जितने मुँह उतनी बात-दादी माँ की कहानी

Apr 08,2021 05:10 AM posted by Admin

किसान क पास एक टटू था। वह एक दिन अपने बेटे को साथ लेकर टटट बेचने के लिए मेले की ओर चल दिया। किसान ओर उसका बेटा दोनों पैदल चल रहे थे और उन दोनों के साथ खाली टटट खटखट कररास्ता नाप रहा था। कुछ दूर जाने पर उन्हें तीन चार लड़के मिले, जो मेले से लौटकर आ रहे थे। किसान और उसके घट का पदल चलते देखकर. उन लडकों में से एक लडका बोला-"ओह. कितने बुद्धू हैं ये दोनों।टटू के होते हुए भी पैदल चल रहे हैं। ये चाहे तो मजे से टट्ट परचड़कर मेले में जा सकते हैं। तुमने और भी कहीं देखें हैं ऐसे बुद्ध।"लड़की की बातें सुनकर किसान ने अपने बेटे को टटू पर बिठा दिया और वह खुद टटू को हांकता हुआ उसके पीछे-पीछे चलने लगा। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें दोतीन बूढ़े आदमी मिले। उनमेंसे एक बूढ़ा गुस्से किसान के बेटे से बोला-"अरे मूर्ख, नीचे उतर। तू जवान है, तगड़ा है, फिर भी मजे से टटू पर लदा है और बेचारा बूढ़ा बाप पैदल चल रहा है। तुझे शर्म नहीं मालूम होती। चल, उतर नीचे टटू पर बाप को सवार होने दे।"यह सुनते ही किसान का बेटा टटू से नीचे उतर गया और अपने पिता से बोलाबूढ़े बाबा ठीक कहते हैं। टटू पर आप ही सवार हो जाइए।बस किसान टटू पर बैठ गया और बेटा उसके पीछे-पीछे पैदल चलने लगा। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्हें कुछ स्त्रियां मिली जो अपने बच्चों को मेला दिखाकर लौट रही थी। उनमें से एक स्त्री अपनी साथिन से बोली-“देख तो बहन, यह बूढ़ा कितना निर्दयी है। इसमें जैसे शर्म का नाम ही नहीं है। यह खुद तो मज से टटू पर सवार है और बेटे को ऐसी धूप में पैदल घसीट रहा है। हाय-हाय! टटू के पीछे दौड़ते-दौड़ते बेचारे लड़के का मुँह किस तरह सूख गया है ?"अब किसान क्याकरता ? उसने बेटे से कहा-"आ त भी मेरे पीछे सवार हो जा।"बेटा फौरन बाप के पीछे सवार हो गया। इस प्रकार दोनों बाप-बेटा टटू पर चढ़कर आगे बढ़े ही थे कि सामनेसे एक बाबा आ निकले। बाबा ने पहले उनको आँखें फाड़-फाड़कर घूरता रहा। फिर मुँह बनाकर बोला-अरे भाई यह किसका टट्ट पकड़ लाए ?

किसान ने उत्तर दिया-"टटू तो बाबा जी, हमारा है। क्यों क्या बात है ?"बाबा जी बिगड़कर बोले-"यह टटू तुम्हारा है ? शर्म नहीं आती तम्हें जब रसों इस पर इस तरह लदे हो, और इसकी जान ले रहे हो, तो कौन मानेगा कि तुम्हारा है।"पूछा-"बताइये, अबहम लोग क्या करें ?"इस पर किसान और उसका बेटा टट्टू से नीचे उतर आए और उसने बाबा जी से बाबा जी ने उत्तर दिया-"बताइये क्या, सीधी सी बात है। जिस तरह तुम इस पर लदकर आये हो उसी तरह इसे अपने कन्धों पर लादकर ले जाओ,तो हम भी जाने कि यह टटू तुम्हारा है।"यह कहकर बाबा जी आगे बढ़ गए। वे दोनों बाप-बेटे मुसीबत में पड़ गए। उन्होंने पहले तो टट्टी के चारों पैर रस्सी से कसकर बांधे और फिर उनके बीच मजबूत लकड़ी डाल दी। इसके बाद उसी लकड़ी के सहारे टटू को अपने कन्धों पर लादकर आगे बढ़े। टटू इससे कष्ट पड़ा तो जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने लगा।रास्ते में एक नदी पड़ती थी, जिस पर पुल बंधा हुआ था। उस समय पर लोगों की भीड़ थी। जब उन्होंने देखा कि दो आदमी लकड़ी के सहारे जिन्दा टटू को अपने कंधों पर लादे चले जा रहे हैं तो वे बहुत चकराये।फिर सबके सब उन्हीं के पीछे दौड़ पड़े औरतालियाँ बजाने लगे।लोगों का शोर-गुल सुनकर टटू और भी भड़का और छटपटाने लगा तथा रस्सी तोड़ने की कोशिश करने लगा। आखिर, उसके पैरों में बंधी रस्सी तड़ाक से टूट गई और वह धम से पुल के नीचे नदी में जा गिरा तथा गिरते ही मर गया।बेचारा किसान वहीं पुल पर माथा पकड़कर बैठ गया और रोते हुए कहने लगा"हाय-हाय, मैंने तो सबको प्रसन्न करना चाहा, किन्तु कोई प्रसन्न नहीं हुआ। उल्टे मुझे ही इतना दुःख उठाना पड़ा और अपने टटू से हाथ धोना पड़ा।"