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चैत्र मास की गणेश चतुर्थी व्रत कथा

Apr 05,2021 01:16 PM posted by Admin

बात तब की है जब सतयुग चल रहा था। एक राजा था। राजा का नाम शा-मकरध्वज। मकरध्वज बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति का राजा था और अपनी पजा का अपनी सन्तान की तरह पालन करता था। अतः उसके राज्य में प्रजा परी तरह सखी एवं प्रसन्न थी। राजा पर मुनि याज्ञवल्क्य का बड़ा स्नेह था। उनके ही आशीर्वाद से राजा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई।

राज्य का स्वामी यद्यपि मकरध्वज था परन्तु राजकाज उसका एक विश्वासपात्र मंत्री चलाता था। मंत्री का नाम धर्मपाल था। धर्मपाल के पाँच पत्र थे। सभी पुत्रों का विवाह हो चुका था। सबसे छोटे बेटे की बहू गणेशजी की भक्त थी और उनका पूजन किया करती थी। गणेश चौथ का व्रत भी करती थी। सास को बहू की गणेश-भक्ति सुहाती नहीं थी। पता नहीं क्यों, उसे यह शंका रहती थी कि यह बहू हम पर जादू-टोना-टोटका करती है।

सास ने बहू द्वारा गणेश-पूजा को बन्द कर देने के लिए अनेक उपाय किये पर कोई उपाय सफल नहीं हुआ। बहू की गणेशजी पर पूरी आस्था थी अत: वह विश्वास के साथ उनकी पूजा करती रही। गणेशजी जानते थे कि मेरी पूजा करने के कारण सास अपनी बहू को परेशान करती रहती है अत: उसे पाठ पढ़ाने (मजा चखाने) के लिए राजा के पुत्र को गायब करवा दिया। फिर क्या था-हाय-तौबा मच गई।

राजा के बेटे को गायब करने का सन्देह सास पर प्रकट किया जाने लगा। सास की चिन्ता बढने लगी। छोटी बहने सास के चरण पकडकर कहा-"माँजी! आप गणेशजी का पूजन कीजिए, वे विघ्न विनाशक हैं, आपका दुःख दूर कर देंगे।" - सास ने बहू के साथ गणेश-पूजन किया। गणपति ने प्रसन्न होकर राजा के पुत्र को लाकर दे दिया। सास जो बह पर अप्रसन्न-सी रहती थी, प्रसन्न रहने लगी और साथ ही गणेश-पूजन भी करने लगी।