दीवानगिरी का दावेदार-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 10,2021 01:32 AM posted by Admin

वैसे तो बादशाह अकबर और बीरबल में प्रायः नोंक-झोंक हुआ करती थी, लेकिन एक दिन उन दोनों के बीच किसी बात पर झगड़ा हो गया था। बीरबल को गुस्सा आ गया और वह रूठकर दिल्ली से पंद्रह-बीस कोस दूर एक गांव में अपना नाम छिपाकर रहने लगा।गांव का पटेल भगवत सिंह भाटी राजपूत था। वह बड़ा दयालु था। जो कोई परदेसी उस गांव में आता, वह उसकी बड़ी आवभगत करता था। बीरबल भी उसके गांव में बड़े आराम से दिन बिताने लगा।उधर बीरबल के चले जाने के बाद अकबर बादशाह ने उसकी जगह अपने साले को नियुक्त कर दिया। यह बात यद्यपि अकबर बादशाह को नापसंद थी, परन्तु बेगम को खुश करने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा था। उसको दीवान के पद पर नियुक्त हुए अभी दस दिन नहीं हुए थे कि शहर में अव्यवस्था फैल गई। लोग आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। न्याय की व्यवस्था बिल्कुल बिगड़ गई। चारों ओर से शिकायतें आने का तांता लग गया।

अकबर बादशाह ने अपने साले की बुद्धि की परीक्षा लेकर बेगम और अन्य लोगों को कुछ दिखाने का विचार किया। वह नए दीवान को साथ लेकर पीर साहब की दरगाह पर गए। लौटते समय उन्होंने धूल में हाथी के पैर का एक चिह्न देखा। अकबर ने दीवान को हुक्म दिया कि तीन दिन तक इस चिह्न की स्वयं रक्षा करो। इतना कहकर अकबर बादशाह अपने महल में चले गए और नया दीवान हाथी के पैर के चिह्न का पहरा देने लगा। सारा दिन इसी प्रकार बीत गया। दूसरे दिन भी उसको खाने के लिए कुछ नहीं मिला। इस प्रकार तीन दिन तक लगातार भूखे रहने , और जागने से दीवान बहुत कमजोर हो गया था।

चौथे दिन उसने अकबर बादशाह के पास जाकर उस चिह करने का सविस्तार वर्णन सुनाया, जिसे सुनते ही अकबर बादशाह ने बुद्धि की थाह पा ली।अब कुछ समय बाद अकबर बादशाह ने बीरबल की खोज लगाने के विचार किया। इसके लिए उन्होंने गांव-गांव में यह आदेश भेज दिया कि दिल्ली में सरकारी कुएँ का विवाद है, इसलिए अपने गांव के सब करें को लेकर जो ज़मींदार नहीं आएगा, उस पर दस हजार रुपए जुर्माना किया जाएगा। अकबर बादशाह की यह आज्ञा, जिस गांव में बीरबल रहते थे. वहां भी पहुंची।गांव का पटेल गांव वालों को एकत्रित करके बोला-"अकबर बादशाह बड़ा मूर्ख है। कहीं कुएं भी एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जा सकते हैं। अब बताओ, क्या किया जाए? यदि अकबर बादशाह की आज्ञा का पालन नहीं होगा तो दस हजार रुपए दण्ड देने पड़ेंगे।"तब बीरबल भी वहां मौजूद था। यह बात सुनकर उसने सोचा कि अकबर बादशाह ने मेरी खोज के लिए यह तरकीब निकाली है। अब किसी तरह प्रकट होकर उनकी तरकीब सफल करना ही उचित है। ऐसा करने से मेरा और अकबर बादशाह दोनों का महत्त्व प्रकट होगा।


बीरबल ने कहा-"पटेल जी, आप किसी बात की चिंता न करें, तरकीब मैं बताऊंगा। आपने इतने दिन तक मुझे अपने गांव में शरण दी है। उसके बदले में मुझको भी तो कुछ देना चाहिए। आप मुझे व दो-चार अन्य आदमियों को साथ लेकर दिल्ली चलो। वहां नगर के बाहर डेरा डालकर अकबर बादशाह को कहलवा भेजो कि हम अपने कुओं को लेकर नगर के बाहर आ पहंचे हैं। आप अपने कुओं को अगवानी के लिए भेजो। बिना अगवानी के हमारे कुएं नगर में नहीं घुसेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि बादशाह कुएं लेकर तो आ नहीं सकेंगे, इसलिए वह हमारा बहुत सत्कार करेंगे।"सब को बीरबल की यह तरकीब पसन्द आई। उसी दिन बीरबल को साथ लेकर गांव के मुखिया दिल्ली की ओर रवाना हुए। वहां पहुंचकर वे नगर के बाहर ठहरे और बीरबल के कहने के अनुसार पटेल ने जाकर अकबर बादशाह से कहा-"हम लोग अपने कुएं लेकर नगर के बाहर रे हुए हैं, आप अपने कुओं को अगवानी के लिए भेजिए।" यह बात सुनते ही अकबर बादशाह तुरन्त समझ गए कि ऐसा जवाब बल के अतिरिक्त और कोई दे ही नहीं सकता है। वह अवश्य ही ही गांव में है। यह सोचकर उन्होंने पटेल से पूछा-"तुम्हें यह बात किसने जताई है। सच-सच बताओ।" पटेल ने कहा-"थोड़े दिन पहले हमारे गांव में एक परदेसी आकर ठहरा था। उसी ने हमको यह युक्ति बताई और वह हमारे साथ आया भी है।"


बादशाह ने उसका हुलिया पूछा तो पटेल ने बीरबल की सूरत, चालदाल आदि के बारे में सब बातें बता दी। इससे अकबर बादशाह को विश्वास हो गया कि वह अवश्य ही बीरबल है। फिर अकबर बादशाह ने हाथी-घोड़े आदि बहुत-सी सवारी, बीरबल को लाने के लिए भेजी। बीरबल बडी धूमधाम से नगर में आए।अकबर बादशाह ने बीरबल को फिर से दीवान के पद पर नियुक्त कर दिया और पटेल को इनाम देकर विदा किया। बीरबल के आने के बाद आठ दिन में ही सारे शहर का प्रबंध पहले जैसा ठीक हो गया और किसी भी प्रकार की गड़बड़ नहीं हुई।अकबर बादशाह की सवारी एक बार नगर से बाहर गई। लौटते समय उनको हाथी का पैर धूल में छपा हुआ दिखाई दिया। अकबर बादशाह ने उसकी रक्षा करने के लिए बीरबल को आज्ञा दी। बीरबल इस आज्ञा को स्वीकार करके वहीं ठहर गए और सेवकों द्वारा उस जगह पर एक लोहे की खंटी खड़ी करवाई गई, फिर सौ हाथ लम्बी रस्सी उस खूटी में बांधकर आस-पास के निवासियों ने कहा कि इस चिह्न की रक्षा के लिए उनके मकान तोड़े जाएंगे। वे लोग बीरबल की खुशामद करने लगे। उन्होंने किसी से पांच सौ और किसी से हज़ार रुपए लेकर लोगों को छुटकारा दिया। इस प्रकार थोड़ी ही देर में एक लाख रुपए इकट्ठे हो गए।


बीरबल ने अकबर बादशाह से मकानों को न तुड़वाने की प्रार्थना करने का वचन देकर महल का रास्ता लिया। उन्होंने रुपए राजकोष में जमा कर दिए तथा कोषाध्यक्ष से उन रुपयों की रसीद लेकर दरबार में पहुंचे। जब अकबर बादशाह ने हाथी के पैर की रक्षा के विषय में पूछा तो बीरबल . ने जवाब न देकर एक लाख रुपए की रसीद दिखा दी। अकबर बादशाह ने रसीद का मतलब पूछा। इस पर बीरबल ने कहा-"हाथी के पांव के चिह्न की रक्षा करने में ये रुपए प्राप्त हुए हैं।"अब अकबर बादशाह ने अपने साले को बुलाया और कहा-"तुम हाथी के पैर के चिह्न की रक्षा करने में तीन दिन तक भूखे मरे और कला प्राप्त नहीं कर सके, बीरबल ने बिना प्रयास के एक ही दिन में एक ला रुपए कमा लिए। इसलिए तुम कभी भी दीवान-पद के योग्य नहीं हो सकते।तब बादशाह का साला चुपचाप वहां से चला गया और उसके बाद फिर उसने दीवानगिरी के लिए कभी भी दावा पेश नहीं किया।