठगनी उसको बचाने कि फिक्र करती रही। बेटी ने खाना तैयार कर। उसमें ज़हर मिलाकर थाली परोस के मदन दत्त सेना "आप खाना खा लीजिए।"जब मदन दत्त भोजन करने बैठा तो साधु की दूसरी बात याद आई और थाली से थोड़ा-सा खाना लेकर कुत्ते को डाला।

कुत्ता खाते ही मर गया। मदन दत्त ने वह भोजन न खाया और मन में कहने लगा कि साधु की दूसरी बात भी काम आई। - ठग की बेटी ने कच्चे सूत का पलंग ऐसे कुएं पर बिछवाया कि उसमें आग भरी थी और उस पर बढ़िया किस्म का तकिया व गद्दा लगाकर मदन दत्त से कहा कि आओ पलंग पर सोओ तब मदन दत्त उस पलंग के पास गया और उस पर बैठना चाहा उसे उसी वक्त साधु की तीसरी बात भी याद आ गई। जब मदन दत्त ने उस गदेदे को फटकारा तो पलंग का सूत टूट गया और उसके नीचे आग का कुआँ नजर आया। मदन लाल मन में कहने लगा साधु की तीसरी बात भी काम आई। यह सोचकर एक टूटी खाट पड़ी थी। उसी पर पड़ा रहा और मन में सोचने लगा आज रात को प्राण बचाना कठिन है। तभी ठग की छोटी बेची मौका पाकर मदनदत्त के पास आई और बोली-हे प्रिय मैं तुमसे विवाह करूँगी, परन्तु आज की रात मेरी बड़ी बहन की बारी है।

जैसे भी हो तुम आज की रात इससे प्राण बचा लो। फिर कल के दिन मेरी बारी आएगी। मैं तुम्हारी हूँ तुमको बचा लूँगी। यह कहकर वह चली गई। उसकी बड़ी बहन हाथ में कटार लेकर मदन दत्त के पास आई। तब मदन दत्त ने मन में सोचा कि आज की रात इससे प्राण बचाना कठिन है, परन्तु देखू क्या उस साधु की चौथी बात का समय आ गया क्या ये बात भी अपना काम करती है या नहीं करेगी। इसमें कोई सन्देह नहीं इतने में ठग की बड़ी बेटी आई लाल-लाल आँखें करके मदनदत्त की छाती पर चढ़ बैठी और जोर से बोली-अरे मुसाफिर या तो अपने चारों लाल मुझे दे-दे, नहीं तो छरी से गोद दूँगी। तब मदन दत्त बोोल कि, ऐ ठग की बेटी, मेरे पास लाल नहीं और जो तू मुझ को मारेगी तो मारकर ऐसे पछताएगी जैसे बंजारा अपने लाल कुत्ते को मारक पछताता था। मदन दत्त की बात सुनकर ठग की बेटी ने कहा कि बंजारा लाल कुत्ते को मारकर क्यों पछताया ? तब मदन दत्त ने उस
बंचारी की लाल कुत्ते की ऐसी लम्बी कहानी सुनाई कि रात बीत गई।

कहानी सुनकर ठग की बेटी बोली कि, आज तूने बात बनाकर प्राण बचा लिए आधी रात को मेरी छोटी बहन का पहरा है। वह तुझे जीवित नहीं छोडेगी। कर ठग की बेटी अपनी छोटी बहन के पास आई और कहनेलगी. देख बहन को उस मसाफिर ने बातों में लगाकर प्राण बचा लिए "लेकिन त ही उससे लाल हासिल करेगी, अपनी बड़ी बहन से यह सुनकर छोटी बेटी मन ही मन बहुत खुश हुई, परन्तु दिखावा करते हुए कहने लगी कि तुम कुछ फिक्र मत करो, मुझे लाल दिए बिना वह मुसाफिर न बचेगा।"

यह कहकर वह ठग की छोटी बेटी मदन दत्त के पास गई और कहने लगी-आप अब किसी बात की फिक्र मत करो। आधी रात को हम याहँ से भागकर का हम चाह स भागकर दूर पहंच जाएंगे। मैंने एक घंटे में सौ कौस दौड़ने वाली ऊँठनी तैयार कर रखी है। आधी रात हुई। ठग की छोटी बेटी मदन दत्त ऊँठनी पर सवार होकर भाग निकले। रास्ते में राजा चक्रदत्त के सैनिकों ने मदन दत्त को पहचान लिया। राजा की आज्ञा से वह उसे ही खोजने निकले थे। वे मदन दत्त और उस सुन्दरी को विजयपुर ले गए। राजा ने उन दोनों का धूम-धाम से विवाह कर दिया।