Pari Ki Kahani : परी का वरदान - दादी माँ की कहानी

Nov 17,2021 06:21 AM posted by Admin

मोहन एक बहुत ही अच्छा लड़का था। वह बहुत समझदार था। वहरोज अपने के माता-पिता चरण छूता, ईश्वर का वन्दना करता और अपने गुरुजनों का सम्मान करता था हर काम को समय पर करता था। सभी उसको बहुत प्यार करते थे।मोहन के पिता दिन भर फेरी लगाकर फल बेचा करते थे । मोहन की एकचोटी से बहन थी । मोहन की माँ उसकी पढ़ाई में सहायता करती थी।

पिता जो कमाकर लाते थे उससे घर खर्च और उसके स्कूल के खर्चे निकल आते ते। फल बेचने जाने से मोहन नियम से सुबह सारे फल ठेली में लगाता था। एक दिन ऐसी दुर्घटना घटी कि उसके पिता बरसात में भीग जाने के कारण बीमार पड गए और कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु से मोहन के परिवार को मानसिक कष्ट हुआ,वहीं आर्थिक परेशानियों ने भी आ घेरा। एक-एक पैसे के लिए उन्हें परेशान होना पड़ता था। मां का स्वास्थ्य पहले ही खराब था।

वह ठेली नहीं लगा सकती थी। मोहन अभी छोटा था इसलिए वह यह काम नहीं कर सकता था पर मोहन बहुत होशियार था। वह हर समय यही सोचता रहता था कि परिवार का सहारा कैसे बने। इसी चिन्ता के कारण वह दिन-पर-दिन कमजोर होने लगा।मोहन की माँ उसे रामायण, महाभारत के साथ दैनिक चमत्कारों की कहानियाँ सुनाया करती थी। एक दिन उसके मन में विचार आया क्यों न अपनी समस्या को लेकर भगवान से प्रार्थना की जाए।

उसकी पाठशाला के रास्ते में एक मंदिर पड़ता था। मोहन रोज पाठशाला जाते समय उस मन्दिर के दरवाजे पर खड़ा होकर भगवान से हाथ जोड़कर प्रार्थना करता भगवान आप सबके दुःखों को दूर करते हो, मैं छोटा-सा बालक हूं, पूजा करना हूँ, मैं तुमसे विनती करता हूँ कि तुम मेरे दुखो को दूर करो।" मोहन को भगवान की प्रार्थना करते हुए कई दिन हो गए लेकिन उसके दुख दूर नही हुए। प्रार्थना करते हुए कई महीने गुजर गए पर मोहन को भगवान ने दर्शन नहीं हुए. लेकिन ईश्वर पर अटूट विश्वास था। जिसकी वजह से माँ ने उसकी पुकार एक दिन सुन ली उसकी भक्ति से प्रसन्न हो गई।

एक रात मोहन अपने बिस्तर पर गहरी नींद में सो रहा था। तभी उसे लगा, आखं से एक तीव्र रोशनी उतर रही है। एक ही पल में उसका सारा कमरा उज्जवल प्रकाश से भर गया। कुछ ही समय में उस प्रकाश से एक नन्हीं-सी परी निकली। उस परी का रूप वैसा ही था जैसा वह अक्सर किताबों में पढ़ा करता था। उसके हाथ में एक जादुई छड़ी थी।मोहन ने उस परी को गौर से देखा और बदबूदाया-"यह सपना है या सच्चाई। "यह सच है मोहन।" परी मुस्कुराकर बोली। मोहन ने बड़ी व्याकुलता और प्रसन्नता से पूछा-"क्या तुम परी हो ?" "हाँ।" परी ने मुस्कुराते हुए कहा। "तुम यहाँ पर । मोहन अपनी बात पूरी भी न कर सका।" परी खिलखिलाकर बोली-"मोहन, मुझे देवी माँ ने तुम्हारे पास भेजा है।" "क्या ? देवी माँ ने।" अब की बार मोहन खुशी से चीख उठा।

"हाँ, मोहन बोलो तुम्हें क्या चाहिए ?" मोहन बोला-"परी, अगर तुम्हें सचमुच देवी माँ ने भेजा है तो मेरी माँ को स्वस्थ परी मुस्कुराकर बोली-"ठीक है मोहन, अब सुबह जब तुम्हारी माँ सोकर उठेगी तो वह बिल्कुल स्वस्त और प्रसन्नचित्त होगी। पर मोहन मैं तो मैं तुम्हें वरदान देने आई थी, तुमने अपने लिए तो कुछ मांगा ही नहीं." मोहन सहज भाव से बोला-"परी, अगर मेरी माँ ठीक होगी तो वह मेरी देखभाल स्वयं कर लेगी। माँ-बाप की सेवा करनी चाहिए। बच्चों पर सबसे पहला अधिकार माँ का होता है।

इसलिए मैंने माँ के स्वस्थ होने का वरदान तुमसे माँगा है।" परी बोली-“मोहन, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मुझसे एक वरदान और मांग लो।"मोहन बोला- "मुजे सद्बुद्धि दो ताकि मैं बड़ा होकर नेक, ईमानदारी और सच्चाई के रास्ते पर चल सकूँ।"परी बहुत प्रसन्न हुई और बोली-"ऐसा ही होगा, मोहन यह अंगूठी तुम अपने पास रख लो, इस अंगूठी को पहनकर तुम जो इच्छा करोगे, वह पूरी हो जायेगी। पर ध्यान रहे जिस दिन तुमने इसका गलत कामों के लिए प्रयोग किया तो इसकी शक्ति उसी दिन खत्म हो जाएगी।" इतना कहने के बाद पहले परी विलीन हुई फिर प्रकाश में मोहन ने देखा उसके हाथों में अंगुठी थी।वह इस बात को अपनी माँ को बताना चाहता था किन्तु परी ने उसे मना किया था कि वह किसी को भी न बताए। इसलिए वह चुप रहा। सुबह माँ पूर्ण स्वस्थ थी। उस दिन से उसका परिवार सुखी हो गया।