पचास रुपये की अक्ल-दादी माँ की कहानी

Apr 06,2021 09:55 AM posted by Admin

कमालपुर गांव में शंकर नामक एक गडरिया रहता था। एक बार उसकी इच्छा विदेश घूमने की हुई। उसने अपनी पांच भेड़ें बनी सौ रुपये लेकर परदेश चला दिया। चलते-चलते कई दिन और कई रातें बीत कहीं जाकर वह एक शहर में पहुंचा। वहां उसकी भेंट एक सयाने से हुई। उसने कहा उस शहर का नाम पूछा-"क्यों जी इस शहर का क्या नाम है ? सयाने ने कहा-"अक्लपुर।" "तो भइया, लगे हाथ ये भी बता दो कि यहां की क्या चीज मश सयाने ने कहा-'भइया! यहां की अक्ल मशहूर है, चाहो तो क्या चीज मशहर है?" हूर है, चाहो तो खरीद लो।

"अच्छा, मगर ये तो बताओ कि क्या भाव है ?" "एक अक्ल के पचास रुपये।" सालेदो भइया हमें भी एक अक्ल।" गडरियए ने अपनी गांठ से पचास रुपये नकालकर उसे दे दिए। याने ने पचास रुपये लेकर एक अक्ल दी-'बिन दूजे न चलिए बाट।' दरिए ने खुश होकर उसे धन्यवाद दिया और चल दिया। चलते-चलते वह एक निर्जन जगह पर पहुंच गया। वहां एक तालाब था। गडरिये ने सोचा कि यहीं बैठकर पानी खाया जाए। तालाब किनारे पेड़ की छांव में बैठकर उसने रोटी खाई और तालाब का ठंडा पानी पिया। ताजे दम होकर वह फिर चल दिया। कुछ दूर जाने पर उसे एक कछुआ दिखाई दिया। शंकर को खरीदी गई अक्ल की बात याद आई तो उसने कछुए को उठा लिया और.बोला-"कछुए भाई! मैं सफर कर रहा हूँ।" क्या तुम मेरे सफर के साथी बनोगे। "अरे भाई! न तेरी-मेरी कोई जान पहचान है, न दोस्ती, फिर साथ कैसा ?" "देखो भाई, अच्छे लोगों की जान-पहचान होते देर नहीं लगती। मैं तुम्हें अपने बारे में बताता हूँ। मैं शंकर गडरिया हूँ। परदेश घूमने निकला हूँ। पिछले शहर में पचास रूपये की अकल खरीदी, उसने कहा-'बिन दूजे न चलिए बाट', इसलिए मैं तुम्हें अपना साथी बनाता चाहता हूँ। "भईया ! सफर पर तो मैं भी निकला हुआ हूँ, पर तुम्हारा मेरा क्या साथ। मैं जा रहा हूँ, गंगाघाट, अपने रिश्तेदारों से मिलने।"ये तो और भी अच्छी बात है, मैं भी गंगाघाट पर स्नान कर लूँगा। मुझे तो घूमना-फिरना है । जमना घाट नहीं गंगा घाट सही, अब बोलो क्या कहते हो।" गडरिये ने कहा। "सारी बात ठीक है भइया, मगर मैं तुम विश्वास कैस कर लूँ।" दखो भाई ! मैं कह सकता हूँ कि हम दोनों साथ-साथ रहेंगे और किसी स्थान पर तुम्हारे लिए जान की बाजी भी लगानी पड़ी तो पीछे नहीं हटूंगा।" "अगर ऐसी बात है चलो, हम जल को साक्षी मानकर एक-दूसरे की मित्रता इसके बात जो भी मित्रघात करेगा. जल देवता उसे दण्ड देगे।" का कछुए की बात पसंद आई। तब दोनों ने अपने-अपने हाथ में जल भात मित्रता निभाने की कसम खाई। शंकर ने उसे अपने झोले में स्वीकार कर लें। इसकेबात जा शंकर को कछुए की लेकर एक-दूसरे के प्रति रख दिया और चल दिया।

चलते-चलते दिन बीत गया, तब उन्होंने एक गांव में आराम किया दिन फिर चल दिए। चलते-चलते दोनों एक कुएं के पास एक घने वक्षनरी बैट गया और झौले में से अपने मित्र कछुए को बाहर निकाल कर कछुए! थोड़ा खा-पीकर कुछ आराम कर लें, फिर आगे चलते हैं। "ठीक है भाई! भूख तो मुझे भी लगी है।" इस प्रकार दोनों मित्रों ने खाना खाया. उसके बाद शंकर बोला-"मिल कैसी ठंडी हवा चल रही है। क्यों न कुछ देर आराम कर लूँ।"ठीक है मित्र, लेट जाओ।"चलते चलते दोनों एक कुए के पास घने वक्ष के नीचे शंकर लेट गया और कछुआ वृक्ष के पास बैठ गया। उसने भी अपनी मंडी कवच में समेट ली। उसी वृक्ष पर एक धूर्त कौआ रहता ता। कौए का एक मित्र था-सांप। सांप कुएं में रहता था। जब भी कोई यात्री उस वृक्ष के नीचे आकर आराम करता कौआ कांव-काव करके अपने मित्र सर्प को सूचना देता। सांप कुएं से निकलता और उस यात्री को डस कर कुएं में चला जाता। बाद में धूर्त कौआ उस यात्री का मांस खाता था।

आज भी ऐसा ही हुआ। शंकर को नींद आ चुकी थी। यह देखकर धूर्त कौआ जोरों से कांव-कांव करने लगा। तभी कुएं में से सांप निकला और उसने शंकर को डस लिया। बाद में कौआ आकर शंकर के शरीर पर चोंच से प्रहार करने लगा। उधर-वृक्ष की ओट में बैठा कछुआ सब कुछ देख रहा था। अपने मित्र की दशा देखकर वह सब कुछ समझ गया। इस बात का उसे बेहद दुख हुआ कि समय रहत वह अपने मित्र की जान न बचा सका। मगर मन ही मन उसने सोच लिया इस नरभक्षा कौए को मजा चखाकर रहूँगा। अतः मौका देखकर उसने कौए की पूंछ पर प्रहार किया। कौआ घबराकर ज्योंहि पलटा, कछुए ने अपने मंह से उसकी गर्दन पकड़ ला और बोला-"धूर्त ! शैतान ! मैं तेरी सारी चाल समझ गया. अब तेरी खैर नहा अब तो कौआ जोर-जोर के कराहने लगा। उसकी आवाज सुनकर सांप समझ गया कि मेरा मित्र संकट में है। वह कुए । बाहर आ गया। तभी कछुआ बोला-'ऐ क्रूर सर्प । देख तेरे मित्र कौए की जान कब्जे में है। तूने मेरे मित्र को डसा है, अब मैं तेरे मित्र की जान लूंगा।' "नहीं-नहीं, ऐसा न करना। हम वर्षों से एक-दसरे के साथ रहते आए ह। "जैसे तुझे अपना मित्र प्यारा है, वैसे मुझे भी अपना मित्र प्यारा है। अगर व प्यारा है। अगर अपने

मित्र का जीवन चाहता है तो तू भी मेरे मित्र को जीवित कर. इस जहर को वापस चूस।"वापस सांप मजबर हो गया। उसने फौरन शंकर के पांव से अपना सारा जहर चस लिया। ऐसा करते ही सांप मर गया। कछए कौए की गर्दन कुतर ली, इस प्रकार तड़पकर कौआ भी मर गया। कल देर बाद शंकर की आँख खुली तो अपने पास ही एक सांप और कौए की नाग देखकर चौंक पड़ा और पूछा-'मित्र! यह सब क्या है ?"मित्र! जिसने तुम्हें डसा, यह तो उस सांप की लाश है और यह उसके धूर्त मित्र और की।" ऐसा कहकर कछुए ने उसे पूरी बात बता दी। यह जानकर शंकर बेहद प्रसन्न हुआ कि उसके द्वारा खरीदी गई पचास रूपये की अकल के कारण ही आज उसके प्राण बने। इसके बाद उसने कछुए को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया, फिर उसे अपने झौले में डालकर गंगाघाट की ओर चल दिया कई दिन के सफर के बाद वह गंगा घाट पहंचा और वहां जाकर कछुए से बोला-"लो मित्र, तुम्हारी मंजिल आ गई। तुम प्रेम से गंगाघाट पर निवास करो, मैं अपने घर को चलता हूँ।"धन्यवाद मित्र! तुम्हारे सहयोग से मैं यहाँ पहुँचा हूँ। अक्ल के सौदागर ने ठीक ही कहा था-एक से भले दो।" फिर गडरिया अपने गांव आ गया। अब वह लोगों को आप बीती सुना-सुनाकर यही संदेश देता था-'बिन दूजे न चलिए बाट।'