उल्लुओं की बातचीत-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 10,2021 04:28 AM posted by Admin

बादशाह अकबर को शिकार खेलने में काफी दिलचस्पी थी इसलिए उन्होंने अपने शिकार की इच्छा पूरी करने के लिए एक जंगल सस था। जब कभी उनकी इच्छा होती, अपने साथ कुछ सैनिकों को लेक में जाते और आखेट पर संध्या को घर लौट आते। उस जंगल में ना के सिवाय कोई दूसरा व्यक्ति शिकार नहीं कर सकता था, इसलिए कर चारों ओर शाही चौकी पर पहरा बैठा दिया गया था।  एक दिन बादशाह एक बड़ी सेना के साथ जंगल में गए। उल्लुओं के दो दल दो पेड़ों पर प्रतिद्वन्द्वी होकर बैठे थे। इनमें से एक-एक उल्लू बारीबारी अपनी खोल से बाहर निकलकर लड़ता और फिर थोड़ी देर बाद उसी में जा बैठता था। इस लड़ाई को देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। उसका भेद जानने के लिए लालायित होकर उन्होंने बीरबल से पूछा-"बीरबल! तुम काफी समझदार हो, इसका मुझे पूर्ण विश्वास है।

तुम पशु-पक्षियों की भाषा जानते हो और उनके रहन-सहन से भी परिचित हो। भला इन उल्लुओं का दलबन्दी और बारी-बारी का युद्ध किसलिए हो रहा है?"बीरबल कुछ पल सोचकर बोले-"ग़रीब परवर! इसका उत्तर कुछ कड़वा है। यदि आप नाराज़ न हों तो मैं कह दूं?"इसमें नाराज़ होने की क्या बात है?" बादशाह ने कहा।"महाराज! इन दोनों दलों में से एक लड़के के पक्ष का और दूसरा लडकी के पक्ष का है। दोनों समधी दहेज के लेन-देन पर झगड़ रहे हैं। लड़के का बाप कहता है कि मैं तुम्हारी लड़की को तब ले जाऊंगा, जब तुम मुझे दहेज में चालीस जंगल दोगे। लड़की का पिता कहता है कि इस समय इतने जंगल मेरे पास नहीं हैं। ईश्वर की इच्छा होगी तो आगे चलकर इसी कमी की पूर्ति कर दूंगा। लड़के का पिता असंतुष्ट होकर कहता है कि जो तुम इस समय नहीं दे सकते, उसे भविष्य में कहां से लाओगे? लडकी का पिता कहता है, हमारे बादशाह को शिकार खेलने का बड़ा शौक है। अभी तो इतने ही जंगलों को सुरक्षित किया है। आगे चलकर बहुत से गांवों को उजाड़कर जंगलों में बढ़ोत्तरी करेंगे। तब तुम मुझसे चालीस की जगह पचास जंगल ले लेना। ग़रीब परवर! ये पक्षी इस बात के लिए लड़ रहे हैं।" बीरबल ने बादशाह को विस्तार से समझाते हुए कहा। प्रभाव पड़ा। उनका मन भिक बीरबल की उपरोक्त बातें कल्पित थीं, फिर भी बादशाह पर उनका मन शिकार खेलने की तरफ से पलट गया। उनके शिकार जोक के लिए जितने गांव उजाड़े गए थे, उन्हें हुक्म देकर फिर से बसा दिया गया।