दयालु डाक्टर-दादी माँ की कहानी

Apr 09,2021 03:25 AM posted by Admin

कमल का ध्यान वैद्य जी की ओर गया। उसके घर से कछ दूर पर वैद्य जी का घर से कछदार दवाखाना था। वे सरकार की तरफ से मुफ्त दवा किया करते थे।कमल ने सोचा कि वह क्यों न वैद्य जी के पास जाकर उन्हें अपनी हाल बताए और उनसे दवा लाकर अपनी माँ को दे। कमल चुपके से उठा और माँ को बिना बताए हुए वैद्य जी के पास जा पस उसने वैद्य जी को अपनी माँ का हाल बताया और उनसे प्रार्थना की कि वे दवा दें, जिससे उसकी माँ शीघ्र अच्छी हो जाए।वैद्य जी ने कमल को कुछ गोलियाँ दे दी और उन गोलियों को खिलाने का नियम भी बता दिया।कमल अपनी माँ को वैद्य जी की गोलियाँ खिलाने लगा। वह अपनी माँ की सेवा और दवा-दारू में अपने आपको भूल गया।

वह पढ़ना-लिखना छोड़कर अपनी माँ की चारपाई के पास बैठा रहता था। उदास आँखों से उसके मुख की ओर देखा करता था। कमल की बीमार माँ कभी-कभी उसे पकड़कर अपनी छाती पर सुला लेती थी और अफनी उँगलियों से उसके सिर को सहलाने लगती थी।कमल ने कई दिनों तक अपनी माँ को वैद्य जी की गोलियाँ दीं, पर ज्वर नहीं उतरा। उसकी माँ दिनों-दिन कमजोर होने लगी।कमल चिन्तित हो उठा। उसने सोचा कि वैद्य जी की गोलियों से काम नहीं चलेगा। अब उसे अपनी माँ को किसी डाक्टर की दवा देनी चाहिए। पर डाक्टर की दवा के लिए काफी पैसे चाहिए और पैसे उसके पास नहीं है। फिर क्या वह अपनी माँ को डाक्टर की दवा नहीं दे सकेगा? नहीं, वह डाक्टर की दवा जरूर देगा।कमल ने अपनी किताब में सरकारी अस्पताल के बारे में पढ़ रखा था। उसने पढ़ा था कि सरकारी अस्पताल में मुफ्त दवा दी जाती है।कमल ने सोचा कि वह क्यों न सरकारी अस्पताल में जाए और अस्पताल के डाक्टर को अपनी माँ का हाल बताकर दवा लाये?कमल अस्पताल में जा पहुंचा। उसने डाक्टर के पास बैठकर भरी हुई आंखो से अपनी माँ का हाल कह सुनाया। उसने डाक्टर को यह भी बताया कि वह गराब है और दुनिया में उसकी माँ को छोड़कर उसका कोई नहीं है।डाक्टर बड़ा दयालु था। कमल की कहानी को सनकर उसके हृदय मदा उमड़ उठी। उसने प्यार भरे शब्दों में कमल से कहा, "तुम घबराओ नहीं। तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चलूंगा और तुम्हारी माँ को देखकर ही दवा दूंगा।कमल को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि बिना फीस के किसी रोगी का

जाकर उसे देखने की बात उसने कभी कान से सुनी तक नहीं थी। वह आश्चर्यचकित होकर डाक्टर की ओर देखने लगा।कमल को उस समय तो डाक्टर भगवान-सा मालूम होने लगा, जब उसने कमल के साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को देखा, दवा दी और इंजेक्शन भी लगाया।डाक्टर अपने आप ही चार-पांच दिनों तक बराबर कमल के घर जाता रहा और उसकी माँ को दवा देता रहा। डाक्टर के प्रयत्नों से कमल की माँ अच्छी हो गई। चलने-फिरने लगी और पहले की ही तरह काम-काज भी करने लगी।दोपहर का समय था। डाक्टर कमल के घर जाकर चारपाई पर बैठ गया। उसने कमल को बुलाकर उससे पूछा, "कमल, क्या तुम बता सकते हो, मैं बिना फीस लिये हुए तुम्हारे घर क्यों आया था और तुम्हारी माँ की चिकित्सा क्यों की थी।

"कमल ने उत्तर दिया, "डाक्टर साहब, आप बड़े दयालु हैं। मेरी दुःख भरी कहानी सुनकर आपके दिल में दया पैदा हो उठी थी। वह दया ही आपको मेरे घर लायी थी।"डाक्टर ने सोचते हुए कहा, "नहीं कमल, दया मुझे तुम्हारे घर नहीं लायी थी। जब तुमने मुझे अपनी कहानी सुनाई, तो मुझे लगा, तुम एक बहुत अच्छे लड़के हो। मुझे यह भी लगा कि मुझे तुम्हारी सहायता करनी चाहिए और मैं तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारे घर चला आया।"डाक्टर कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "कमल तुमने अपनी माँ की सेवा करके ईश्वर को मोहित कर लिया था। ईश्वर ने ही मुझे तुम्हारे घर आने की प्रेरणा दी थी।"कमल ने डाक्टर को क्या जवाब दिया, कुछ कहा नहीं जा सकता, पर डाक्टर की यह बात सच तो है ही कि उसने अपनी माँ की सेवा से ईश्वर के मन को मोहित कर लिया था।जो लोग सच्चे मन से माँ की सेवा करते हैं, ईश्वर उन पर मुग्ध हो जाता है और,वह उसी तरह उनकी सहायता करता है, जिस तरह उसने कमल की सहायता की थी।