श्रीकृष्ण को भक्त प्यारे-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 10,2021 03:54 AM posted by Admin

बीरबल हिन्दू भी था और विद्वान भी। एक दिन बादशाह अकबर ने हिन्दू धर्म के विषय में बात करने के लिए बीरबल को बुलाया।बीरबल के आने पर बादशाह ने कहा-"तम्हारे धर्म ग्रन्थों में यह लिखा है कि हाथी की गुहार सुनकर श्री कृष्णजी पैदल दौड़े चले आए थे। न ता उन्हान नौकर को साथ लिया. न सवारी पर आए। इसकी वजह समझ में नहीं आई। क्या उनके यहां नौकर नहीं थे?" बीरबल बोले-"इसका उत्तर आपको समय आने पर ही दिया जाएगा जहांपनाह।"कुछ दिन बीतने पर एक दिन बीरबल ने एक नौकर को, जो शहजाद को इधर-उधर टहलाता था, एक मोम की बनी हुई मूर्ति दी, जिसकी शक्ल बादशाह के पोते की ही तरह थी। मूर्ति गहने-कपड़ों से सुसज्जित होने के कारण दूर से देखने में बिल्कुल शहजादा मालूम होती थी।

 

बीरबल ने नौकर को अच्छी तरह समझा दिया था कि जिस तरह तुम नित्य-प्रति बादशाह के पोते को लेकर बादशाह के सम्मुख जाते हो, ठीक उसी तरह आज मूर्ति को लेकर जाना और कुण्ड के पास फिसल जाने का बहाना करके गिर पड़ना। तुम सावधानी से ज़मीन पर गिरना, लेकिन मूर्ति पानी में अवश्य चली जाए। यदि तुम्हें इस कार्य में सफलता मिली तो तुम्हें कोई इनाम दिया जाएगा। लालचवश नौकर ने ऐसा ही किया। जैसे ही वह जल कुण्ड के पास पहुंचकर फिसला, मूर्ति पानी में चली गई।बादशाह भी कुण्ड की ओर लपके और उसमें कूद गए और कुछ देर बाद मोम की मूर्ति को लिए पानी से बाहर निकले।बीरबल उस वक्त वहां उपस्थित था, बोला-"आपके नौकर-चाकर हैं, फिर भी आप अकेले ही पैदल क्यों अपने पोते के लिए दौड़ पड़े, आखिर सब सवारियां किस काम आएंगी?" बीरबल ने कुछ देर रुककर फिर कहा"अब भी आपकी आंखें नहीं खुली तो सुनिए-जैसे आपको अपना पोता प्यारा है, उसी तरह श्री कृष्ण जी को अपने भक्त प्यारे हैं। इसलिए उनकी पुकार पर ही वह पैदल गए थे।" यह सुनकर बादशाह अकबर काफी प्रसन्न हुए और निरुत्तर भी।