मूर्ख कौन-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 10,2021 12:57 AM posted by Admin

एक दिन की बात है। बादशाह अकबर के उस्ताद-पीर साहब मक्का से दिल्ली आए। उन्हें इसलिए बादशाह तक पहुंचने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। खैर, महल में उनकी बड़ी आवभगत की गई। कुछ दिन आनन्द लेकर पीर साहब मक्का लौट गए। पीर साहब के जाने के बाद अकबर बादशाह ने बीरबल से पूछा कि क्या तुम्हारे भी कोई गुरु हैं, जैसे कि मेरे पीर साहब हैं? यदि हैं तो वे कहां रहते हैं, कहीं आते-जाते हैं या नहीं? “जी हैं, महाराज, लेकिन वह बाहर रहते हैं, कहीं आते-जाते नहीं हैं। मेरे गुरुदेव अपनी ज़रूरत किसी को नहीं बताते और कभी किसी से कुछ नहीं लेते। रुपए-पैसे का उन्हें कोई लोभ नहीं है।" बीरबल ने उत्तर दिया। यह जानकर बीरबल के गुरु के प्रति अकबर बादशाह के मन में श्रद्धा उत्पन्न हुई। उन्होंने बीरबल को अपने गुरु से मिलवाने का आग्रह किया। अतः बीरबल ने उसे स्वीकार कर लिया। 
तब अकबर बादशाह से बातें करके बीरबल महल से बाहर निकल आए। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा लकड़हारा लकड़ियों का एक गट्ठर अपने सिर पर रखे सुबह से सायं तक इधर-उधर भटका, पर किसी ने भी उसे उचित मूल्य देकर वह गट्ठर नहीं खरीदा। बीरबल ने उस लकड़हारे से लकड़ियों के गट्ठर का मूल्य पूछा, फिर उसे अपने घर ले गए और उससे बोले-"मालूम होता है, तुम समय के कुचक्र में फंसकर इस दीन अवस्था में पहुंचे हो।" बीरबल ने उसे अच्छे साफ-सुथरे वस्त्रों और काली जटा इत्यादि से युक्त ब्राह्मण साधु बना दिया। उसके हाथ में रुद्राक्ष की माला दे दी, फिर एक बड़े मंदिर के पीछे आसन पर बैठाकर उससे बोले कि तुमसे मिलने बड़े-बड़े अमीर-उमराव आएंगे, पर उनसे तुम बिल्कुल मत बोलना। तुम्हें कितनी ही बहुमूल्य वस्तुएं वे क्यों न दिखाएं, पर तुम उनकी तरफ आँख भी मत उठाना। तुमसे जो कुछ भी पूछे, उसका जवाब मत देना। बस अपने ध्यान में रहना और सिर्फ माला फेरते रहना। ध्यान रहे! यदि इसके अलावा तुमने कोई भी हरकत की तो तुम्हारी मौत निश्चित है, क्योंकि मैं छिपकर तुम्हारी हरकतों को देखता रहूंगा। बूढ़े लकड़हारे ने बीरबल की बातों को स्वीकार कर लिया।

जब बीरबल को विश्वास हो गया कि वह भली-भांति स्वांग कर सकता है, तब वह अकबर बादशाह के साथ दरबार में गए। दरबार में उस समय सभी दरबारी उपस्थित थे। बीरबल ने अकबर बादशाह को अपने गुरु के आने की शुभ सूचना दी और कहा-"महाराज! पहले तो गुरुदेव ने दर्शन देने से इन्कार कर दिया, पर मेरी खुशामदी करने पर वह पधारे हैं और मन्दिर के पिछले हिस्से में आसन जमाए हुए हैं। उन्होंने आप लोगों को भी दर्शन देना स्वीकार कर लिया है, लेकिन मुझे साथ आने को मना किया हैं। यदि मैं हठ करके जाऊंगा तो हो सकता है, वह मुझे श्राप दे दें। अब आप अन्य लोगों के साथ उनके दर्शन करने के लिए जा सकते हैं।" तब अकबर बादशाह के साथ सभी दरबारी गुरुदेव के दर्शन करने के लिए चल पड़े। अकबर बादशाह ने गुरुदेव के सामने जाकर सादर मस्तक झुकाया और उनसे पूछा-"गुरुजी! अपना निवास स्थान तथा शुभ नाम इस दास को भी बताने की कृपा करें।" गुरुजी मौन बने रहे। अकबर बादशाह की बातें सुनी-अनसुनी करके वह अपने ध्यान में ही मग्न रहे।

अकबर बादशाह ने फिर कहा कि "भगवन्! मैं सारे हिन्दुस्तान का बादशाह हूं और आपकी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करने में समर्थ हूं। आप कृपा करके एक बार मेरी ओर नज़र उठाकर देख लें तो मैं अपने-आपको धन्य समझंगा।" इस पर भी जब गुरुदेव ने ध्यान नहीं दिया तो अकबर बादशाह ने दस हजार रुपए मूल्य का कड़ा, जिसे वह अपने हाथ में पहने हुए थे, उतारकर गुरुदेव के चरणों में यह सोचकर रख दिया कि लालच में आकर शायद कुछ आशीर्वाद दें, पर जब कोई नतीजा निकलता नज़र नहीं आया तो वह निराश होकर उठ खड़े हुए और बोले-"जो आदमी अतिथि के साथ ऐसा व्यवहार करे, उस कठोर हृदय से बातें करना भी मूर्खता तब अकबर ने वह कड़ा बीरबल के यहां भिजवा दिया, क्योंकि दान की हुई वस्तु बादशाह के महल में कैसे आ सकती थी। गुरुदेव का सारा हाल सुनाकर अकबर बादशाह ने बीरबल से पूछा"यदि कोई मूर्ख मिले तो क्या करना चाहिए?"उस समय चुप रहना ही अच्छा है।" बीरबल बोले। असली बात जानकर बीरबल फिर बोले-"जब मैंने पहले ही उनका स्वभाव आपको बता दिया था कि उन्हें रुपए-पैसे का लालच नहीं है, कभी किसी के दरवाजे पर वह नहीं जाते और मेरे बहुत कहने पर बड़ी मुश्किल से वह मिलने को राजी हुए थे, फिर क्यों आपने उन्हें लालच दिया? आपने अपशब्द कहकर गुरु का अपमान किया है। आपको धन-दौलत का घमंड है, इसलिए वह आपसे नहीं बोले।"बीरबल की बात सुनकर अकबर बादशाह ने खुद को काफी लाज्जत महसूस किया और बीरबल अपनी सफलता पर मन ही मन खुश हुए।