दूसरों के मन की बात-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 09,2021 06:02 AM posted by Admin

जब बीरबल को अकबर के दरबार का सदस्य बने कुछ साल हो गए तो शहंशाह अकबर उसे अपनी राजधानी आगरा से बदल कर फतेहपुर सीकरी ले गए। नई राजधानी आगरा से लगभग 20 किलोमीटर दूर थी। शहंशाह ने अपने राज-दरबार के साथ-साथ राजमहल का भी पुनर्निर्माण करवाया एवं उसके बिल्कुल बगल में ही बीरबल के लिए भी महल बनवा दिया किंतु अन्य दरबारियों को अपने लिए महल स्वयं बनवाने पड़े। कई दरबारियों को तो महल बनाने के लिए उचित स्थान भी नहीं मिल सका।. इसलिए उन्हें सीकरी गांव में ज़मीन लेनी पड़ी। किंतु वे गांव में रहते हुए अत्यंत हीनता तथा अपमान की भावना से ग्रस्त हो गए।बीरबल के साथ किए गए विशेष व्यवहार के कारण सभी दरबारी इतने चिढ़ गए कि उन्होंने उससे बदला लेने की ठान ली, किंतु वे यह भी भलीभांति जानते थे कि बीरबल इतना चतुर था कि सरलता से उनके काबू नहीं आएगा। इसलिए उनके पास इसके सिवाय कोई विकल्प न था कि वे उस दिन की प्रतीक्षा करें, जब शहंशाह उससे कोई ऐसा प्रश्न पूछे जिसका उसके पास कोई जवाब नहीं हो।


परन्तु युसूफ खान नामक एक दरबारी में अधिक समय तक प्रतीक्षा करने का धैर्य नहीं था। इसलिए उसने बीरबल को फंसाने के लिए एक योजना बनाई और उसने अपने कुछ मित्रों को समझा दिया। बीरबल उस समय किसी काम के लिए राजधानी से बाहर गया हुआ था। इसलिए उन्होंने सोचा कि उस योजना को कार्यान्वित करने के लिए वह बिल्कुल सही समय था।अपनी योजनानुसार एक दिन दरबार में सभी राज्य-संबंधी कार्यों के समाप्त होते ही वह शहंशाह से बोला, "जहांपनाह, मैं कुछ समय से एक बात गौर से देख रहा हूं।"अच्छा, आप ऐसा क्या देख रहे हैं? हमें भी तो बताएं।" शहंशाह अकबर ने उत्सुकतावश पूछा।"जहांपनाह, मुझे अभी-अभी मालूम हुआ है कि बीरबल दूसरों के मन के विचार जान लेने की क्षमता रखते हैं। वास्तव में उन्होंने मुझे यह बात स्वयं ही बताई थी।" युसूफ खान ने स्पष्ट किया।


"क्या यह बात सच है? मैं स्वयं बीरबल से पता लगाऊंगा कि वह दूसरों के दिमाग़ में चल रहे विचार जान पाता है या नहीं।" अकबर ने कहा।युसूफ खान तथा उसके मित्र यह सुन कर बहुत प्रसन्न हुए। “इस बार बीरबल अवश्य फंस जाएगा। कितना मज़ा आएगा। आखिर वह स्वयं का समझता क्या है?" उन सब ने मन-ही-मन सोचा और उसकी वापसी की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ दिन बाद बीरबल राजधानी वापस लौट आया। शहंशाह अकबर उससे बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने उसे उसकी उपलब्धियों के लिए बधाई दी। इससे उसके दुश्मन और भी जल-भुन गए। राजकीय काम समाप्त करने के बाद शाम को अकबर को अचानक युसूफ खान की कही बात याद आ गई। उन्होंने बीरबल को कहा, "बीरबल, मैंने सुना है कि तुम दूसरों के मन में चल रहे विचारों को जान लेते हो?"बीरबल ने विस्मयपूर्वक अपने चारों ओर देखा तो उसकी नज़र कुटिलता से मुस्कराते हुए यूसुफ खान एवं उसके मित्रों पर पड़ी। वह समझ गया कि माजरा क्या था? इसलिए उसने अकबर की ओर मुड़ कर हंसते हुए कहा, "यह बिल्कुल सही बात है जहांपनाह, लेकिन मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि मुझ में आपकी सूक्ष्मबुद्धि तथा पेचीदा मस्तिष्क को समझने की योग्यता नहीं है। हां, मैं आपको यह निश्चित तौर पर बता सकता हूं कि सभी दरबारी इस समय क्या सोच रहे हैं?"
"यदि यह बात सही है तो मेरे साथ-साथ सभी दरबारी भी जानना चाहेंगे कि तुम सचमुच उनके विचारों की जानकारी रखते हो या नहीं।

इसलिए हमें बेधडक होकर बताओ कि इस समय वे क्या सोच रहे हैं।" शहंशाह ने उत्सुकता से पूछा। "जहांपनाह, यहां बैठे सभी दरबारियों के मस्तिष्क में इस समय एक ही विचार घूम रहा है कि आप इस पृथ्वी के सबसे कुशल तथा न्यायप्रिय सम्राट् हैं। इसलिए वे आपकी अच्छी सेहत तथा भलाई के लिए परमात्मा से प्रार्थना कर रहे हैं। क्या मैं ग़लत कह रहा हूं मित्रो? क्यों यूसुफ खान, तुम्हारा क्या कहना है?"बेचारा युसूफ खान! उसे काटो तो खून नहीं। वह भला इस प्रश्न का क्या उत्तर दे सकता था? यह बात सुनते ही वह जान गया कि बीरबल ने उसे इस बार भी मात दे दी थी। इसलिए उसने शहंशाह के समक्ष अपना सिर झुकाते हुए कहा, "बीरबल बिल्कुल सही कह रहे हैं जहांपनाह। मैं बिल्कुल यही बात सोच रहा था।" उसके मित्रों तथा अन्य दरबारियों ने भी बीरबल की बात से पूर्ण सहमति व्यक्त की। उनमें से किसी में भी 'यह बात स्वीकार करने की हिम्मत न थी कि वे शहंशाह की भलाई के विषय में सोचने की बजाय कुछ और सोच रहे थे।


यह सुनकर बीरबल ने शहंशाह की ओर विनोदपूर्ण नज़रों से देखा तो शहंशाह तुरंत समझ गए कि दरबार में घटी घटना के पीछे आखिर राज क्या था। इसलिए शहंशाह भी मुस्कराए बिना न रह पाए। वह हंसते-हंसते सभी दरबारियों से बोले, "आप सब मेरे बारे में इतनी अधिक चिंता करते हैं, इस बात ने मेरे हृदय को गहराई तक छू लिया है।" ऐसा कहकर वह ठहाके लगाने लगे। सभी दरबारी यह देख कर क्षण भर के लिए तो ठगे-से उन्हें देखते रहे लेकिन उन्हें हंसता देख कर वे भी हंसने लगे और इस प्रकार पूरा राज-दरबार हंसी के ठहाकों से गूंजने लगा।