एहसान का बदला-दादी माँ की कहानी

Apr 08,2021 05:13 AM posted by Admin

एक नदी के किनारे एक वृक्ष था। वृक्ष पर मधुमक्खियों का एक बड़ा छत्ता था। छत्ते में बहुत सी मधमक्खियां रहती थी जिनमें रानी मक्खी भी था। एक दिन रानी मक्खी छत्ते से बाहर निकलते ही हवा के तेज झौंके के कारण पानी में गिर पड़ी ।पानी में गिरते ही उसके पंख भीगकर आपस में चिपक गए और वहउड़ने के योग्य न रही, तब वह नदी के जल से बाहर निकलने के लिए बुरी तरह छटपटाने लगी। पानी का बहाव भी तेज था जिस कारण वह अपने छत्ते से काफी दूर चली गई। अब दूसरी मक्खियां भी उसकी सहायता को नहीं आ सकती थी। नदी के उसी किनारे पर एक वृक्ष पर कबूतर रहता था। उसने रानी मक्खी को इस प्रकार पानी में बहते देखा तो उसे उस पर बड़ी दया आई और वह उसे बचाने का उपाय सोचने लगा।अचानक एक युक्ति उसके मस्तिष्क में आ ही गई। उसने जल्दी से पेड़ के नीचे पड़ा एक सूखा पत्ता अपनी चोंच से उठाया और नदी के किनारे-किनारे उड़ने लगा।

कुछ दूर जाकर उसे मधुमक्खी दिखाई दी। कबूतर ने वह पत्ता मधुमक्खी के बिल्कुल आगे डाल दिया।डूबते को तिनके का सहारा मिला। मधुमक्खी शीघ्रता से उस पत्ते से चिपट गई। धीरे-धीरे वहपत्ते पर चढ़कर बैठ गई।उस गोविन कबूतर कुछ देर पत्ते के साथ-साथ उड़ता रहा। मधुमक्खी हिल-डुल भी नहीं रही थी। कबूतर ने सोचा कि क्यों न यह पत्ता मैं उसी पेड़ के नीचे ले जाकर रख दूँ। यह शायद बेहोश हो गई और इसे इसके सेवकों की आवश्यकता है।ऐसा सोच कबूतर ने वह पत्ता चोंच में दबाया और उसे पेड़ के नीचे ले गया। फिर कुछ देर तक वह एकटहनी पर बैठकर देखता रहा कि मधुमक्खी रानी जीवित है या मर गई।कुछ देर बाद रानी मक्खी जरा-सी हिली-डुली तो कबूतर को बहुत खुशी हुई कि उसके प्रयासों से किसी की जान बच गई। उधर रानी मक्खी ने भी कृतज्ञ भाव से उसकी ओर देखा।उधर रानी मक्खी के गुम हो जाने के कारण सेविकाएं बहुत परेशान थी। तभी रानी मक्खी उड़कर अपने छत्ते में चली गई जिससे सेवक मक्खियों ने राहत की सांस ली और कबतर भी उड़कर अपने वक्ष पर आ बैठा।

एक दिन एक शिकारी वहां आया। वह चिडिमार था जो नदी किनारे घूम-घमकर करती इधर-उधर उड़ने लगी। चिड़ियों का शिकार करता था। उसके भय से सभी छोटी-बड़ी चिड़ियां चीं-ची जिस कबूतर ने रानी मक्खी को बचाया था, वह भी डर के मारे पत्तों में छिप गया, मगर दुर्भाग्य से शिकारी की नजर उस पर पड़ गई।रानी मक्खी ने जब देखा कि शिकारी कमान पर तीर चढ़ाए उसके प्राण बचाने वाले कबूतर के प्राण हर लेना चाहता है तो उसे बड़ा क्रोध आया और उसने तुरन्त अपनी लड़ाकू मक्खियों को आदेश दिया- "हमें हर हाल में इस कबूतर के प्राणों की रक्षा करनी है। वह हमारा हमदर्द और मित्र है। मित्र का शत्रु हमारा शत्रु। इस चिडिमार पर टूट पड़ो।"बस!रानी के आदेश की देर भर थी। लड़ाकू मक्खियाँ उस शिकारी पर टूट पड़ी। शिकारी ने घबराकर बाण छोड़ दिया जो निशाना चूकने के कारण व्यर्थ गया। मौत के भय से कबूतर ने आँखें बंद कर ली थीं। शिकारी की चीख सुनकर उसने आंखें खोलकर देखा तो दंग रह गया।शिकारी जान बचाने के लिए पागलों की भांति भागा जा रहा था और सैंकड़ों मधुमक्खियां उसके पीछे लगी थी।कबूतर सब कुछ समझ गया। उसे अपनी जान बचने पर बड़ी प्रसन्नता हुई और मन ही मन में वह बोला-"कर भला तो हो भला।