मुर्गी और कुत्ता-दादी माँ की कहानी

Apr 07,2021 08:13 AM posted by Admin

कुत्ते और मुर्गी में बड़ी दोस्ती थी। एक दिन दोनों घूमते-फिरते जंगल में जा पर और घंटों गप्पे लड़ाते रहे। धीरे-धीरे शाम हो गई तथा रात हो गई। मुर्गे ने घबराकर कहा-"अब क्या किया जाए ? बातों ही बातों में सूरज डूब गया और यह चाँद दिखने लगा। अब रात में घर पहंचना तो मुश्किल है।"कुत्ता लापरवाही से बोला-"घबराने की क्या जरूरत है ? तुम पुर्र से उस डाल पर जा बैठो और मजे से रात बिताओ। मैं भी इसी पेड़ के नीचे सो जाता हूँ। जब सवेरा होगा तब घूमते-फिरते घर पहुँच जाएंगे।"बस मुर्गा फुर्र से पेड़ की डाल पर जा बैठा और कुत्ता पेड़ के तने से टिक कर धरती पर लेट गया। सवेरा होते ही मुर्गा जागा और अपनी आदत के अनुसार जोर-जोर से बोलने लगा-"कुक्ड़-कू, कुक्ड़-फूं। मुर्गे की यह कुक्ड़-कू की आवाज सारे जंगल में गूंज उठी और एक सियार लपझप करता हुआ उस पेड़ केपास आ पहुँचा। मुर्गे को देखते ही वह प्रसन्न हुआ और मन ही मन सोचना लगा-"कितना आज है सवेरा आज का।

" जरा सी हिम्मत लड़ाई कि मुर्गा कलेजा बनकर मेरे मुँह में आया नहीं। मन में यह विचार आते ही सियार ने मुस्कुराकर मुर्गे से कहा-"अहा, मुर्गे भाई, कितना मीठा है, तुम्हारा गाना। मुझे भी गाने का कुछ-कुछ शौक है। बस, नीचे उतर आओ थोड़ी देर के लिए और मेरे साथ गाओ। क्या तुम मेरी यह छोटी सी इच्छा पूरी नहीं कर सकते ?"मुर्गा भी समझदार था। वह सियार के मन की बात तुरंत भांप गया फिरभी मुस्कुराकर बोला-"तुम्हारी बात मुझे बहुत पसन्द आई, सियार भैया। मैं नीचे आता हूँ और सुर में सुर मिलाकर गाता हूँ। मेरा एक मित्र उस तरफ पेड़ के तने से सटकर सो रहा है। उसे भी जगा लो न। वह बाजा बजाएगा और हम दोनों मिलकर गायेंगे। सच कहता हूँ तब बहुत मजा आएगा।" यह सुनते ही सियार मारे खुशी के नाच उठा। वह लपककर पेड़ के उस ओर जा पहुँचा, जिस ओर कुत्ता सो रहा था। कुत्ते पर नजर पड़ते ही उसके राण सूख गए। वह तेजी से भागने लगा। मुर्गे की बातें सुनकर कुत्ता सावधान हो ही चुका था। भला वह सियार को कब छोड़ने वाला था ? उसने एक सपाटे में उसका गला धर दबाया। यह देखकर मुर्गा हंसा और बोला-मूर्ख कहीं का। आया था मेरी घात में, इतना भी नह जानता था कि जो दूसरों को छलता है, वह स्वयं छला जाता है।