ज़िद्द महंगी पड़ी पंडित जी को-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 10,2021 01:52 AM posted by Admin

अकबर के समय में उनके दरबार में विद्वानों का बहत सम्मान होता शा। उन्हीं दिनों दिल्ली में एक प्रतिष्ठावान पंडित रहते थे। सभी को उनका आचरण पसद था। उनका अकबर के दरबार में एक विशेष सम्मान था। उनको उनके सभी मित्र सदैव खश रखते थे। पंडित जी एक बार जा बात भी कह देते, उसे पूरी करने के लिए जी-जान लगा देते थे। उनका स्वभाव था कि वे सबसे पछे बिना किसी भी कार्य में हाथ नहीं डालत था एक रोज़ की बात है कि पंडित जी अपने घर की रसोई में खाना खाने को तैयार बैठे थे कि अचानक उनके सामने रखे भोजन में बाल निकल आया। पंडित जी बाल को देखकर अपनी पत्नी को सचेत करते हुए बोले"देखो! इसे मैं तुम्हारी पहली भूल मानकर माफ कर रहा हूं, अगर तुमने भविष्य में भी ऐसी भूल करने की कोशिश की, तो याद रखना मैं तुम्हारे सिर के सभी बाल मुंडवा दूंगा।"
क्योंकि पंडित जी की धर्मपत्नी उनके दृढ़ संकल्प एवं जिद्दी स्वभाव से भली-भांति परिचित थी इसीलिए वह भोजन पकाते व परोसते वक्त विशेष रूप से सावधानी बरतती थी। वह अपने पति से सदैव भयभीत-सी रहती थी। खाने-पीने की चीज़ों के सम्पर्क में आते वक्त वह अपने कैशों को कसकर बांधे रखती थी।


परन्तु कोई भी गृहिणी भले ही कितनी सावधानी बरते, कभी-न-कभी तो उससे जाने-अनजाने भूल हो ही जाती है। ऐसा ही एक दिन कार्य की व्यस्तता के कारण ब्राह्मणी के साथ भी हुआ, क्योंकि होनी को कोई नहीं टाल सकता है।इस तरह लाख सावधानियां बरतने के बाद भी एक दिन पंडित जी के भोजन में बाल निकल आया, बाल को देखते ही वह अपनी पत्नी पर बुरी तरह बरस पड़े। उन्होंने उसके मुंडन के लिए नाई को बुलवा भेजा।ब्राह्मणी ने अपने पति के गुस्से को बेकाबू होते देखकर कमरे के भीतर घुसकर अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर लिया। पंडित जी के काफी डरानेधमकाने पर भी उसने दरवाजा नहीं खोला, पंडित जी भी अपनी जिद्द पर अड़े रहे।इस प्रकार खुद को धर्म संकट में फंसी जानकर ब्राह्मणी ने कुछ सोचकर किसी पड़ोसी के हाथों अपने मायके वालों को बुलाने के लिए खबर भिजवा दी। ब्राह्मणी के चार भाई थे, अपनी बहन को संकट में फंसी देखा उन्हें बडा कष्ट हुआ। वे अपनी बहन के अपमान का बदला लेने व को अपने बहनोई सबक सिखाने का उपाय सोचने लगे।


तब उसके बड़े भाई को अचानक याद आया कि बीरबल उसका अच्छे मित्र हैं। वह अपनी बहन को इस संकट से मुक्त कराने की जानने हेतु तत्काल बीरबल के पास जा पहुंचा।बीरबल ने अचानक अपने मित्र को यूं देखा तो पूछा-"आओ सब कुशल तो हैं न, आज कैसे इधर का मार्ग भूल बैठे?" - बीरबल के पूछने पर उसके मित्र ने अपनी बहन के साथ घटी पर घटना के बारे में बता दिया तथा इस संकट से मुक्ति का उपाय पल इस पर बीरबल ने अपना सुझाव देते हुए कहा-"आप चारों भाई नगे सिर अपने बहनोई के सामने इस प्रकार जाओ, जैसे तुम्हारे यहां कोई मर गया हो, तब तक मैं भी वहीं पहुंच जाऊंगा।"इधर पंडितजी ने दरवाज़ा न खुलने पर क्रोध में आकर दरवाजा तुडवाने हेतु एक सेवक को बढ़ई ले आने के लिए भेज दिया। कुछ देर के बाद बढ़ई ने आकर दरवाजा तोड़ना शुरू किया ही था कि तभी ब्राह्मणी के चारों भाई सफाचट सिर को खोले, वहां आ पहुंचे। उनके आने के थोडी देर बाद ही बीरबल भी किरया कर्म की आवश्यक सामग्री लेकर वहां आ पहुंचे। बीरबल कमरे के दरवाजे के ठीक सामने बैठकर पिंडदान के लिए टिक्की बांधने लगे।


उधर मायके से आए चारों भाइयों ने पंडित जी को धर दबोचा और उन्हें चारों ओर से कपड़ों में बलपूर्वक लपेटकर अर्थी बांधनी शुरू कर दी। जब पंडित जी ने इसका विरोध किया, तो एक भाई ने क्रोध में भरकर कहा-"खबरदार! शांत लेटे रहो, बिना तुम पर कफन डाले भला किसकी दरवाजा मजाल है, जो मेरी बहन का मुंडन कर सके।" चारों भाई पंडितजी को बांधकर बीरबल के पास ले गए। यह अजीबो-गरीब स्थिति देखकर आस-पास के लोग भी वहां इकट्ठ हो गए। पंडित जी अपने पड़ोसियों के सामने, जो उनका बड़ा सम्मान थे, ऐसी दुर्दशापूर्ण स्थिति में शर्म से गडे जा रहे थे, वे अपने चारा से मुक्ति की प्रार्थना करने लगे। कमरे में बंद दरवाज़े की झिरी से बाह्मणी भी अपने पति की हालत को देख रही थी। पति को अपने भाईयों के सामने इस प्रकार गिड़गिड़ाते और खुशामदें करते देखकर पत्नी को दया आ गई, पत्नी का मन पिघल गया। उसने मन में कहा-"मेरे पति मेरे साथ चाहे कुछ भी क्यों न करें, लेकिन फिलहाल मुझे अपने पति को इस अपमान से बचाना चाहिए, मुझे अपने पति का साथ देना चाहिए।"
तब ब्राह्मणी ने फौरन ही दरवाज़ा खोल दिया तथा वह कमरे से बाहर आ गई। उसने अपने भाइयों के सामने हाथ जोड दिए और कहा कि वे लोग पंडित जी को छोड़ दें। भाइयों ने जब बहन की भी न सुनी तो बीरबल ने स्वयं उनसे क्षमा मांगते हुए, पंडित जी को छोड़ने का हुक्म दिया।इस तरह बीरबल के कहने पर पंडित जी को छोड़ दिया गया। बाद में उन्हें अपनी जिद्द पर बड़ा पश्चाताप हुआ। इस स्वांग से बीरबल का आश्य यह था कि पति के जीते-जी पत्नी का मुंडन नहीं हो सकता। स्त्री का मुंडन उसी स्थिति में होता है, जबकि उसका पति मर जाता है।