बुद्धिमान गधा-दादी माँ की कहानी

Apr 07,2021 07:50 AM posted by Admin

एक गधा मैदान में हरी-हरी, कोमल-कोमल घास चर रहा था। अचानक जो उसने सिर उठाया तो एक बाघ को अपनी ओर आते देखा। गधा समझ गया कि अब प्राण बचाना, बाघ के सामने से भगा निकलना असम्भव है। फिर क्या करें ? यों ही प्राण खो दे ? बड़े बूढे कहावत बनाकर गए हैं-अक्ल बड़ी या भैंस। क्यों न आज यही कहावत काम में लाए, बुद्धि के बल को नीचा दिखाए और बाघ को उल्लू बनाए। यह सोचते-सोचते गधे ने पिछले एक पैर से लंगड़ा-लंगड़ाकर चलना शुरु कर दिया। बाघ ने गधे के पास आते-आते पूछा-"क्यों भाई गधे, यह तू लंगड़ा-लंगड़ा कर क्यों चल रहा है ?" गधे ने उत्तर दिया-"क्या कहूँ सरकार! दौड़ते समय पैर में एक बहुत लम्बा, बहुत मोटा कांटा चुभ गया है। उसी से पैर में बहुत कष्ट हो रहा है और मैं लंगडाकर चल रहा हूँ।

"बाघ ने पूछा-"फिर ?"गधे ने कहा-"यदि मुझे खाने का विचार रखते हो तो पहले वह कांटा बाहर निकालो। कहीं ऐसा न हो कि मुझे खाते समय वहकांटा गलती से तुम्हारे गले में अटक जाए और तुम्हें अपने प्राण खोने पड़ें।"बाघ को गधे की बात जंच गई। उसने गधे का वह पैर उठाया और बड़े ध्यान से उसमें कांटा ढूंढना शुरु किया। गधे ने यह मौका बहुत अच्छा समझा और कसकर दलत्ती फटकारी तथा हवा के समान तेजी से भाग निकला। तडाक से दुलत्ती की चोट पड़ने से बाघ का मुँह टेढ़ा हो गया। उसके सामने के दांत झड़ गए और जबड़े खून से भर गए। बस, वह लज्जित होकर कह उठा-"उफ्! गधे की बुद्धि के सामने बाघ का बल कुछ काम न आया।"