जीत की हार-दादी माँ की कहानी

Apr 09,2021 03:09 AM posted by Admin

बहुत पुराने समय की बात है, जिस प्रकार किसान को खेत लहलहाता देख खुश होता है। उसी प्रकार अक्षय को अपना घोड़ा देखकर आनंद आता था। जब तक वह अपने घोड़े पर बैठकर करीब 5 से 6
मील दूर सैर न कर लेता था उसे चैन न आता था। उसके घोड़े की तरह पूरे आर्यवर्त में न था। अक्षय बाबा ने उसे वेग कहकर पुकारते थे। एक दिन यह बात इस देश के डाक के कानों में पडी। उसका नाम करणसिंह था। वह उस घोड़े को देखने के लिए आया। तो अक्षय बाबा की नजर डाकू करण पर पड़ी। तो बोलेआओ, करण सिंह बैठो। बोलो क्या हाल हैं। डाकू करण सिंह बोले-आपकी वेग की चाह खींच लाई। दोनों अस्तबल में पहुँचे, जब करण सिंह ने घोड़े को देखा तो देखते रह गया। उसने कई घोड़ेदेखे थे, परन्तु ऐसा घोड़ा कभी नहीं देखा था। वाह, क्या घोड़ा है ? डाकू करण सिंह बोले। इसका काला रंग तो बहुत ही खुलदार है।वे अक्षय बाबा से बोले-बाबा, मैंने तो इसकी वेग नहीं देखी है।अक्षय बोले-देखना चाहते हो तो दिखा देता हूँ।

बाबा ने उस घोड़े को अस्तबल से निकाला और घोड़े को दौड़ाने लगे, ज्योंही डाकू करण सिंह ने देखा तो वह स्तब्ध रह गया। ये घोड़ा इस साधु के पास शोभा नहींदेती है। ऐसा घोड़ा तो हमारे पास रहना चाहिए था। डाकू करण सिंह ने जाते समय बोला-बाबा, मैं यह घोड़ा आपके पास नहीं रहने दूंगा। अब बाबा डर गए। वे अपने आप से बोले-मैं तो वेग के बिना नहीं रह सकूँगा। बाबा अब सारी रात उसकी पहरेदारी करते रहे। कई दिन बीत गए, बाबा को लगा ये बात कोई स्वप्न था। वे अब निश्चिंत हो गए।एक दिन वे घोड़े के साथ सैर करने निकले। तभी आवाज आई, ओ घोड़े वाले। बाबा ने देखा एक लंगड़ा आदमी उसे बुला रहा है। उसकी आवाज में करुणा है। अक्षय बाबा उस लंगड़े के पास गए और बोले-क्या बात है? उस लंगड़े ने कहा-बाबा, मुझे, देवदत्त नगर में पहुँचा दो। बाबा ने पूछा-कौन रहता है वहाँ।उस लंगड़े ने कहा-शायद तुम देवदत्त नगर के कमल साहब को जानते होंगे, उन्हीं का मैं बेटा हूँ। बाबा ने उस लंगडे को अपने घोड़े पर बिठा लिया

और घोड़े को धीरे-धीरे दौडाना प्रारम्भ किये थे कि तभी उन्हें झटका लगा। वे आश्चर्य में पड़ गये। वह लंगडा डाक करण सिंह था। वे कुछ देर सोच के पूरे ताकत के साथ जोर से चिल्ला कर कहा-ठहरो डाकू करण सिंह। वह डाकू रुक गया, बाबा उसके पास जाके बोले-मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। तुम ना मत कहना। डाकू बोला-अब ये घोडा मेरा है। इस घोड़े के सिवा जो कहोगे मैं स्वीकार कर लूंगा। बाबा ने कहा-तुम इसबात को दूसरे के सामने प्रकट नहीं करना। डाकू को आश्चर्य लगा ये बात को सुन कर। उसे तो भागना था कहीं कोई पकड़ न ले। वह बहुत सिर पीटा, बहुत समझने की कोशिश की परन्तु बात समझ में न आई।आखिर में करण सिंह ने पूछा-मैं कुछ समझा नहीं। बाबा बोले-अगर ये बात दूसरा कोई समझा तो वह दीन-दुःखी पर विश्वास नहीं करेंगे और बाबा वेग की तरफ भी न देखे और चले गए। रास्ते में डाकू करण सिंह को यह बात सिर में नाचती रही। उसने सोचा जो आदमी हमेशा कहा करता था कि हम वेग के बिना न रह पाएँगे, वे इस बात पर ध्यान न देके गरीब, अपंग आदि बात पर ध्यान दिये और जो सारी रात खुद पहरेदारी किया करते थे वे आज इस घोड़े के तरफ भी न देखे।

कैसा उच्च विचार था। वे साधारण मनुष्य होकर भी अन्य मनुष्य से भिन्न थे। वे मनुष्य नहीं भगवान हैं। अगले रात को डाकू करण सिंह चुपके से अस्तबल में गए। उन्होंने देखा कि अस्तबल का फाटक खुला है और अन्दर कोई नहीं है। उसने चुपके से घोड़े को बाँध दियाऔर फाटक बंद करके चले गए। रात का चौथा पहर आया बाबा उठकर नहा-धो लिए और भगवान का भजन करके, अस्तबल की ओर जाने लगे, अचानक रुक गए, उन्हें एक कदम भी चला नहीं हो रहा था। जब वेग न अपने मालिक के पैर की आवाज सुनी तो वह जोर से हिनहिनाया। घोड़े का आवाज सुनकर वे अस्तबल की ओर दौड़ पड़े और उसे गले लगाकर रान लगे। उस समय ऐसा लग रहा था मानों कोई बाप अपने बिछुड़े बेटे का ना लगाकर रो रहा है।