सच्चा चोर-दादी माँ की कहानी

Apr 07,2021 02:41 AM posted by Admin

एक समय की बात है। एक नगर में एक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में बामा आये हए थे। जो प्रवचन सुनाते थे। हजारों की संख्या ने नर-नारी सभी उनका प्रवचन सुनने आते थे। महात्मा जी प्रवचन सुनाने के बाद लोगों से कहा करते सत्संग भी एक तीर्थ है, इसलिए तीर्थ की भांति यहाँ से जाने के पूर्व कम से कम एक बुरी आदत छोड़ने का संकल्प कीजिए।"

उस नगर में एक चोर रह उसे समझाया कि वह मह एक चोर रहता था जो महात्मा के पास नहीं जाना चाहता था। लागाना था। लोगों ने क वह महात्मा के पास जाए लेकिन वह नहीं माना एक दिन उसके पड़ोसी उसे जबरदस्ती महात्मा के पास ले गए। जब मन ने प्रवचन समाप्त करने के पश्चात् वही संकल्प की बात दोहराई। अन्य सभी को एक-एक बुरी आदत छोड़ने का संकल्प किया।जब चोर से एक बुरी आदत छोड़ने के लिए कहा तो वह कुछ भी छोड़ने के लि तैयार नहीं हुआ। वह महात्मा जी से बोला कि आप जोर डालते हैं तो मैं चोरी के अतिरिक्त और कोई आदत छोड़ने को तैयार हूँ क्योंकि वही मेरी रोजी-रोटी का सहारा है।

महात्मा ने कहा-"ठीक है,चोरी मत छोड़ो, झूठ छोड़ सकते हो।" उसने कहा-"हाँ छोड़ सकता हूँ। संकल्प विधिवत क्रिया से सम्पन्न हुआ।सब लोग अपने-अपने घर चले गए और महात्मा जी भी किसी अन्य स्थान पर चले गए।इस तरह समय गुजरता चला गया। चोर के पास जो सम्पत्ति थी वह समाप्त हो गई तो उसने सोचा कि चोरी की जाये।एक दिन आधी रात के समय वह राजमहल की ओर चल पड़ा। जब वह महल के पहले द्वारपाल के सामने पहुंचा तो द्वारपाल ने पूछा-"तुम कौन हो?"उसने कहा-"मैं चोर हूँ और रानी के आभूषण चुराने आया हूँ।"यह सुनकर द्वारपाल ने सोचा-यह आदमी चोर नहीं हो सकता। यह तो राजा का कोई मित्र होगा जो इस प्रकार मजाक कर रहा है।

ऐसा समझकर उसने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोल दिया। चोर अन्दर चला गया। कुछ इसी प्रकार की वार्तालाप करते हए वह रानी के शयन कक्ष में पहुँच गया। रानी सोई हुई थी। वह धीरे से उसके पलंग के निकट पहुँचा और अलमारी की चाबी ढूंढकर, अलमारी सभी गहने निकाले और एक गठरी में बाँध लिये।सारे द्वारपालों को गठरी दिखाता, वह हंसता मुस्कुराता हुआ, मैंने रानी के गहने चुरा लिए है, कहता हुआ घर चला गया।दूसरे दिन सुबह जब रानी को सारा किस्सा मालूम हुआ तो वह आवाक रह गई। उसने तुरंत राजा को खबर पहुँचाई। सारा किस्सा जानकर राजा और महामंत्री बहुत चिंतित हुए।राजा ने द्वारपालों को बुलाया। उन्होंने सभी द्वारपालों से पूछा-रात को कोई शोर-शराबा या आहट सुनी।

हमारे सभी द्वारपालों ने कहा-"हम कुछ नहीं जानते।" लेकिन एक बूढ़ा द्वारपाल बोला बाराज! आहट तो क्या, हम लोगों की तो चोर से बातें भी हुई, जाते समय अपनी गठरी भी दिखाई है, परन्तु उसके निष्कपट और निर्भीक सत्य व्यवहार कारण हमें यह विश्वास भी न हो सका कि वह चोर है। हमने उसे आपका कोई अलग मित्र समझा और इस तरह हमसे भूल हो गई।" यह सनकर महामंत्री ने कहा-"महाराज! जब वह चोर इतना सच्चा है तो ढिंढोरा पिटवाए जाने पर वह आभूषण लेकर जरूर आयेगा।"महामंत्री की बात राजा को उचित लगी अतः उसने सिपाहियों को आदेश दिया कि वह नगर में ढिंढोरा पीट दे कि जो व्यक्ति पिछली रात हुई रानी के आभूषणों की चोरी के विषय में जानकारी देगा उसे ईनाम दिया जायेगा।

नगर में ढिंढोरा पीट दिया गया। जब यह बात उस चोर को पता चली तो वह तुरंत गठरी लेकर राजा के सामने उपस्थित हुआ। राजा और चोर के बीच कुछ बातें हुई। राजा ने गठरी की जाँच कराई तो उसमें कोई भी आभूषण कम नहीं था। पूरा माल हाजिर था। यह देखकर राजा का बहुत प्रसन्नता हुई। घोषणा के अनुसार राजा ने चोर को नकद पुरस्कार दिया लेकिन चोर ने स्वीकार नहीं किया और कहने लगा-"मैंने जिस महात्मा की बात मानकर झूठ का त्याग किया है, शेष जीवन उसी के चरणों में बिताऊँगा।"द्रव्य-लोभ मेंपड़कर सारा बहुमूल्य जीवन बिताना उचित नहीं। उस महात्मा के प्रभाव से ही आज इतनी बड़ी राशि मेरे चरणों में पड़ी है।महाराज, यह राशि आप ही रखें और दीन-दुखियों की सेवा मेंल गाएं। अब मैं अपना शेष जीवन बाबा बनकर व्यतीत करूंगा।