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पंचों का न्याय-अकबर बीरबल की कहानी

पंचों का न्याय-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 16,2021 08:15 AM posted by Admin

बहुत समय पहले बीरबल ने बादशाह से प्रार्थना करके यह वचन ले लिया था कि जब कभी मुझसे कोई अपराध हो जाए तो उसका न्याय वही पंच करें, जिनको मैं स्वयं चुनें। बादशाह ने बीरबल की यह प्रार्थना स्वीकार : करते हुए उन्हें इसका वचन दे दिया। बादशाह अपने वायदे के पक्के थे, अतएव बीरबल को हार्दिक प्रसन्नता हुई।अचानक एक दिन बीरबल से एक अपराध हो गया। बादशाह ने दण्ड देने के लिए बीरबल को बुलाया और कहा-"तुमने जो कसूर किया है उसकी सज़ा तुम्हें ज़रूर मिलेगी।"तब बीरबल ने इस अवसर का लाभ उठाने के लिए बादशाह को उनके दिए गए वचन को स्मरण करवाया। बादशाह की अनुमति लेकर बीरबल ने पांच शूद्रों को पंच चुना। बादशाह को आश्चर्य हुआ, ये शूद्र क्या न्याय करेंगे? खैर, इन पांचों शूद्रों को बीरबल के अपराध के सम्बन्ध में सारी बातें समझा दी गईं तथा न्याय करने का आदेश दिया गया।

ऐसा सम्मान पाकर शूद्रों को बहुत प्रसन्नता हुई, साथ ही उनमें प्रति हिंसा की भावना भी जाग्रत हुई। पंचों ने यह सोचा कि बीरबल ने कई बार उनको अनेक कष्टों में डाल दिया था। उसका बदला लेने का यह सुनहरा अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। ऐसी दण्ड व्यवस्था की जानी चाहिए कि बीरबल को अच्छा सबक मिले, ताकि भविष्य में वह किसी के साथ बुरा व्यवहार करने का साहस न करे। . उन पंचों में से पहला बोला-"भाइयो! बीरबल का अपराध तो बहुतबड़ा है, इसलिए एक सौ पचास रुपए जर्मा जुर्माना करना चाहिए।"के दसरा पंच सिहर उठा। बरा असर पड़ेगा,

उसका कर सिर्फ सौ रुपए आ। उसने आश्चर्य प्रकट का प्रस्ताव किया, साथ हीइतनी बड़ी रकम के जुर्माने की कल्पना करके दसरा उसने सोचा, बीरबल के बाल-बच्चों पर इसका घर-बार चौपट हो जाएगा। यह सोचकर जुर्माना घटाकर करने का प्रस्ताव किया।तीसरे पंच को इतना जुर्माना भी ज्यादा प्रतीत हआ। उस करते हुए जुर्माना घटाकर साठ रुपए ही रखने का प्रस्ताव उसने यह भी कहा कि इतना जुर्माना ही काफी है। फिर लोग चाहें तो दस रुपए और बढ़ा सकते हैं।अब चौथे पंच की बारी आई। उसने अब तक के सभी प्रसार विरोध किया और कहा-"इतना जुर्माना तो बहुत ज्यादा है और हम ज्यादा-से-ज्यादा कमी होनी चाहिए।"


चौथे पंच के प्रस्ताव का पांचवें ने समर्थन किया और सर्वसम्मति से थोड़ी देर की बहस के बाद तय हुआ कि बीरबल पर पचास रुपए जुर्माना करना चाहिए, क्योंकि यह जुर्माना बहुत ज्यादा नहीं है। अत: बादशाह से यह प्रार्थना की गई कि इसकी वसूली में सख्ती न बरती जाए। तत्पश्चात् पांचों शूद्र पंच बादशाह से विदा लेकर चले गए।बादशाह समझ गए कि बहुत सोच-समझकर व होशियारी से बीरबल ने शूद्रों को अपना पंच चुना था। बादशाह की नज़रों में पचास रुपए का जुर्माना कुछ नहीं था, लेकिन शूद्रों की गरीबी व परिस्थिति का ख्याल करके कि साल भर तक जी-जान से परिश्रम करने के बाद भी वे बीस-पच्चीस रुपए नहीं बचा पाते और उनकी दृष्टि में पचास रुपए भी बहुत ही बड़ा जुर्माना है, बादशाह दया की भावना से भर उठे साथ ही बीरबल की चतुराई की मन-ही-मन तारीफ करने लगे।

बादशाह बीरबल को फैसला सुनाने ही जा रहे थे, लेकिन ऐसा सोचतेसोचते उन्होंने बीरबल को दण्डमुक्त कर दिया। बीरबल को यह पह मालूम था कि ये गरीब जातियां इतना अधिक रुपया नहीं बचा पाती, जा ज्यादा जुर्माना निर्धारित कर सकें और हुआ भी यही। इसी कारण ने अपने न्याय के लिए शूद्रों को ही पंच बनाया था। इसमें उनका यह भी था कि इस तरीके से बादशाह को निम्न जातियों का त भी अहसास हो जाए।