रोशनी की कहानी-दादी माँ की कहानी

Apr 07,2021 01:58 AM posted by Admin

पृथ्वी का निर्माण हुए अधिक समय नहीं हुआ था। जलचरों के बाद की नभचरों का भी जन्म हो चुका था, मगर सभीचीजें सुप्ता वस्ता में थी। सूर्य का प्रकाश भी इतना बली नहीं था और चांद तारों का प्रकाश भी क्षीण सा ही था। यह प्रकाश अधिक न पहुंच पाता था। पूरी पृथ्वी पर बड़ीही माद्धिग सूरमई सी रोशनी फैली रहती थी। अतः पृथ्वी पर सीलन और ठंडक ही अधिक थी। हर प्राणी बडी कठिनाई की जीवन गुजार रहा था। पृथ्वी का हर प्राणी रोशनी न होने से दुखी था।

उन्हीं दिनों पृथ्वी पर कौआ भी रहता था। रोशनी न होने के कारण वह न तो ठीक से कीडे-मकौड़े ढूंढकर खा पाता था न कहीं आ-जा पाता था। वह सोचा की चारो ओर खूब रोशनी हो और वह दूर से ही अपना शिकार देख ले। आसमान पर दूर उडे, मगर रोशनी की कभी के कराण वह लाचार था।

एक मुर्गाबी भी धरती पर रहती थी। रिश्ते में वह कौए की दूर की मौसी लगती के पास एकचमत्कारी डिबिया थी जिसमें रोशनी कैद थी। मुर्गाबी बडी हिफाजत रखती थी और सदा अपने पंखों में छिपाए रहती थी। कहीं कोई उसकी जान ले। उसे हर पल, हर घड़ी उस डिबिया की चिंता लगी रहती। कौए ने कोशिश की कि किसी प्रकार वह भी प्रकाश बाजी उस डिबिया को देखे। से आग्रह भी किया मगर मुर्गाबी उस डिब्बी को हवा तक न लगने देती थी। जब इस प्रकार अंधेरे में रहना कौए के लिए दूभर हो गया तो उसने छल से जी से वह बक्सा हथियाने की सोची और एक दिन जैसे-तैसे जा पहुंचा मुर्गाबी के पास तो एक तालाब के किनारे रहती थी।मर्गाभी तालाब की झाड़ियों में दुबकी बैठी थी।कौए को अचानक आया देखकर वह चौंक पड़ी-"कहो बेटा! आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए।"क्या बताऊं मौसी। बहुत दिनों से तुम्हारे दर्शन करने की सोच रहा था। मगर यह सोचकर न आता था कि तुम्हारे आराम में खलन आएगा। कहो मौसी, कैसी हो?"अच्छी हूँ बेटा। सच पूछो तो मैं भी तुम्हें याद कर रही थी।" "लो, मैं आ गया।" "अब पहले तुम भोजन कर लो।" "हां-हां मौसी, सफर की थकावट भी है और भूख भी लगी है।

"तब मुर्गाबी ने बड़े प्यार से उसे भोजन कराया। भोजन करके कौआ बोला-"अरे मौसी! स्वाद-स्वाद में कुछ अधिक ही खा गया। चलो थोड़ा घूम आएं जिससे खाना हज़म हो। फिर आराम से बैठकर बातें करेंगे।" मुर्गाबी सैर को जाने के लिए तैयार हो गई।कौआ उसे लेकर जंगल में ऐसे स्थान पर जा पहुंचा, जहां कंटीले वृक्ष अधिक थे और जमीन पर भी बहुत कांटे बिखरे हुए थे।वहां अंधकार भी बहुत स्थानों से अधिक ही था। दरअसल अपनी सोची हुई तरकीब के मुताबिक ही वह यहां आया था।घूमते-घूमते वह मुर्गाबी से इधर-उधर की बातें करता जा रहा था। अचानक मुगाबों के पांव में एक कांटा चुभगया। वह चिल्लाई-"हाय! मरी।" "क्या हुआ मौसी?" कौए ने पूछा।"अरे बेटा! मेरे पांव में कोई कांटा चुभ गय लगता है बेटा। हाय! मेरी मदद करो बेटा इस कांटे को निकालो।"

कौए ने तो सोचा कि जब वे अंधकार में रास्ता भटक जाएंगे तो वह मौसी से प्रकाश दिखाने को कहेगा, मगर यहां तो नई बात हो गई। अब कौए के दिमाग में एक नई तरकीब आ गई। उसने सोच लिया कि क्या करना है । बोला-"अरे मौसी! कांटे से तो बहुत तकलीफ हो रही होगी। सन तो जान लेवा होते हैं, मगर तुम चिंता न करो। मैं अभी इस कार कौआ मुर्गाबी का पांव उठाकर कांटा देखने लगा, लेकिन वहां का कि कांटा ठीक से दिखाई ही नहीं दे रहा था। थोड़ा-बहुत दिखाई भी चाहता तो उसे अपनी चोंच से खींच भी सकता था, मगर उसने कहा बहुत अंधेरा है। कहीं रोशनी में चलो तो कांटा निकालँ।"अरे बेटा! मुझसे तो एक कदम भी न चला जाएगा।"फिर तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी मौसी कहीं कांटे का जहर शरीर में जाए।" उसे डराते हुए कौए ने कहा।दी होगी। सुना है, कुछ कांटे दस कांटे को निकालता हूँ।" लेकिन वहां इतना अंधकार था दिखाई भी दे रहा था, कौआ पर उसने कहा-"मौसी! यहाँ और सचमुच यह सुनकर मुर्गाबी डर गई। उसने सोचा जान है तो जहान है। अत. बोली-"बेटा! मैं अपनी रोशनी वाली डिब्बी निकालती हैं।"मुर्गाबी ने डिब्बी निकालकर थोड़ी-सी खोली। हल्का-सा प्रकाश वहाँ फैल गया।

कौआ कांटा निकालने का नाटक करने लगा। मौका देखकर उसने कांटे को उसके पैर में थोड़ा और अंदर की ओर धकेल दिया।"हाय! मरी।" मुर्गाबी चीखी। "मौसी! रोशनी कम है, डिब्बी थोड़ी और खोलो।"दर्द से छटपटाती मुर्गाबी ने डिब्बी का पूरा ढक्कन खोल दिया तो वहां चारों और प्रकाश फैल गया। अब कौए ने आसानी से मुर्गाबी के पांव में फंसा कांटा निकाल दिया। कांटा निकलते ही मुर्गाबी ने राहत की सांस ली और लगी प्रकाश को समटकर डिब्बी में बंद करने। मगर अब प्रकाश उसके हाथ कहां आने वाला था ? वह ता दुनिया में फैल गया। आ और बोला-"अब इस रोसनी को समेटना दुनिया को इसका आनन्द लेने यह देखकर कौआ बहत खश हआ और बोला-"अब इस रासना । मश्किल है मौसी। अब इसका मोह छोड दो और दनिया को इसका ना दो।"मुर्गाबी बेहद दुखी हुई, मगर उसी दिन से दनिया में रोशनी फैल गई।