केवल इत्र की एक बूंद के लिए-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 09,2021 05:29 AM posted by Admin

शायद शहशाह अकबर का सबसे प्रिय शौक था हिन्दस्तान के अलग-अलग भागों से ही नहीं अपित अन्य देशों से भी मंगाई गई हर किस्म की इत्र की बोतलें इकट्ठी करना। सभी लोगों को मालूम था कि शहंशाह को बेहतरीन किस्म के इत्रों का शौक था। इसलिए उन्हें मि वाले उपहारों में सबसे अधिक संख्या ऐसी बोतलों की ही होती थी।एक बार, शहंशाह अकबर ने अपने जन्मदिन पर एक शानदार दावत का प्रबंध किया। दावत में बहुत-से अतिथियों को बुलाया गया और उनके बैठने का प्रबंध एक विशाल कक्ष में किया गया। पुरे कक्ष में रंग-बिरंगे गद्दे बिछाए गए थे, ताकि सभी अतिथि उन पर आराम से विराजमान हो सकें। स्वयं शहंशाह एक बड़े गद्दे पर बीरबल के साथ बैठे थे। जैसे ही प्रत्येक अतिथि को सेवक कक्ष के भीतर लाते, वे सबसे पहले शहंशाह के पास जाते और उनको उपहार देकर उन्हें अपनी शुभकामनाएं देते।

तत्पश्चात् वे अपना आसन ग्रहण करते तथा अन्य मेहमानों की प्रतीक्षा करने लगते। उनके स्वागत के लिए कई सेवक बड़े-बड़े थाल लिए पूरे कक्ष में घूम रहे थे, जिनमें उन्होंने मेहमानों के पीने के लिए नींबू-पानी तथा शर्बत के साथ-साथ कई प्रकार की मिठाइयां एवं व्यंजन भी रखे हुए थे।एक सेवक को एक थाल में इत्र की बोतलें तथा बड़ी मात्रा में रूई सज़ा कर लोगों के बीच घूमने का काम सौंपा गया था। वह सभी मेहमानों
को इत्र में डुबो कर थोड़ी-थोड़ी रूई थमाए जा रहा था। कुछ समय के बाद. इत्र प्राप्त करने के लिए बीरबल ने भी उस सेवक को अपने पास बुलाया। रूई पर इत्र छिड़कते हुए इत्र की एक बूंद अकबर के पास गद्दे पर गिर गई। । यह देखकर अकबर ने चिंतित होकर सोचा कि कहीं वह बूंद गद्दे में समाकर व्यर्थ न हो जाए। इसलिए उन्होंने उस बूंद को उठाने की कोशिश में फौरन अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। किंतु जब तक वह इत्र को अपनी उंगली पर उठाते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और इत्र गद्दे में समाचुका था।वापस में बैठा बीरबल सब कुछ देख रहा था। अकबर अपना हाथ गद्दे से हटा रहे थे, तो उनकी नज़र बीरबल पर पड़ी। वह उनको गौर से देख

रहा था। जैसे ही अकबर को मालूम हुआ कि बीरबल ने उन्हें देख लिया था, वह अपना सिर घुमा कर यूं नाटक करने लगा मानो कुछ हुआ ही न हो, लेकिन तब तक अकबर उसे देख चुके थे।
इसलिए अकबर के मन में फौरन विचार आया, "बीरबल ने मुझे इत्र की बूंद गद्दे से उठाने की कोशिश करते हुए देख लिया है। वह मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा? वह अवश्य मुझ पर हंस रहा होगा कि इतना बड़ा शहंशाह होने के बावजूद मैं कितना कंजूस हूं। या अल्लाह ! यह मैंने क्या कर दिया है? मैंने केवल एक बूंद इत्र के लिए अपनी इज्जत दाव पर लगा दी।

मान लो, अगर किसी और ने भी मुझे इत्र की बूंद को गद्दे से उठाते हुए देख लिया हो तो? नहीं, नहीं, मुझे अपनी खोई हुई इज्जत वापस प्राप्त करने के लिए कुछ-न-कुछ तो करना ही होगा। साथ ही साथ, यह भी सिद्ध करना होगा कि अगर मेरे सबसे कीमती इत्र की सभी बोतलें भी व्यर्थ हो जाएं तो मुझे कोई परवाह नहीं।" - इस एक घटना के कारण, अकबर के जन्मदिन की खुशी पूरी तरह से बेकार हो गई। वह पूरा दिन व्याकुल रहे तथा रात को भी बिल्कुल सो नहीं पाए। सारी रात काफी सोच-विचार के पश्चात् उन्हें एक युक्ति सूझी, जिससे लगा कि वह बीरबल के साथ-साथ अन्य लोगों को भी यकीन दिला सकेंगे कि वह कंजूस नहीं थे।
अगले दिन, अकबर सुबह-सवेरे ही अपने बिस्तर से उठ गए और उन्होंने अपने सेवकों को शाही बगीचों में बना तालाब खाली करने का आदेश दिया। यह काम हो जाने के बाद, उन्होंने अपने पास पड़ी इत्र की सभी बोतलें तालाब में खाली करवा दी। जब तालाब इत्र से लबालब भर गया तो उन्होंने अपनी राजधानी में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो भी व्यक्ति अति मूल्यवान इत्र पाना चाहता हो, वह उसकी मनचाही मात्रा शाही तालाब से प्राप्त कर सकता है।कछ ही समय में शाही बाग से इत्र लेने के लिए लोगों की बडी भारी भीड़ जमा हो गई। लोगों को शाही तालाब से इत्र की बोतलें भरते देखकर अकबर ने गर्व से सोचा, "अब बीरबल समझ जाएगा कि जहां तक इत्र का प्रश्न है, मैं कतई कंजूस नहीं हूं।"कुछ समय के बाद बीरबल भी वहां आ गया। उसे देखकर अकबर ने कहा, "देखो, बीरबल, लोग मेरे अमूल्य इत्रों से भरे तालाब में से कैसे


बोतलों पर बोतलें भर कर ले जा रहे हैं। तुम तो जानते ही हो कि मैं इत्रों का कितना शौकीन हूं। फिर भी, मैं इतना इत्र लुटा रहा हूं। क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं बहुत खुले दिल का व्यक्ति हूं?"
जवाब में बीरबल मुस्कराने लगा और बोला, "जहांपनाह, इज्ज़त दूध के समान होती है। एक बार इसको खो दिया तो फिर यह वापस नहीं प्राप्त की जा सकती। जो इज्जत एक बंद इत्र के कारण गई, वह एक तालाब इत्र लुटा कर भी वापस नहीं मिल सकती।"किंतु यह कहते ही बीरबल को अकबर के चेहरे पर गहरे दुःख के भाव दिखाई दिए, तो उसे महसूस हुआ कि शहंशाह के दिल को उसका बात से कितनी गहरी चोट पहुंची थी। इसलिए वह उनके खले दिल की प्रशंसा करने लगा। बीरबल के शब्द सुनकर अकबर का चेहरा खिल उठा और मुस्कराते हुए उन्होंने उसे प्यार से गले लगा लिया।