समय की कद्र करो-दादी माँ की कहानी

Apr 08,2021 03:44 AM posted by Admin

एक समय की बात है। एक शिव भक्त ने भगवान शिव की घोर तपस्या की तपस्या से प्रसन्न हूँ। कोई वरदान मांग।" जिससे वे प्रसन्न हो गए और प्रकट होकर मुस्कराते हुए भक्त से बोले-"मैं तेरी भक्त ने भगवान को दण्डवत प्रणाम किया और बोला- "हे प्रभु! आपके दर्शन हए, मैं इसी से कृतार्थ हो गया। अब आप जो उचित समझें, दें दे।" भक्त की ऐसी प्रार्थना सुनकर भगवान और अधिक प्रसन्न होकर बोले-"वत्स! तम्हारे विचार जानकर मैं अति प्रसन्न हुआ। मैं तुम्हें यह पारस-पत्थर देता हूँ। इसे लोहे से स्पर्श कर जितना चाहे सोना बना लेना। मैं एक वर्ष बाद आकर अपना यह पारस वापस ले जाऊँगा। ऐसा कहकर भगवान अतधान हो गए।"भक्त भी शिवालय से अपने घर आ गया। छ: माह बीत गए मगर भक्त ने उस पारस का कोई उपयोग न किया। जब भी उसके मन में पारस से सोना बनाने की बात आती तो वह यही सोचता कि जल्दी क्या है, अभी तो बहुत समय बाकी है। अभी क्यों चिंता करूँ ? जब चाहूंका बना लूंगा।

इसी प्रकार तीन महीने और गुजर गए। वह यही सोचता रहा कि अभी तो बहुत समय है, बना लूंगा। फिर वह एक माह और गुजर गया। इसी प्रकार समय बीत गया और साल का अंतिम दिन आ गया, मगर उसे समय का ख्याल ही न था। वह यही सोचता रहा कि अभी तो बहुत समय है। दरअसल ऐसा सोचते-सोचते उसकी आदत बन गई थी। जब आखिरी दिन के कुछ पल शेष रह गए तो उसने अपनी कुल्हाड़ी और घर में बड़े दूसरे औजारों को एकत्र कर सोना बनाने का प्रयास किया। मगर तभी साल का अंतिम पल गुजर गया और भगवान शंकर प्रकट होकर बोले-"लाओ वत्स! मेरा पारस वापस दो। आशा है तुमने बहुत-सा सोना बना लिया होगा।"भगवान् ! सिर्फ कुछ पल की मोहलत दें।" "नहीं वत्स! तुम्हारा समय समाप्त हुआ।" कहकर भगवान शंकर ने पारस लिया और अफ्रधान हो गए। भक्त ठगा-सा कड़ा रह गया। किसी ने सच ही कहा है-जो समय की कद्र नहीं करते, बाद में समय भी उनकी कद्र नहीं करता। इसीलिए कहा गया है-'सदपयोग हम करें समय का, उसको यही कहानी है। उसी नहीं पर वाह किसी की, वह तो बहता पानी है।' इसलिए बच्चों। समय की कद्र करो, समय बहुत कीमती है।