सबसे लम्बी कहानी-दादी माँ की कहानी

Apr 07,2021 02:36 AM posted by Admin

एक समय की बात है, वीरपुर रियासत के राजा वीरभद्र को कहानियाँ सुननेका जोक था। वह कहानी सुनने के इतने शौकीन थे कि वह कहानी सुनते-सुनते इतने मस्त हो जाते थे कि भोजन करना भी भूल जाते थे। उनके दरबार में बहुत से दानीकार थे जो एक से एक बढ़िया कहानी गढ़कर उन्हें सुनाते थे। एक बार राजा के मन में आया कि कोई बहत लम्बी, थका देने वाली कहानी सुनी जाए। छोटी-छोटी कहानियाँ सुनकर वे बोर हो चुके थे।अत: उसने अपने दरबार के सभी कहानीकारों को हुक्म दिया कि "मार थका देने वाली कहानी गढकर उसे सुनाएं।

सभी कहानीकार लम्बी-लम्बी कहानियाँ लिखने में मशगूल हो गए। यही कोशिश की कि वे लम्बी से लम्बी कहानी लिखकर राजा को सनाएं और के खुश हो जाने पर बहुत-सा ईनाम पाएं। कुछ दिन बीत जाने पर राजा ने सभी कहानीकारों को बुलाया और कहानी सवार का आदेश दिया।कहानीकारों ने एक-एक करके कहानी सुनानी शुरू की। किसी की कहानी एक घंटे में पूरी हो जाती तो किसी की दो घण्टे में। लेकिन कोई भी राजा को थकान सका। राजा कहानी को बड़े चाव से सुनता और अन्त में कहता-"छोटी है।सुनाने वाला निराश होकर एक ओर बैठ जाता। इसी प्रकार सभी कहानीकार हताश होकर बैठ गए।अब राजा ने मंत्री को बुलाकर कहा-"मंत्री जी, अब क्या किया जाए। लंबी और थका देने वाली कहानीसुननेकी हमारी इच्छा कैसे पूरी हो?"मंत्री बोला-"महाराज! क्यों न हम पूरे राज्य में मुनादी करा दें।" "हाँ, यह ठीक रहेगा।" खुश होकर राजा ने कहा।"आप ऐसा ऐलान करा दें कि जो हमें लम्बी और थका देने वाली कहानी सुनाएगा, उसके साथ ही हम अपनी पुत्री का विवाह करेंगे और यदि उसने ऐसा न किया तो उसे एक साल का कारावास भुगतना पड़ेगा।"ठीक है महाराज।" और फिर मंत्री ने पूरे राज्य में मुनादी करा दी।मुनादी सुनकर लोग राजा की समझ पर हैरान भी हुए। कुछ लोग राजा को कहानी सुनाने के लिए आतुर हो उठे। उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो राजा को कहानी तो सुनाना चाहते थे, मगर डरते थे कि यदि राजा सन्तुष्ट न हुआ तो उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी।

कुछ लोग हिम्मत करके कहानी सुनाने गए मगर राजा के सन्तुष्ट न होने पर उन्हें कारावास की हवाखानी पड़ी। इस बात का राजा को भी दुख था कि कई युवक कारावास में जा चुके हैं। । इसी प्रकार कुछ समय बीत गया। लंबी कहानी सुनने की राजा की इच्छा बढ़ती ही चली गई। एक से बढ़कर एक कहानी वक्ता कहानी सुनाने आए और जेल में पहुच गए।एक बार एक ग्रामीण युवक कहानी सुनाने को तैयार हुआ। वह बहुत चतुर चालाक और सूझ-बूझ वाला था।

राजा पहँचकर जब उसने अपनी इच्छा प्रकट की तो तुरंत ही उसे राजा के समक्ष प्रस्तुत किया गया।जाने ऊपर से नीचे तक उस युवक का निरीक्षण किया और पूछा- "तो तुम हमें लम्बी और थका देने वाली कहानी सुनाओगे।""जी महाराज! मेरी कहानी बहुत लम्बी है।" "सूरज।" "तुम्हें मालूम है कि हमारी शर्त क्या है ?" "मालूम है महाराज।" "हमें बड़े-बड़े कहानीकार संतुष्ट नहीं कर सके।" राजा ने कहा। "क्या तुम्हें अपने आप पर विश्वास है ?" "हाँ महाराज! मुझे स्वयं पर पूरा विश्वास है।" "ठीक है, हम आज शाम ही तुम्हारी कहानी सुनेंगे।" मंत्री जी। "जी महाराज।"इस युवक से कागजी कार्यवाही पूरी करा ली जाए और आज साम की सभा में इसकी कहानी सुनने की व्यवस्था की जाए।""जो आज्ञा महाराज।" । युवक को एक बार फिर सभी शर्त बताकर समहति पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए

शाम को ठीक पाँच बजे सभा बैठी। महाराज और सभासदों ने अपने-अपने आसन ग्रहण कर लिए।युवक सूरज भी अपने आसन पर आ बैठा। उसने सर्वप्रथम माँ सरस्वती को स्मरण किया, फिर कहानी सुनानी शुरू की“एक किसान था। उसका एक बहुत बड़ा खेत था। इतना बड़ा....इतना बड़ा...इतना बड़ा...न जाने कितना बडा। उसके खेत का कोई कोई ओर-छोर ही दिखाई नहीं देता था।" "आगे क्या हुआ ?" राजा ने उसे टोकते हुए कहा। हुआ यह कि उसने अपने खेत में गेहूँ की फसल बोयी। वह अपने महनत करता था। इस बात का बडा ख्याल रखता था कि पक्षी कहीं "आगे..... हुआ यह कि खेतों में बड़ी मेहनत करत उसके खेत से दाना न चग लें। "फिर?" "जब फसल पक गई तपक गई तो उसे फसल काटने की चिंता हई। वह खेत का रखवाली|

करना छोड़ अपने बंधु-बांधवों को बुलाने चला गया। अब खेत की रखवाली वाला कोई नहीं था। ऐसा अच्छा मौका देखर ढेर सारे पक्षी उसके खेत में आ गए और दाना चुगने लगे।"जैसे-जैसे पक्षियों का पेट भरता वह उड़ जाते।" "पक्षी कैसे उड़ते थे ?" राजा नेपूछा। "पक्षी.... ? युवक ने हाथ ऊपर उठाकर कहा-फुर्र.... । ऐसे उड़े।" "फिर क्या हुआ ?" "फिर एक पक्षी का पेट भर गया तो वह भी उड़ गया-फुर्र।" "फिर ?"फिर एक पक्षी का पेट भर गया तो वह भी उड़ गया-फुर्र । फिर एक पक्षी का पेट भर गया तो वह भी उड़ गया-फुर्र।"ठीक है, ठीक है, फिर ?" "फिर एक पक्षी का पेट भर गया-वो भी उड़ गया-फुर्र।"काफी देर तक युवक वही सब करता रहा, पक्षी का पेट भरा और वह उड़ गयाफुर्र। पक्षी का पेट भरा और वो उड़ गया-फुर्र।राजा उसकी यह फुर्र-फुर्र सुनकर राजा बोर होने लगा। तो बोला-"ठीक है, ठीक है, ये फुर्र-फुर्र तो बहुत हुई, अब आगे की कहानी सुनाओ।"

महाराज! युवक ने कहा-"अभी पक्षी तो उड़ जाने दीजिए, तभी तो कहानी आगे बढ़ेगी, इसी बीच एक और पक्षी का पेट भर गया तो वो भी उड़ गया-फुर्र।"अब तो उसकी फुर्र-फुर्र सुनकर राजा बोर होने लगा। वह समझ गया कि इस कहानी का कोई अंत नहीं है क्योंकि पक्षियों की संख्या का कुछ पता नहीं है। यह यवक यूँ ही पक्षियो को फुर्र-फुर्र उड़ाता रहेगा और मेरे पूछने पर हर बार यही कहेगा कि पहले पक्षी उड़ जाए तब कहानी आगे बढ़े।"महाराज।" तभी सूरज ने पुनः कहा-"इसी बीच एक पक्षी का पेट और भर गया तो वह भी उड़ गया-फुर्र।"बस-बस, मैं समझ गया कि तुम्हारी कहानी बहुत लंबी व थका देने वाली है, मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ।"यवक यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ कि उसनेराजा को संतुष्ट कर दिया।और फिर-अपनी शर्त के अनुसार राजा वो अपनी पुत्री की शादी सूरज से कर दी। इस प्रकार अपनी सूझ-बूझ से मामूली किसान का पत्र सरज राजपरिवार का सदस्य बन गया और सुखपूर्वक रहने लगा।