पिता-पुत्र-दादी माँ की कहानी

Apr 09,2021 03:33 AM posted by Admin

एक नगर में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसका एक पुत्र भी था। पुत्र बड़ा होनहार था। ब्राह्मण बड़ी कड़ाई के साथ उसे अच्छे मार्ग पर चलाता था।पुत्र धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। ज्यों-ज्यों वह बड़ा होने लगा, उसके गुण भी निखरने लगे। चाहे पुत्र में कोई दोष नहीं था, फिर भी ब्राह्मण उसके साथ बड़ी कड़ाई किया करता था। डांट-डपट किया करता था।

पुत्र धीरे-धीरे और बड़ा हुआ, पढ़ने-लिखने लगा। पढ़-लिखकर बहुत बड़ा विद्वान भी बना। उसकी विद्वाता की सुगन्ध चारों ओर फैल गई। उसे आदर-सम्मान देने लगे, पर ब्राह्मण फिर भी उसे डांट-फटकार सनाया करता था। पुत्र को पिता की डांट-फटकार अच्छी तो नहीं लगती थी, पर फिर मौन ही रहता था।कुछ दिनों पश्चात् पुत्र का विवाह हुआ। उसकी पत्नी का आगमन हा किन्तु फिर भी पिता का डांटना-फटकारना बन्द नहीं हुआ।एक दिन की बात है, पिता ने अपनी बहू के सामने पुत्र को बहुत खरी-खोटी सुनाई। पुत्र ने उत्तर तो कुछ नहीं दिया, किन्तु उसने अपमान का अनुभव किया। उसने सोचा, उसके यश और उसकी विद्वता से पिता की ईर्ष्या होती है, इसीलिए वे बार-बार उसका अपमान करते हैं।पुत्र ने चिढ़ कर पिता को मार डालने का निश्चय किया। शुक्ल पक्ष की रात थी। चारों ओर चांदनी छिटकी हुई थी। पुत्र हाथ में तलवार लेकर पिता को मार डालने के लिए उसके कमरे के पास गया। कमरे के भीतर ब्राह्मण और ब्राह्मणी दोनों आपस में बातें कर रहे थे। पुत्र द्वार पर खड़ा होकर दोनों की बातचीत सुनने लगा। ब्राह्मणी ने कहा, "बड़ी सुन्दर चांदनी है। दूध की धारा की तरह धरती पर फैली हुई है।"ब्राह्मण ने उत्तर दिया, "इसी प्रकार तुम्हारे पुत्र का यश भी तो उज्जवल है।" ब्राह्मणी फिर बोली, "पर तुम तो उसे डांटते-फटकारते रहते हो?"ब्राह्मण ने उत्तर दिया, "यदि मैं डांट-फटकार न करूँ तो उसके मन में अभिमान उत्पन्न हो जाएगा।

अभिमान से मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।"पुत्र ने द्वार पर खड़े होकर पिता की बात सुनी। वह बड़ा लज्जित और दुःखित हुआ। वह मन में सोचने लगा कि एक तो मेरे पिता हैं, जो मेरे यश की प्रशंसा कर रहे हैं और एक मैं हूं, जो उन्हें मार डालना चाहता हूँ। ओह, मैं कितना बड़ा अधर्मी हूँ।पुत्र तलवार फैंककर शिव जी के मन्दिर में गया। शिव जी की पिडा गिरकर रो-रो कर कहने लगा, "हे भगवान! मेरे पाप को क्षमा कीजिया सद्बुद्धि दीजिये। मैं शीघ्रता में कोई काम न करूँ, क्योंकि जो काम शा किया जाता है, वह मूर्खता से भरा होता है।"पुत्र ने मन-ही-मन निश्चय किया कि अब वह जो भी काम भी काम करेगा, खूब सोच-समझ कर ही करेगा।