राम की ईमानदारी-दादी माँ की कहानी

राम की ईमानदारी-दादी माँ की कहानी

Apr 17,2021 02:55 AM posted by Admin

दीपावली का दिन था। संध्या हो गई थी। दीपक जल चुके थे। बाज़ार में बड़ी बदल-पहल थी। दुकाने बिजली की बत्तियों से जगमगा रही थी। मिठाइयों और खिलौनों की दुकानें खूब सजी हुई थीं। खरीददारों की बड़ी की। बेचने वालों को दाम लेने और गिनने की भी फर्सत नहीं थी। म भी मिठाई की दुकान पर गया। उसकी उम्र बारह-तेरह वर्ष की थी। वह आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था। राम भी मिठाई खरीदना चाहता था। सहसा उसकी नजर दुकान के भीतर जमीन पर पड़ी। जमीन पर एक बहुत ही सुन्दर पर्स पड़ा हुआ था। । राम ने पर्स को उठा लिया। उसे पर्स उठाते हुए किसी ने भी नहीं देखा, क्योंकि सभी अपनी-अपनी धुन में मस्त थे। राम मिठाई खरीदकर अपने घर आ गया। वह कमरे में बैठकर पर्स खोल कर उसे देखने लगा।

पर्स के भीतर सौ-सौ रुपये के तीन और हजार के नोट थे।राम नोटों को गिनकर हक्का-बक्का रह गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे? वह हाथ में नोटों को लेकर सोचने लगा, रह-रहकर सोचने लगा।राम सोच ही रहा था कि उसकी माँ कमरे में आ गई। वह राम के हाथ में बहुत से नोट देखकर बोली, "राम, तुम्हें इतने नोट कहां से मिले ?"राम उत्तर देने ही जा रहा था कि उसके पिता जी भी आ गए। राम के हाथों में नोट देखकर उन्होंने ने पूछा, "बात क्या है ?"राम की माँ ने उत्तर दिया, "राम को न जाने कहां से इतने नोट मिले हैं ? मैं पूछ रही हूँ, इसे नोट कहां से मिले हैं ?"

राम के पिता आश्चर्य-चकित होकर नोटों की ओर देखने लगे।राम सोचता हुआ बोला, "ये सभी नोट इस पर्स में थे। मैं मिठाई खरीदने हलवाई की दुकान पर गया था। यह पर्स मुझे दुकान के भीतर पड़ा मिला था।"राम की माँ और पिता दोनों, नोटों की ओर देखते हुए सोचने लगे।कुछ क्षणों बाद राम की माँ बोली, "आज दीपावली है। लक्ष्मी जी ने तुम पर कृपा की है। किसी से चर्चा मत करना।"राम के पिता जी ने भी राम की माँ का ही अनुमोदन किया। पर राम को अपनी माँ और पिता जी की बात पसन्द नहीं आई। वह नोटों को तर रखता हुआ उठ खडा हआ और पर्स हाथ में लेकर कमरे से निकलनेपर्स के भीतर रखता हुआ उठ खड़ा लगा।

राम की माँ बोल उठी, "कहां जा रहे हो?"राम ने उत्तर दिया, "हलवाई की दुकान पर । मैं दुकान के पास बैठकर पता लगाऊँगा कि यह किसका पर्स है ? यह पर्स जिस आदमी का होगा, वह अवश्य दुकान में खोजने के लिए आयेगा।"राम की माँ और पिता जी दोनों मौन रह गये। वे जानते थे कि राम बडा ईमानदार और सत्यनिष्ठ है। वह उनकी बात नहीं मानेगा।राम हाथ में पर्स लेकर दुकान के सामने जा पहुंचा और एक तिपाई पर बैठकर आने-जाने वालों को देखने लगा। घंटों बीत गए, पर हलवाई की दुकान पर कोई भी ऐसा आदमी नहीं आया. जो पर्स की खोज में परेशान दिखाई पड़ रहा हो। राम चिन्ता में पड़ गया। वह सोचने लगा कि अब वह क्या करे ? वह पर्स के मालिक का पता लगाए तो किय तरह लगाए ? उसे पर्स लेकर घर जाते हुए डर लग रहा था।

कहीं ऐसा न हो कि उसके माता-पिता लोभ में आकर पर्स ले लें। राम की समझ में जब कुछ बात नहीं आई तो उसने थाने में जाकर पर्स को जमा कर दिया। पूरी कहानी बताकर अपना नाम और पता लिखा दिया। थानेदार ने पर्स के मालिक का पता लगाने के लिए डुग्गी पिटवाई, अखबारों में भी छपवाया पर पर्स के मालिक का पता नहीं चला।काफी दिन बीत गए । एक दिन थानेदार ने राम को बुलाकर कहा, "बेटा राम, पर्स के मालिक का पता अब नहीं चलेगा। हो सकता है कि पर्स का मालिक किसी और शहर का हो। इसलिए तुम पर्स ले जाओ। रुपये अपने काम में लाओ।"पर राम ने अस्वीकार कर दिया।

उसने कहा, "थानेदार साहिब, ये रुपये किसी दूसरे के हैं। मैं इन्हें अपने काम में नहीं ला सकता। आप इन्हें डाकखाने में जमा कर दें। हो सकता है, कभी पर्स के मालिक का पता चल जाये।थानेदार ने राम की पीठ ठोंकते हुए, रुपये डाकघर में जमा करा दिए।पर्स का मालिक कभी मिले या नहीं, इस बात को कौन जाने, पर राम के मन में बड़ा संतोष और सुख था कि रुपये डाकघर में जमा हैं, सुरक्षित हैं। । हर ईमानदार आदमी को दूसरे का धन सुरक्षित देखकर राम के समान ही सुख और संतोष होता है।