मांस और खून-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 10,2021 01:58 AM posted by Admin

एक नगर में रामशरण नामक व्यक्ति बहुत बड़ा सेठ था। उसका बड़ा सम्मान था। संयोगवश एक दिन उसके पास एक साथ तीन-तीन हुंडियां आईं। उन इंडियों के भुगतान के लिए उसे लगभग तीन लाख रुपए की ज़रूरत थी। उसके पास रुपया आने में पांच-छह दिन की देर थी। रामशरण अपने मुंशी को हुंडी वालों का हिसाब मिलाने के लिए कहकर रुपयों का -प्रबंध करने के लिए घर से निकला। उस समय रामशरण के मुकाबले में केवल एक ही महाजन था, जिसका नाम हरमोहन था। परन्तु वह अत्यन्त कपटी तथा ईर्ष्यालु था। रामशरण को यह बात मालूम थी, मगर उसके सिवाय कोई दूसरा ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो तीन लाख रुपए एक मुश्त दे सके।रामशरण हरमोहन के यहां गया और एक सप्ताह की मुद्दत पर तीन लाख रुपए उससे उधार माँगे। हरमोहन को जब इस बात का पता लगा तो उसकी बांछे खिल गईं। वह रामशरण को नीचा दिखाना चाहता था।उसकी यह मंशा थी कि किसी तरह रामशरण रास्ते से हट जाए तो वह स्वयं दिल्ली नगर का सेठ बन जाए। आज हरमोहन को अवसर मिला।

उसने रामशरण से कहा-"सेठजी! आप हमारे यहां पहली बार ऋण लेने ले सकते। आप तीन लाख वायदा करना होगा कि आए हैं, इसलिए हम आपसे सूद आदि भी नहीं ले सकते। रुपए खुशी से हम से ले जाएं, किन्तु आपको यह वायदा करणार यदि आपने एक सप्ताह से पूर्व ही सारा रुपया वापस नहीं किया शरीर में से एक सेर मांस, जहां से हमारी तबीयत होगी. काट इसमें किसी किस्म की कोई आपत्ति हो तो अभी कह दें. अन्य कुछ नहीं सुना जाएगा।" यह शर्त सुनकर रामशरण का माथा ठनका। हरमोहन के इसी तरह के कई निर्दयतापूर्ण कारनामों का हाल सन र था, लेकिन यह सब होते हुए भी वह रुपया लेने को मजबूर था। उम्मीद थी कि सप्ताह के पूर्व रुपया अवश्य जमा हो जाएगा। यह सोचकर उसने इकरारनामे पर दस्तख्त कर दिए।रुपया उसे मिल गया, जिसे उसने हुंडी वालों को दे दिया। दुर्भाग्य से रामशरण को बाहर से जो रुपया आ जाने की उम्मीद थी, वह न आ सका। इधर-उधर से तीन लाख रुपया तथा सूद इकट्ठा करके उसने हरमोहन के यहां भिजवाया। उसी दिन सप्ताह पूरा हुआ था, लेकिन वहां तो हरमोहन की नीयत पहले से ही खराब थी। उसने यह कहकर रुपए वापस कर दिए कि सप्ताह से पूर्व रुपया लौटाने का वादा था। इसलिए शर्त के अनुसार दायर कर दी है। अब मैं एक सेर मांस लूंगा। उसने कहा कि उसने अदालत में शिकायत 'रामशरण अदालत में हाज़िर हुआ और काज़ी से कहा-"हुजूर! हरमोहन मेरी जान लेने पर ही उतारू है। मैंने तो इसे ठीक उसी दिन, जिस दिन सप्ताह खत्म होने को था, रुपया भेज दिया था, लेकिन इसने वापस कर दिया और कहा कि एक सप्ताह के पूर्व ही मिल जाने पर अपनी शर्त के मुताबिक ऋण वापस ले लेता, किन्तु समय बीत जाने पर वह बाध्य नहीं है।" रामशरण ने फिर कहा-"हजुर! यदि यह स्वीकार करे तो म अब भी उसका रुपया सद के साथ देने के लिए तैयार हैं।" हरमोहन न यह मानने से इन्कार कर दिया।


काजी ने शर्त के मुताबिक एक सेर मांस लेने का हक्म हरमाह दिया, परन्तु रामशरण मांस देने को राजी नहीं हआ और उसने अपना अकबर बादशाह के दरबार में दायर की। अकबर बादशाह . पहले कभी नहीं सुनी थी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। अ० उसी क्षण बीरबल को बुलाया और उन्हें न्याय करने के अकबर बादशाह ने ऐसी शर्त । आश्चर्य हुआ। अकबर बादशाह ने बुलाया और उन्हें न्याय करने की आज्ञा दी। अकबर बादशाह का आदेश पाकर बीरबल ने हरमोहन को बुलवाया और उससे सच्चा हाल सुनाने के लिए कहा। जवाब में हरमोहन ने शर्त वाला इकरारनामा सामने रखकर कहा-"मुद्दत खत्म हो चुकी है और रामशरण ने रुपया अभी तक अदा नहीं किया है। अतएव इकरार के अनुसार मैं एक सेर मांस इसके किसी भी हिस्से से काट लेने का हकदार हूं।"बीरबल ने हरमोहन से कहा-"क्या तुम्हें अपना कुल रुपया सूद सहित लेना कबूल है?" परन्तु हरमोहन तो रामशरण की जान का प्यासा था, न कि रुपयों का। उसने अस्वीकार कर दिया।बीरबल ने आदेशात्मक स्वर में कहा-"मुझे काजी का फैसला स्वीकार है। इसलिए हरमोहन रामशरण के शरीर में से एक सेर मांस ले ले, किन्तु यह ध्यान रहे कि शर्त वाले इकरारनामे में केवल एक सेर मांस के लिए ही लिखा है। इसलिए यदि मांस के साथ ज़रा भी खून गिरा तो हरमोहन का सपरिवार वध करवा दिया जाएगा।"


अब तो हरमोहन बहुत घबराया और उसने बिना ब्याज लिए अपना रुपया मांगा। इस पर बीरबल ने कहा-"नहीं, इकरारनामे की शर्ते तुम्हें माननी ही पड़ेंगी।" - जब हरमोहन बहुत रोया-गिड़गिड़ाया और अपनी करतूत के लिए क्षमा मांगी तो रामशरण ने, जो स्वभाव से दयालु और परोपकारी था, ने बीरबल से प्रार्थना की कि "हरमोहन को अब अकल आ गई है, अतः इसे कुछ दंड देकर छोड़ दिया जाए।"
तब बीरबल ने फैसला सुनाया-"हरमोहन अपनी लड़की का विवाह रामशरण के लड़के से करे और दंडस्वरूप उसे लाख रुपए दहेज में दे।"इस फैसले को हरमोहन ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस प्रकार बीरबल ने एक नेक और ईमानदार आदमी की जान बचाकर बेईमान को सबक सिखाया। अकबर बादशाह तथा दरबारी बीरबल के न्याय से बेहद प्रसन्न हुए।