चुतर बूढ़ा-दादी माँ की कहानी

Apr 08,2021 03:56 AM posted by Admin

एक समय की बात है, एक गांव में एक बूढ़ा और बुढ़िया रहते थे। बुढ़िया को मुर्गी पालन का शौंक था अतः उसने काफी मुर्गे-मुर्गी पाल रखे थे। बूढ़े और बढ़िया की आपस में बनती नहीं थी। किसी न किसी बात को लेकर दोनों में चिख-चिख होती रहती थी। उधर पिछले कई दिनों से बूढे का मन मुर्गा-भात खाने को कर रहा था। मगर भात की कौन कहे, बुढ़िया तो उसे दड़बे के करीब तक न जाने देती थी। बूढ़ा जब भी उससे मुर्गा-मुर्गी पकाकर खिलाने की बात कहता तो बुढ़िया झिड़क देती-"खबरदार! मैंने इन्हें बड़े प्यार से पाला है, हाथ तक न लगाना। मैं इतनी मेहनत और लगन से इन्हें पालती हूँ और तुम खाना चाहते हो।"नामक बूढ़ा मन मसोस कर रह गया। परमार हम जब कई बार प्रयास करने पर भी बूढ़ा अपनी अच्छा पूर्ण करने में समर्थ न हो सका तो उसने बुढ़िया को ठगने की सोची। अपनी योजना के अर्न्तगत एक दिन वह जंगल में गया और वहां एक खोखला पेड़ देख आया। पेड़ में एक कोठर थी जिसमें तोते रहा करते थे।

वह अप खाली पड़ी थी क्योंकि पेड़ पीछे से खोखला हो गया था और उसमें इतनी जगह बन गई थी कि एक आदमी छिपकर बैठ जाए। बुढा प्रसन्नता पूर्वक घर लौटा और बोला-"सुनती हो, जंगल में एक पेड़ की कोठर में तोते के दो बच्चे रहते हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि बाबा जी हमें मुर्गी-भात खिलाइये। मैं उन्हें वादा कर आया हूँ। अब क्या तुम मेरे वादे की लाज रखोगी?"यह सुनकर बुढ़िया प्रसन्न हो गई और बोली-"ठीक है, मुझे वह जगह दिखा दो, मैं अपने हाथों से मुर्गी-भात बनाकर उन्हें खिला दूंगी।"बूढ़े ने बुढ़िया को ले जाकर दूसरी तरफ से वह पेड़ बुढ़िया को दिखा दिया। "मगर यह तो खाली है। तोते कहा है।" बुढ़िया ने पूछा। "अरे मर्ख रहते हैं, कीडे-मकौडे चगने गए होगे।" बूढ़े का उत्तर सुनकर बुढ़िया आश्वस्त हो गई। दूसरे दिन बुढ़िया मुर्गा-भात लेकर पहुंची। खोखले के अन्दर से चिड़ियों का ची-चीं सुनाई दे रही थी।प्रसन्न होकर बुढ़िया तोतों को मुर्गा-भात खिलाने लगी। वह यह सोचकर । छोटे कोर उन्हें खिला रही थी कि अभी छोटे-छोटे बच्चे हैं, बडा कोर नहीं खा पाए" मगर उसे क्या पता था कि अन्दर बूढ़ा बैठा है और उन छोटे-छोटे कोरों को खाने में उसे कोई मजा नहीं आ रहा। बूढ़े ने झुंझलाकर बुढ़िया की उंगली को थोड़ा सा कतर दिया। बुढ़िया ने सोचा कि बच्चे अधिक भूखे हैं अतः वह उन्हें बड़े-बड़े कोर खिलाने लगी। सारा मुर्गा-भात खिलाकर बुढ़िया खुशी-खुशी घरलौट गई। बूढ़ा उससे पहले घर पर बैठा था। वह बुढ़िया को देखकर मुस्कुराया।


बुढ़िया को तोतों के बच्चों की चीं-ची बहुत प्यारी लगी थी। अत: अब वह रोज मुर्गी-भात बनाती और उन्हें खिलाने जाती।बूढ़े के खूब मजे आ रहे थे। वह खुश था कि रोज मुर्ग-भात खानेको मिल रहा है और वह भी बुढ़िया के हाथों से।जब बीस पच्चीस दिन गुजर गए तो बुढ़िया ने सोचा कि बच्चों को छूकर दे । यह सोचकर बुढ़िया ने ज्यों ही कोठर के भीटर हाथ डाला तो चौंक पड़ी। फिर पेड़ के पीछे जाकर देका तो पेड़ की खोह से बूढ़ा हँसता हुआ बाहर आ रहा था। उसे देखकर बुढ़िया के क्रोध की सीमा न रही। बूढ़ा अब तक दस-बारह मुर्गे चट कर गया था।अब बुढ़िया ने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई, मगर ढीठ बूढ़ा खड़ा-खड़ा सुनता रहा। बुढ़िया ने सोचा कि गलती उसी की है, यदि वह बूढ़े की बात मान लेती तो एक मुर्गे में पिण्ड घुट जाता और बुढ़े को भी इस प्रकार ठगी न करनी पड़ती। अगर अब पछताए क्या होत है |