औरत की मोहरें-अकबर बीरबल की कहानी

Apr 10,2021 01:14 AM posted by Admin

विधवा और नि:संतान औरत थी फौजिया। फौजिया ने अपनी ज़िन्दगी को वृद्धावस्था की ओर बढ़ते देखकर हज पर जाने का इरादा बनाया। यह विचार करके उसने अपने आभूषणों को बेचकर सोने की मोहरें लीं। खर्च के लिए कुछ मोहरें रखकर बाकी आठ सौ मोहरें एक मजबूत थैली में बन्द कर दी। उसके मुंह पर लाख की महर लगा दी। फौजिया के पडोस में एक काजी रहता था जिसे लोग बडा त्यागी और ईमानदार बताते थ। उसने उसी के यहां अपनी थैली रखने का विचार किया।वह थैली लेकर काजी के घर गई और बोली-"इस नगर में आप सबस अधिक ईमानदार हैं, इसलिए इस थैली को मैं आपके पास रखकर हज करने जाना चाहती हूं। इसमें आठ सौ मोहरें हैं। यदि मैं जीवित वापस आई तो इनको वापस ले लूंगी। अगर कहीं उधर ही मर गई तो आप मालिक हैं, जैसी आपकी इच्छा होगी खर्च करना।"तब काजी ने कहा-"बीबी! आपकी चीज़ बहुत हिफाजत से रहेगी, रख जाइए।" फौजिया मोहरों की थैली काजी को देकर हज करने चली गई। फौजिया ने थैली में मोहरें भरते समय हर एक मोहर पर एक छोटासा चिह्न लगा दिया था। चिह्न इतना छोटा था कि हाथ में लेकर देखने से भी किसी को आसानी से नहीं दिखाई देता था।


फौजिया सफर से जब दो वर्ष तक नहीं लौटी तो काजी की नीयत बिगड़ गई। उसने आठ सौ मोहरें पचा जाने का फैसला कर लिया। इसके लिए उसने सोच-विचार कर एक तरकीब निकाली और मोहरों को खर्च करने लगा।उधर तीसरे वर्ष जब वह औरत हज यात्रा से लौटी और काजी के पास जाकर अपनी मोहरों की थैली मांगने लगी। काजी ने झट से थैली दे दी।औरत अपनी थैली को पहले जैसी सिली देखकर बहुत खुश हुई परन्तु घर जाकर थैली खोलने पर उसको मालूम हुआ कि मोहरों के स्थान पर आठ सौ तांबे और रांगे के टुकड़े रखे हुए हैं। यह देखकर वह घबरा गई। वह थैली लेकर काजी के पास गई और सारा वृत्तान्त कह डाला। "अब तेरी थैली में क्या रखा हुआ था, मैंने देखा तक नहीं? तू जैसी थैली दे गई थी, वैसी ही मैंने संभाल कर रख ली थी। जैसी मोहर लगी थी, वैसी ही मैंने तुझे दे दी, फिर मैं क्या जानूं?" लालची काजी ने उत्तर दिया।


बात सुनकर फौजिया बीबी बहुत घबराई थी और बोली-"काजी साहब। मैंने मोहरें अपने हाथ से थैली में रखी थीं। मैं बहुत गरीब हूं, मेरी ज़िन्दगी का सहारा सिर्फ उन्हीं पर है। सारी नहीं तो आधी ही दे दीजिए। मैं आपको शरीफ आदमी समझकर अपनी धरोहर रख गई थी, परन्तु आपने मुझ असहाय के साथ ऐसा अन्याय किया है, जैसा कभी किसी ने किसी के साथ नहीं किया होगा।" काजी ने बनावटी क्रोध के साथ कहा-"बेकार शोर मचाने से कोई फायदा नहीं होगा। चुपचाप यहां से चली जा, नहीं तो धक्के देकर निकलवा दी जाओगी।"इस तरह फौजिया बीबी ने समझ लिया कि काजी उसकी मोहरों को देना नहीं चाहता है। इसलिए वह निराश होकर वहां से चली आई, लेकिन अपने घर जाने के बजाय सीधे अकबर बादशाह के पास गई और अपना सारा हाल कह सुनाया। अकबर बादशाह ने काजी को बुलाकर पूछा-"तुम इस औरत की थैली के विषय में क्या कहते हो?"महाराज, कुछ वर्ष पूर्व यह औरत मेरे यहां एक थैली रख गई थी। जब यह लौटी तो मेरे पास अपनी थैली लेने आई। जैसी मोहर लगी थैली यह मुझे दे गई थी, मैंने वैसी ही लौटा दी। मैं नहीं जानता, इसमें मोहरें थीं या बच्चों के खेलने के पत्थर?" काजी ने शराफत का ढोंग रचते हुए कहा। जवाब सुनकर अकबर बादशाह को संदेह हुआ। उन्होंने उसको घर जाने की आज्ञा देकर औरत से कहा-"तुम चिंता मत करो। आनंदपूर्वक अपने घर में रहो। थोड़े ही दिनों में तुम्हें तुम्हारी मोहरें मिल जाएंगी।अब अकबर बादशाह ने यह मामला बीरबल को न्याय करने के लिए दे दिया। तब बीरबल ने उस औरत से थैली ले ली और उसे अपने घर ले गएं। अगले दिन बीरबल ने वैसी ही कुछ थैलियां मंगवाकर, उसमें कुछ भरकर, लाख की मोहर लगाई, फिर सभी थैलियों में एक-एक छेद कर दिया और दिल्ली के सभी रफूगरों को बुलवा लिया। प्रत्येक रफूगर को एक-एक थैली दी गई और उनसे उन थैलियों के छेदों को रफू कराया गया। बीरबल ने देखा कि उन सभी थैलियों में एक रफूगार की थैली बड़े कमाल की थी। उसे बारीकी से देखने पर भी छेद का पता नहीं चलता था। बारबल ने उस रफ़गार को अकेले में बलाकर डराया-धमकाया ता उसने काजी की थैली में रफू करना स्वीकार कर लिया।


"यह थैली तुमने कब रफू की थी?" बीरबल ने कठोर स्वर में पूछा।"शायद डेढ वर्ष हुए होंगे हज़र। एक काजी ने मेरे पास आकर यह थैली रफू करवाई थी।"उस थैली में क्या था, क्या तुम्हें मालूम है?" बीरबल ने पूछा। "उसमें कुछ तांबे और रांगे के टुकड़े भरे हुए थे।" "इस काम के लिए तुझको क्या मिला था?" "दो मोहरें।" रफूगार ने उत्तर दिया। "तुमने मोहरें भुनवा ली हैं या ज्यों-की-त्यों रखी हैं?" "एक तो भुनवा ली है और एक मेरे पास है।" "जाओ, और उस मोहर को लेकर शीघ्र यहां आओ।" बीरबल ने कहा। रफूगार भी मोहर लेकर आ पहुंचा। काजी उसे देखकर ही भय से कांप उठा। बीरबल काजी की शक्ल देखकर तुरन्त भांप गया और उसने उस रफूगार से मोहर लेकर उस औरत के हाथ में दे दी और कहा-"तुम अपने कथनानुसार इस पर लगा चिह्न दिखलाओ।"उस स्त्री ने मोहर देखकर अपना चिह्न बीरबल को दिखाया, फिर बीरबल ने रफूगार की थैली दिखाकर पूछा-"क्या, यह वही थैली है?"हां हुजूर, यह वही थैली है।" "तुमने किस जगह रफू किया था, बताओ।"रफूगार ने वह स्थान दिखाया। तब बीरबल ने काजी की ओर देखकर कहा-"अब तुम क्या जवाब देते हो?"अब काजी से कोई जवाब नहीं मिला। वह नीचे की ओर देखने लगा। बीरबल ने उसे कैद करने की आज्ञा दी। फिर काजी के मकान की तलाशी ली गई, जहां मोहरें एक थैली में भरी हुई मिली। उस औरत ने सब मोहरों पर अपना चिह्न दिखाया। बीरबल ने रफूगार को दो मोहरें इनाम में दी और काजी की सारी जायदाद जब्त कर ली गई। अकबर बादशाह बीरबल के इस न्याय से बहुत खुश हुआ। वह औरत अपनी मोहरें लेकर विदा हुई|